मोटापे से मांस का डिलना-डोलना।
स्थल में उत्पन्न होनेवाला पेड़- पौधा आदि।
मोटापे या झोल के कारण हिलता-डोलता हुआ।
करण शरीर के मांस का हिलना-डोलना।
मकान बनाने-वाला, कारीगर, राज, मेमार।
गीले हाथ से दिया हुआ रोली, चंदन अदि का छापा या चिन्ह।
देवी-देवता की पूज्ञा का चंदा, पुजौरा।
अनाज के ढेर पर डाला गया चिन्ह।
नदी या समुद्र से संबंधित।
नदी या समुद्र में रहनेवाला।
नदी या समुद्र के निकट का।
गुफा, खोह, पहाड़ के बीच की आड़।
उ.—अधम समूह उधारन कारन तुम जिय जक पकरी। मैं जु रह्यौं राजीवनैन दुरि, पाप-पहार-दरी—१-१३०।
पहाड़ी खड्ड जहाँ नदी बहती हो।
घर जिसमें बहुत से द्वार हों।
खिड़की के पास बैठने की जगह।
झरोखे के पास बैठने की जगह।
उ.—अति दरेर की झरेर टपकत सब अँबराई—१५६५।
बहाब का जोर, धारा का तोड़।
रगड़ते हुए धक्का देना, धकियाते हुए ले चलना।
मुहा.- दर्जी की सुई— जोकई तरह के काम करे।
मुहा.— दर्द खाना— कष्ट सहन करना।
मुहा.- दर्द खाना— तरस खाना, दया करना।
धन की हानि का दुख या अफसोस।
जो दूसरे का दुख-दर्द समझ सके, दयालु।
मलय पर्वत के समीप एक पर्वत।
एक प्राचीन जाति जो पंजाब के उत्तर में बसती थी।
राजा ऊशीनर की पत्नी का नाम।
देखने की क्रिया, साक्षात्कार, देखा-देखी। इस प्रकार के दर्शन के प्रायः चार रूप हैं—प्रत्यक्ष, चित्र, स्वप्न और श्रवण।
वह विद्या या शास्त्र जिसमें पदार्थों के धर्म, कारण, संबंध आदि की विवेचना हो।
(सं. स्तंभन, प्रा. थंभन = रोकना, हिं. थामना)
चलती या गिरती हुई चीज को रोकना।
(सं. स्तंभन, प्रा. थंभन = रोकना, हिं. थामना)
(सं. स्तंभन, प्रा. थंभन = रोकना, हिं. थामना)
(सं. स्तंभन, प्रा. थंभन = रोकना, हिं. थामना)
(सं. स्तंभन, प्रा. थंभन = रोकना, हिं. थामना)
उ.— कर कनक-थार तिय करहिं गान—९-१६६।
उ.—माँगत कछु जूठन थारी—१०-१८३।
उ.—दर्वा, रंभा, कृष्ना, ध्याना, मैना, नैना, रूप—१५८०।
अमावास्या को किया जानेवाला यज्ञ आदि।
वह शास्त्र जिसमें प्रकृति, आत्मा, परमात्मा, जीवन का लक्ष्य आदि का विवेचन होता है, तत्वज्ञान।
जानने, समझने या विचार करनेवाला।
उ.—अद्भुत राम नाम के अंक। धर्म-अंकुर के पावन द्वै दल, मुत्कि-बधू-ताटंक—१-९०।
उ.—(क) कौरौ-दल नासि-नासि कीन्हौं जन-भायौं—१-२३। (ख) जा सहाइ पाँडव दल जीतौ—१-२६९।
किसी फ़ल या समतल पदार्थ की मोटाई।
किसी अस्त्र का कोष म्यान।
किसी धातु या बाजे पर किये गये आघात से उत्पन्न कंप, थर-थराहट, धमक, झनझनाहट।
डराना, भयभीत करना, भय से कँपाना।
उ.—सूरजदास सिंह बलि अपनी लीन्हीं दलकि सृगालहिं।
सेना का नाश करनेवाला वीर।
मुहा.- दलदल में फँसना— (१) कीचड़ से लथपथ होना। (२) किसी मुसीबत या जंजट में फँस जाना। (३) किसी काम का उलजन याय जगड़े में इस तरह फँस जाना कि फैसला न हो सके, खटाई में पड़ जाना।
दलने, पीसने या चूर करने का काम
रकड़ या पीसकर चूर चूर करना।
रौंदना, कुचलना, दबाना भीड़ना, मसलना
चक्की में डालकर अनाज आदि को मोटा मोटा पीसना।
नष्ट-ध्वस्त करना, जीत लेना।
संहार करने वाले, दलन करने वाले।
उ.—गोपी लै उठाई जसुमति कैं दीन्पौ अखिल असुर के दलना—१०-५४।
रौंद डालना, कुचल देना, पीस डालना।
वह अनाज जिसकी दाल दली जाती हो।
माल बेचने-खरीदने में कुछ धन लेकर सहायता करनेवाला।
स्त्री-पुरुषों को अनाचार के लिए मिलानेवाला।
उ.—भत्कनि-हाट बैठि अस्थिर ह्यौ, हरि नग निर्मल लेहि। काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह तू, सकल दलाली देहि—१-३१०।
उ.—माधौ, नैंकु हटकौ गाइ।¨¨। छुधित अति न अधाति कबहूँ, निगम-द्रुम दलि खाइ—१-५६।
कुचली जाकर, कुचल जाने पर, पीड़ित होने पर।
उ.—रसना द्विज दलि दुखित होति बहु तउ रिस कहा करै—१-११७।
उ.—सूरदास चिरजीवहु जुग-जुग दुष्ट दले दोउ नंददुलारे—२५६९।
उ.—धनि जननी जो सुभटहिं जावै। भीर परैं रिपु कौं दल दलि-मलि कौतुक करि दिखरावै—९-१५२।
नष्ट-विनष्ट, छिन्न भिन्न।
रगड़ी, मसली, मीड़ी, कुचली।
उ.—पग सौं चाँपी पूँछ, सबै अवसान भुलायौ। चरन मसकि धरनी दली, उरग गयौ अकुलाइ—५८९।
प्रतिष्ठित या स्थापित करके।
चिपटा- और चौड़ा काठ का दुकड़ा।
लिपा हुआ, सना हुआ, लिप्त।
उ.—कामी, बिबस कामिनी कैं रस, लोम-लालसा थापी-१-१४.।
प्रतिष्ठित या स्थापित करनेवाला।
उ.—परसुराम ह्वै के द्विज थापे दूर कियो भुवि भार-सारा, १३९।
रोली-चंदन आदि के हाथ से लगाये गये छापे या चिन्ह।
उ.—घर-घर थापे दीजिए घर-घर मंगलचार-९३३।
स्थापित करता है, जमाता है।
उ.—ग्वालनि देखि मनहिं रिस काँपै। पुनि मन मैं भय अंकुर थापै-५८५।
प्रतिष्ठित या स्थापित करेंगे।
उ.—पुनि वलिराजहिं स्वर्गलोक में थापैंगे हरि राइ—सारा. ३४६।
प्रतिष्ठित या स्थापित किया।
उ.— (क) जिनि जायौ ऐसौ पूत, सब सुख-करनि फरी। थिर थाप्यौ सब परिवार, मन की सूल हरी—१.-२४। (ख) जिहिं बल बिप्र तिलक दै थाप्यौ, रच्छा करी आप बिदमान—१.-१२.। (ग) इंद्रहिं मोहि गोबर्धन थाप्यो उनकी पूजा कहा सरै-६५३। (घ) मारि म्लेच्छ धर्म फिरि थाप्यो— सारा. ३२०।
अनाज के दानेदार डंठलों को बैलों से रौंदवाने की क्रिया।
आग जो वन में पेडों की रगड़ से सहसा लग जाती है।
उ. — द्रुम मनहुँ बेलि दव डाढ़ी —२५३५।
उ. — आजु अजुध्या जल नहिं अँचवौं ना मुख देखौं माई। सूरदास राघव के बिछुरे मरौं भवन दव लाई — ६-४७।
दवागि, दवागिन, दवागी, दवाग्नि
दव, वन में वृक्षों की रगड़ से सहसा लगने-वाली आग, दावानल।
(सं. दवाग्नि, हिं. दवागि)
उ.—दारुन दुख दवारि ज्यौं तृन-बन, नाहिंन बुझति बुझाई—-९-५२।
जो गिनती म नौ से एक अधिक हो, दस।
रावण को मारनेवाले श्रीराम।
अनाज के सूखे पौधों को बैलों से रौंदवाने की किया, मँड़ाई, दँवरी।
आग जो वन में सहसा लग जाती है।
उ. — (क) नारी-नर सब देखि चकित भए दवा लग्यौ चहुँ कोद —५९२। (ख) नहिं दामिनि, द्रुम दवा सैल चढ़ि फिरि बयारि उलटी झर लावति — ३४८५।
उ. — कालीदह के पुहुप माँगि पठए हमसौ उनि। ¨¨। जौ नहिं पठवहुँ काल्हि तौ, गोकुल दवा लगाइ — ५८६।
जोग-अगिनि की दवा देखियत —३०१८।
मुहा.- दवा को न मिलना— जरा भी न मिलना, दुर्लभ होना।
(किसी भाव को) मिटाने का उपाय।
((किसी के) उपचार या सुधारने का उपाय।
उ.—दशकंधर कौ बेगि सँहारौ दूर करौ भुव-भार—सारा.२५९।
लगभग दस वस्तुओं आदि का समूह।
उ.—गाउँ दशक शिरदार कहाई—१००२।
सन्, संवत् आदि में दस-दस वर्षों का समूह।
दस संस्कार—गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकरण निष्कामण,नामकरण, अन्नप्राशन चुड़ाकरण, उपनयन और विवाह।
मृतक-संबंधी एक कर्म जो मरने के बाद दस दिन तक पिंड-दान-द्वारा किया जाता है।
शरीर के दस छिद्र—दो कान, दो आँख, दो नथुने, मुख, गुदा, लिंग और ब्रह्यांड।
उ.—ज्यों गजराज काज के औसर औरे दशन देखावत—२९९३।
संन्यासियों के दस भेद—तीर्थ, आश्रम, वन, अरगय, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती भारती, पुरी।
संन्यासियों का एक वर्ग जो शंकराचार्य के शिष्यों से चला माना जाता है।
बुद्धदेव, जिन्हे दस बल प्राप्त थे—दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा, बल, उपाय, प्रणिधि और ज्ञान।
दस बलों को प्राप्त करनेवाले बुद्धदेव।
गणित में पूर्ण इकाई से कम और उसका अंश सूचित करने वाले अंक।
चांद्र मास के शुक्ल और कृष्ण पक्षों की दसवीं तिथि।
अयोध्या के राजा जो इक्ष्वाकु वंशी थे और जिनके चार पुत्रों में श्रीराम बड़े थे।
दस रातों में होनेवाला यज्ञ।
एक अस्त्र जो दूसरों के अस्त्रों को निष्फल करनेके लिए चलाया जाता था।
ज्येष्ठ शुक्ला दशमी जो गंगा जी की जन्म-तिथि मानी जाती है।
सुगंधित धूप जो पूज न के समय जलायी जाती है।
मनुष्य के जीवन की दस अवस्थाओं —गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पोगड़, यौवन, स्थविर्य, जरा, प्राणरोध और नाश—में एक।
साहित्य में विरही की दस अवस्थाओं —अभिलाष, चिंता, स्मरण, गुण-कथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मरण—में एक।
ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह का नियत भोगकाल।
मुहा.- दस बीसक— कई, बहुत से। उ.— बेसन के दस-बीसक दोना— ३९६।
पाँच की दूनी संख्या और उसका सूचक अंक।
उ.—दसए मास मोहन भए (हो) आँगन बाजै तू—१०-४०।
उ.—बहुरि बीर जब गयौ अवासहिं, जहाँ बसै दस कंध—९-७५।
उ.—दस-कंधर मारीच निसाचर यह सुनि कै अकुलाए—९-५७।
उ.—बर्ष ब्यतीत दसक जब होइ। बहुरि किसोर होइ पुनि सोइ—३-१३।
प्रसूता स्त्री का दसवें दिन का स्नान जब वह सौरी से दूसरे स्थान को जाती है।
उ.—ज्यों गजराज काज के औसर औरे दसन दिखावत—२९९३।
मुहा.- तृन दसननि लै (धरि)— दाँत में तिनका लेकर, विनयपूर्वक क्षमा-याचना करके, गिड़गिड़ाते हुए। उ.— (क) तृन दसननि लै मिलि दसकंधर, कंठनि मेलि पगा— ९-११४। (ख) हा हा करि दस ननि तृन धरि धरि लोचन जलनि ढराउँरी— १६७३।
काशी का एक तीर्थ जहाँ राजार्षि दिवोदास की सहायता से ब्रह्या का दस अश्वमेध करना प्रसिद्ध है।
प्रयाग का एक घाट जहाँ का जल कभी बिगड़ता नहीं माना जाता।
वृक्ष के चारों ओर बना चबूतरा।
उ.— झलमल दीप समीप सौंजे भरि लेकर कंचन थालिका —८०६।
काँसे-पीतल आदि धातुओं की बनी हुई बड़ी तश्तरी।
मुहा.- थाली का बैंगन— वह व्यक्ति जो निश्चित सिद्धांत न रखता हो और थोड़ॆ हानि-लाभ से विचलित होकर कभी एक पक्ष में हो जाय, कभी दूसरे।
थाली बजाना (१) साँप का विष उतारने के लिए थाली बजाकर मंत्र पढ़ना। (२) बच्चा होने पर थाली बजाने की रीति करना जिससे उसको डर न लगे।
जो एक स्थान से दूसरे पर लाया न जा सके, अचल, जंगम का विपरीतार्थक।
उ. — (क) थावर-जंगम, सुर-असुर, रचे सबै मैं आइ - २-३६। (ख) थावर-जंगम मैं मोहिं ज नैं। दयासील, सबसौं हित मानै ३-१३।
जलाशयों का तल या थल भाग, गहराई का अंत।
उ.— (क) ममता-घटा, मोह की बूँदैं, सरिता मैन अपारो। बूड़त कतहुँ थाह नहिं पावत, गुरु जन ओट अधारौ-१—२०९। (ख) बूड़त स्याम, थाह नहिं पावौं, दुस्साहस-दुख-सिंधु परी—१-२४९।
मुहा.- थाह मिलना (लगना)— (१) गहरे पानी में थल का पता लगना। (२) किसी भेद का पता चलना।
डूबते को थाह मिलना— संकट में पड़े हुँ आश्रयहीन व्यक्ति को सहारा मिलना।
उ.—सोभित सुक-कपोल-अधार, अलप-अलप दसना—१०-९०।
उ.—दसम मास पुनि बाहर आबै—३-१३।
चांद्र मास के कृष्ण अथवा शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि।
उ.—दसमी कौ संजम बिस्तरै—९-५।
कपड़े के छोर या किनारे का सूत,।
कुल दस, दस में प्रत्येक, दसों।
उ.—दसौं दिसि ततैं कर्म रोक्यो, मीन कौं ज्यौं जार—२-४।
(सं. दास=दानपात्र + बंदी=भाट)
राजाऒं की वंशावली या विरुदावली का गान करने वाला, भाट।
उ.—देस देस तें ढाढ़ी आये मन-वांछित फल पायौ। को कहि सकै दसौंधी उनको भयो सबन मन भायौ—सारा. ४०५।
उ.—दसरथ नृपति —अजोध्या राव—९-१५।
दशा, स्थिति या अवस्था को।
उ. -- अपने तन में भेद बहुत बिधि, रसना न जानै नैन की दसहिं—३०१७।
धूप जो पूजा के अवसर पर जलायी जाती है।
उ.—नैनन दसा करी यह मेरी। आपुन भये जाइ हरि चेरे मोहिं करत हैं चेरी—पृ. ३३१ (६)।
चादर जिस पर मुसलमानों के यहाँ भोजन की थाली रखी जाती है।
सिपाहियों की छोटी टुकड़ी।
किसी काम में दखल देने या हस्तक्षेप करने की क्रिया।
हाथ मारकर खट खटाने की क्रिया।
मुहा.- दस्तक देना— दरवाजा खटखटाना।
मालगुजारी वसूलने का हुक्मनामा।
उ.—मोहरिल पाँच साथ करि दीने, तिनकी बड़ी बिपरीत। जिम्मै उनके, माँगैं मोतैं, यह तौ बड़ी अनीति। बढ़ौ तुम्हार बरामद हूँ कौ लिखि कीनौ है साफ। सूरदास की यहै बीनती, दस्तक कीजै माफ—१-१४३।
मुहा.- दस्तक बाँधना (लगाना)— बैकार का खर्च अपने ऊपर डालना।
वह पत्र पर जिस पर कुछ शर्तें तय करके दोनों पक्ष हस्ताक्षर करें।
विजयादशमी के दिन राजा द्वारा सरदारों में बाँटी जानेवाली सौगात।
दूकानदारों द्वारा धनियों के नौकरों को खरीदारी करने पर दिया जानेवाला इनाम।
धाँय-धायँ करके या लपट के साथ (जलना)।
उ.—(क) उलटी गाढ़ परी दुर्वासैं, दहत सुदरसन जाकौं—१-११३। (ख) पावक जथा दहत सबही दल तूल-सुमेरु-समान—१-२६९।
क्रोध से संतप्त करती है, कुढ़ाती है।
उ.—कुँवरि सौं कहति बृषभानु घरनी। नैंकु नहिं घरे रहति, तोहिं कितनौ कहति, रिसनि मोहिं दहति, बन भई हरनी —६९८।
जलनें या भस्म होने की क्रिया।
उ.—कै दहिए दारुन दावानल जाइ जमुन धँसि लीजैं—२८६४।
लपट लौ या धधक के साथ जलना।
लपट या धधक के साथ आग जलाना।
दस्युओं को मारनेवाले, इंद्र।
उ.—लै बसुदेव धसैं दह सामुहिं तिहूँ लोक उजियारे हो।
उ.—(क) भादौं घोर रात अँधियारी। द्वार कपाट काट भट रोके दह दिसि कंस भय भारी। (ख) गो-सुत गाइ फिरत हैं दह दिसि बने चरित्र न थोरे—२६६४।
उ.—अति अचगरी करत मोहन पटकि गेंड्डरी दहर।
उ.—सूर प्रभु आय गोकुल प्रगट भए सतन दै हरख, दुष्ट जन मन दहर के।
बने रहने या रक्षित होने का भाव, रक्षा।
उ.—तुमहीं करत त्रिगुन बिस्तार। उतपति, थिति, पुनि करत सँहार-७-२१
जो चलता हुआ या हिलता-डोलता न हो, ठहरा हुआ।
शांत, धीर, अचंचल, अविचलित।
जो एक ही अवस्था में रहे, स्थायी, अविनाशी।
उ.—(क) सूरदास कछु थिर न रहैगौ, जो आयौ सो जातौ—१-३०२। (ख) जीवन जन्म अल्प सपनौ सौ, समुझि देखि मन माहीं। बादर-छाँइ, धूम-घौराहर, जैसैं थिर न रहाहीं—१-३१९। (ग) मरन भूलि, जीवन थिर जान्यौ बहु उद्यम जिय धारयौ—१-३३६। (घ) चेतन जीव सदा थिर मानौ—५-४। (च) नर-सेवा तैं जो सुख होइ; छनभंगुर थिर रहे न सोइ-७-२। (छ) असुर कौ राज थिर नाहिं देखौं— ८-८।
नाचते समय पैरों का हिलना-डोलना या उठना-गिरना।
क्रोध से कुढ़ना, झुंझलाना।
दुखी करना, कष्ट पहुँचाना।
जलने या जलाये जाने योग्य।
(फा. दह=दस, दसो दिशा +पट=समतल
ध्वस्त, नष्टभ्रष्ट, ढाया हुआ।
उ.—तृन दसननि लै मिलि दसंकधर, कंठनि मेलि पगा। सूरदास प्रभु रघुपति आए, दहपट होई लँका ९-११४।
(फा. दह=दस, दसो दिशा +पट=समतल
ढा देना, नष्ट या चौपट करना।
नष्ट किये, ध्वस्त कर दिये।
उ.—तब बिलंब नहिं कियौ, सबै दानव दहपट्टे—१-१८०।
[ फ़ा. दह =दस +बासी (प्रत्य.)]
धू-धू या धायँ-धाँयँ के साथ जलते हुए।
(सं. दर=डर +हिं. हलना=हिलना)
डर से चौंकना या काँप उठना।
मुहा.- कलेजा (जी) गहलना— डर से छाती धक धक करना।
[फ़ा. दह=दस +ला (प्रत्य.)]
ताश (खेल) का वह पत्ता जिसमें दस चिन्ह या बूटियाँ हों।
स्थान जहाँ एक नदी दूसरी से या समुद्र से मिलती है।
पुरुषों के लिए स्त्रियों द्वारा प्रयुक्त एक गाली।
जिसका घुमाव दाहिनी ऒर को हो दाहिनी ऒर घूमा हुआ।
दाहिनी ऒर से चारो ऒर घूमने की क्रिया या भाव।
उ.—दहिनाबर्त देत ध्रुव तारे सकल नखत बहु बार—सारा. १७९।
बाहरी द्वार के चौखट की निचली लकड़ी, देहली, डेहरी।
बाहरी द्वार से मिला कोठा।
मुहा.- दहलीज का कुचा— हर समय पीछे लगा रहने नाला।
दहलीज न झाँकना- वैर या ईर्ष्या के कारण किसी के द्वारा पर न जाना।
दहलीज की मिट्टी ले डालना— बार-बार किसी के दरवाजे पर जाना।
दो अंकों की संख्या में बायाँ अंक जो दसगुने का बोधक होता है।
जोर से रोने-चिल्लाने की ध्वनि।
जोर से गरजना या चिल्लाना।
उ.—दहिने देखि मृगन की मालहिं—२४८३।
मुहा.- दहिने होना- अनुकूल होना, प्रसन्न होना।
दहिने बायें— इधर-उधर, दोनों ऒर।
दायीं ओर, दाहिने हाथ की तरफ।
उ.—देखें नंद चले घर आवत। पैठत पौरि छींक भई बाँए, दहिनैं धाह सुनावत—५४१।
जलने या भस्म होने का कार्य, भाव, प्रसंग, या स्थिति।
उ.—देखे जात अपनी इन अँखियन या तन को दहिबो—३४१४।
संतप्त करते हैं, दुख देते हैं।
जलाते हैं, भस्म करते हैं।
उ.—(क) ते बेली कैसैं दहियत हैं, जे अपनैं रस भेइ—१३००। (ख) चदन चंद-किरनि पावक सम मिलि मिलि या तन दहियत—२३००। (ग) जरासंध पै जाय पुकारी महा क्रोध मन दहियत—सारा. ५९६।
उ.—मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ—१०-३१३।
खटाई डालकर जमाया हुआ दूध, दधि।
मुहा.- दही दही करना— कोई चीज मोल लेने के लिए जगह-जगह लोगों से कहते फिरना।
उ.—(क) चितवति रही ठगी सी ठाढ़ी, कहि न सकति कछु, काम दही—३००४। (ख) अब इन जोग-सँदेसन सुनि-सुनि बिरहिनि बिरह दही—३३४४।
विवाह में कन्या की ओर से वर-पक्ष को दिया जानेवाला धन और सामान, दायजा, यौतुक।
[हिं. दहला +एला (प्रत्य.)]
[हिं. दहला +एला (प्रत्य.)]
उ.—सुनि सजनी मैं रही अकेली बिरह दहेली इत गुरु जन झहरैं—१६७१।
उ.—अगिनि बिना जानैं जो गहै। तातकाल सो ताकौं दहै—६-३।
संतप्त करे, दुख पहुँचाती है।
उ.—(क) यह आसा पापिनी दहै। तजि सेवा बैंकुठनाथ की, नीच नरनि कैं संग रहै—१-५३। (ख) देहऽभिमान ताहि नहिं दहै—३-१३।
क्रोध दिलाती है, कुढ़ाती है।
नष्ट करता या मिटाता है, क्षीण करता है।
उ.—त्यौं जो हरि बिन जानैं कहे। सो सब अपने पापनि दहै—६-४।
उ.—निगड़ तोरि मिलि मात-पिता को हरष अनल करि दुखहिं दहो—२६४४।
जलता हूँ, बलता हूँ, भस्म होता हूँ।
उ.—और इहाँउ बिवेक अगिनि के बिरह-बिदाक दहौं—३-२।
उ.—(क) तेरे सब संदेहैं दहौं—३-१३। (ख) तेरे सब संदेहनि दहौं—४-१२।
मिटा दूँगा, नष्ट कर दूँगा।
उ.—सूर स्याम कहै कर गहि ल्याऊ, ससि तन-दाप दहौंगौ—१०-१९४।
नष्ट करो, दूर करो, भस्म कर दो।
उ.—इहाँ कपिल सौं माता कह्यौ। प्रभु मेरौ अज्ञान तुम दहौ—३-१३।
उ. — भक्तबछल बपु धरि नरकेहरि, दनुज दह्यौ, उर दरि सुरसाँई-१-६।
उ.—सुनि ताको अंतर्गत दह्यौ—१०-उ.-७।
उ.—(क) सद माखन धृत दह्यौ सजायौ अरु मीठो पय पीजै—१०-१९०। (ख) जाको राज-रोग कफ बाढ़त दह्यौ खवावत ताहि—३१४५। (ग) कृष्णछाँड़ि गोकुल कत आये चाखन दूध दह्यौ—२६६७।
उ.—यक ऐसेहि झकझोरति मोको पायौ नीकौ दाँउ—१६१३।
उ.—जैसे सिंह आपु मुख निरखै परै कूप में दाँकै हो।
मुहा.- थाह लगाना— (१) गहराई का पता लगाना। (२) भेद का पता चलना।
थाह लेना— (१) गहराई का पता लगाना। (२) भेद का पता चलाना।
मुहा.- मन की थाइ— गुप्त विचार का पता।
थाह या गहराई का पता लगाना।
थाह ली, गहराई का पता लगाया।
उ.- सो बल कहा भयौ भगवान ? जिहिं बल मीन.रूप जल थाह्यौ, लियौ निगम, इति असुर-परान-१.-१२७।
मुहा.- थिगली लगाना- जोड़ तोड़ भिड़ाना, युक्ति लड़ाना।
बादल में थिगली लगाना- (१) बहुत कठिन काम करना। (२) असंभव बात कहना।
रेशम में टाट की थिगली— बेमेल चीज।
अर्थ-दंड देना, जुरमाना करना।
साधु-वेश में (दंड-आदि धारण करके) धोखा देनेवाला।
डंडे में बँधी झोली की सवारी, झप्पान।
दाँत का चौका—सामने के चार दाँत।
मुहा.- दाँत उखाड़ना— कठिन दंड देना, मुँह तोड़ना। दाँतो (तले) उँगली काटना (दबाना)— (१) चकित होना, दंग रह जाना। (२) दुख या खेद प्रकट करना। (३) संकेत से मना करना। दाँत काटी रोटी— बहुत धनिष्ठता, गहरी दोस्ती। दाँत काढ़ना (निकालना)— (१) खीसें बाना, व्यर्थ ही हँसना। (२) दीनता दिखाना, गिड़ादड़ाना। दाँत किटकिटाना (किचकिचा ना, पासना)— (१) बहुत चोर लगाना। (२) बहुत क्रोध करना। दाँत पासि— बहुत क्रोध करके, झुंझला कर। उ.— सूर केस नहिं टारि सेकै काउ दाँत पासि जौ जग मरै— १-२३४। दाँत किरकिरे होना— हार मानना। दाँत कुरेदने को तिनका न रहना— सब कुछ चला जाना। दाँत खट्टे करना— (१) खूब है राम करना। (२) बुरी तरह हराना। दाँत खटूट हीना— (१) हैरान होना। (२) हार जाना। (किसी के) दाँतों चढ़ना— (१) किसी को खटकना या बुरा लगना। (२) किसी की टोंक या बूँस लगना। (किसी को) दाँतों चढ़ाना— (१) बुरी दृष्टि , देखना। (२) नजर लगाना। दाँत चबाना— क्रोध से दाँत पीसना। दाँत चबात— क्रोध से दाँत पीसने हुए। उ.— मेरी देह छुटत जम पठए जितक दूत धर मौं। दाँत चबात चले जमपुर हैं धाम हमारे कौं— १-१५१। दाँत जमना— दाँत निकालना। दाँत जाड़ देना— बहुत दंड देना, मुंह तोड़ना। दाँत गिरना (जड़ना, टूटना)— ब्रुढ़ापा आना। दाँत ताड़ना— (१) हैरान करना। (२) कठिन दंड देना। दाँत दिखाना— (१) हँसना। (२) डराना। (३) अपना बड़प्पन दिखाना। दाँत देखना— दाँत गिनना, परखना। दाँतों धरती पकड़ कर— बड़ी तकलीफ और किफायत से। दाँत न लगाना— बिना चबाये निगलना। किसी चीज का दाँत निकास देना, निकासना— (दाँत काढ़ना) फट जाना। दाँत निपोरना— (१) व्यर्थ ही हँसना। (२) गिड़गिड़ाना। दाँत पर न रखा जाना— बहुत ही खट्टा होना। दाँत पर मैल जमना— बहुत ही निर्धन होना। दाँत पर रखना— चखना। दाँतों पसीना आना— बहुत कठिन परिश्रम करना। दाँत बजना— दाँत चबात चले जमपुर हैं धाम हमारे कौं— १-१५१। दाँत जमना— दाँत निकालना। दाँत झाड़ देना— बहुत दंड देना, मुंह तोड़ना। दाँत गिरना (झड़ना, टूटना)— ब्रुढ़ापा आना। दाँत ताड़ना— (१) हैरान करना। (२) कठिन दंड देना। दाँत दिखाना— (१) हँसना। (२) डराना। (३) अपना बड़प्पन दिखाना। दाँत देखना— दाँत गिनना, परखना। दाँतों धरती पकड़ कर— बड़ी तकलीफ और किफायत से। दाँत न लगाना— बिना चबाये निगलना। किसी चीज का दाँत निकास देना, निकासना— (दाँत काढ़ना) फट जाना। दाँत निपोरना— (१) व्यर्थ ही हँसना। (२) गिड़गिड़ाना। दाँत पर न रखा जाना— बहुत ही खट्टा होना। दाँत पर मैल जमना— बहुत ही निर्धन होना। दाँत पर रखना— चखना। दाँतों पसीना आना— बहुत कठिन परिश्रम करना। दाँत बजना— सर्दी से दाँत बजना। दाँत मसमसाना (मीसना)— क्रोध से दाँत पीसना। दाँतों में जीभ-सा होंना— बौरयों या शत्रुऒं के बीच में रहना। दाँतों में तिनका लेना— बहुत गिड़गिड़ाना, विनती करना। (किसी जीज पर) दाँत रखना (लगना)— लेने . पाने की इच्छा रखना। ( किसी व्यक्ति पर) दाँत रखना— बदला लेने या वैर निकालने की इच्छा रखना। दाँतों से उठाना— बड़ा कंजूसी से जुगा कर रखना। (किसी पर) दाँत होना— (१) प्राप्त करने की इच्छा होना। (२) बदला लेने की इच्छा रखना। (किसी के) तालू में दाँत जमना— शामत आना।
दाँत या अंकुर की तरह किसी चीज का नुकीला भाग, दंदाना, दाँता।
जिसने इद्रियों को वश में कर लिया हो।
(पशुऒं आदि का ) दाँत वाला होकर जवान होना।
दंदाना, नुकीला कँगूरा आदि।
इंद्रियों का दमन, सहन-शक्ति।
दाँतों की पंक्ति, बत्तीसी।
सँकरा पंहाड़ी मार्ग, दर्रा।
पति-पत्नी का प्रेम-व्यवहार।
उ. — (क) दघि-मिस आपु बँघायौ दाँवरि सुत कुबेर के तारे— १-२५। (ख) बेद-उपनिषद जासु कौ निरगुनहिं बतावै। सोइ सगुन ह्यै नंद की दाँवरी बँधावै — १-४।
उ.—एक दाइँ मरिवो पै मरिबो नंदनँदन के काजनि—२८७२।
वह स्त्री जो स्त्रियों को बच्चा जनने में सहायता देती है, दाई।
उ.—लाख टका अरु झूमका सारी दाइ कौ नेग—१०-४०।
वह धन जो विवाह में वर-पक्ष को दिया जाय।
उ.—(क) दसरथ चले अवध आनंदत। जनकराइ बहु दाइज दै करि, बार-बार पद बंदत—९-२७। (ख) कहुँ सुत-ब्याह बहुँ कन्या को देत दाइजो रोई।
[सं. दाचू (प्रत्य.), हिं. दाँ (प्रत्य.)]
दूसरे के बच्चे को दूध पिला कर पालनेवाली. धाय।
बच्चे की ददेखभाल करनेवाली सेविका।
वह स्त्री जो बच्चा जनने में सहायता देती है।
उ.—झगविनि तैं नैं बहुत खिझ ई। कचन-हार दिऐं नहि मानति, तुहीं अनोखी दाई—१०-१६।
मुहा.- दाई से पेट छिपाना (दुराना)— जानने वाले से कोई भेद छिपाना। दाई आगे पेट दुरा-वति-रहस्य या भेद जाननेवालें से कोई बात छिपाती है। उ.— औरनि सौं दुगव जो करती तौ हम कहती भली सयानी। दाई आगे पेट दुरावति वाकी बुद्धि आज मैं जानी— १२६२।
मौका, उपयुक्त अवसर या संयोग।
उ.—यक ऐसिहि झकझोरिति मोंकौ पायौ नीकौ दाउँ—पृ. ३१३ (१३)।
मुहा.- दाँउ लेना— बुरे या अनुचित व्यवहार का बदला लेना। लैहौं दाउँ— पिछले अनुचित व्यवहार का बदला लूँगा | उ.-(क) असुर क्रोध ह्यौ कह्यौ बहुत तुम असुर संहारे। अब लैहौं वह दाँउ छाँड़िहौं नहिं बिन मारे— ३-११। (ख) सूर स्याम सोइ सोइ हम करि हैं, जोइ जोइ तुम सब कैहौ। लैहै दाँउ कबहुँ हम तुमसौं, बहुरि कहाँ तुम जैहौ— ७९३। लेत दाँउ— बदला लेता है, जैसा व्यवहार किया गया था, वैसा ही उत्तर देता है। उ.— मारि भजत जो जाहि, ताहिं सो मारंत, लेत अपनौ दाँउ— ५३३। लयौ दाउ— बदला ले लिया, प्रतिकार कर लिया। उ.— मेरे आगैं महरि जसोदा, तोकौं गगी दीन्ही।¨¨। तोकौं कहि पुनि कह्यौ बबा कौं, बढ़ौ धूत वृषभान। तब मैं दह्यौ, टग्यौ कब तुमकौं हँसि लागी लपटान। भली गही तू मेरी बेटी. लयौं आपनौ दाउ— ७०९। दाँउ लियौ-बदला लिया। उ.— और सकल नागरि नारिनि कौं दासी दाँउ लियौ— ३०८७।
मतलब गाँठने का उपाय, चाल या युक्ति।
कुश्ती जीतने का पेच या बंद।
उ.—तब हरि मिलि मल्लक्रीड़ा करि बहु बिधि दाँउ दिखाये सारा. ५२१।
दाँव-पेच, जीत के उपाय, युक्ति।
उ.—यह बालक धौं कौन कौ कीन्हौ जुद्ध बनाइ। दाँउ-घात बहुतैं कियौ, मरत नहीं जदुराइ—५८९।
उ.—अब करति चतुराई जाने स्याम पढ़ाये दाँउ—१२८३।
खेलन की बारी या पारी, चाल।
उ.—(क) दाँउ बलगम को देखि उन छल कियों रुक्म जीत्यौ कहन लगे सारे। देवबानी भई, जीत भई राम की, ताहू पै मूढ़ माहीं सँमारे—१० उ. ३३। (ख) दाँउ अबकैं परयौ पूनै, कुमति पिछली हारि—१-३०९।
मुहा.- दाँउ देना— खेल म हारने पर दूसरे को खिलाना या नियत दंड भोगना। दाँउ देत नहिं— हारने पर भी दूसरे को खेलने नहीं देते। उ.— तुमरे संग कहो को खेलै दाउँ देत नहिं करत रुनैया। दाँउ दियौ— स्वयं हारने के बाद जीतनेवाले को खिलाया। उ.— रुहठिं करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ। सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाँउ दियौ करि नंद-दुहैया— १०-२४५।
अवस्था में बड़ा भाई, बड़े भैया।
श्री कुष्ण के भाई, बलराम।
उ.—(क) दाऊ जू, कहि स्याम पुकारूयौ—४०७। (ख) मैया री मोहिं दाऊ टेरत—४२४।
दक्ष प्रजापति का किया हुआ एक यज्ञ।
दूसरे को प्रसन्न करने का भाव।
उ.—मिलिहै ह्रदय सिराइ स्रवन सुनि मेटि बिरह के दाग—२९४८।
उ.—(क) कुंडल मकर कपोलनि झलकत स्रम सीकर के दाग—१२१४। (ख) दसन-दाग नख-रेख बनी है—१९५६।
फल आदि के सड़ने का निशान।
तपे हुए लोहे से चिह्न डालना।
उ.—ऊथौ मन माने की बात। दाख-छुहारा छाँड़ि अमृत-फल बिष-कीरा बिष खात—४०२१।
सम्मिलित किये जाने का कार्य।
मुर्दा जलाने का काम, दाह-कर्म।
नाचते समय पैरों को हिलाना-डुलाना या उठाना- गिराना।
[सं. स्थिर, हिं. थिर+ना (प्रत्य.)]
द्रवों का हिलना-डोलना बंद होना।
[सं. स्थिर, हिं. थिर+ना (प्रत्य.)]
द्रवों के स्थिर होने पर उनमें घुली हुई चीज का तल में बैठना।
धातु के तप्त साँचे से चिह्न डालना।
तेज दवा से फोड़े-फुंसी को जलाना।
बंदूक आदि में बत्ती देना या आग लगाना।
रंग आदि से चिह्न अंकित करना।
कच्ची भूमि पर सिधान के लिए फावड़े आदि से बनाये हुए चिह्न।
जिस पर सड़ने का निशान हो।
जिसको कलंक लगाया गया हो, कलंकित।
जिसे दंड मिल चुका हो, दंडित।
उ.—दाड़िम दामिनि कुंदकली मिलि बाढ़ूयौ बहुत बषान— सा. उ.—१५।
(सं.दंष्ट्रा, प्रा. डडडा)
दंत-पंक्तियों के दोनों छोरपर के चौड़े दाँत, चौभर।
मुहा.- दाढ़ गरम होना-भोजन मिलना।
मुहा.- ढाढ़ मारकर रोना— चिल्लाकर रोना।
रंग आदि के चिन्ह अंकित किये।
उ.—कबहुँक बैठि-अंस भुज धरि कै पीक कपोलनि दागे।
दाग लगाया, जला कर कोई चिन्ह बनाया, छाप, लगायी।
उ.—तौ. तुम कोऊ तारूयौ नहिं जौ मोसौं पतित न दाग्यौ—१-७३।
उ.—कबहुँक जावक कहुँ बने समोर रंग कहुँ अंग सेंदुर दाग्यौ—१९७२।
जलना, ईर्ष्या करना, द्वेष रखना।
मुहा.- दाढ़ा फणूकना-जलन पैदा करना।
गाल, दाढ़ और टुड्डी के बाल।
मूर्ख पुरुषों के लिए झुँझलायी हुई स्त्रियों की एक गाली।
उ.—जाके सखा स्यामसुंदर से श्रीपति सकल सुखन के दात-१०-उ.५९।
उ.—गोकुल बजत सुनी बधाई लोगनि हियै सुहात। सूरदास आनंद नंद कैं देत वन क नग दात—१०-१२।
उ.—काकौं नाम बताऊँ तोकौं। दुखदायक अट्टप्ट मम मोकौं। कहियत इतने दुख-दातार—१-२९०।
उ.—पलित केस कफ कंठ बिरोध्यौ कल न परै दिन राती। माया-मोह न छाँड़े तृष्ना ए दोऊ दुख-दाती।
नीम, बबूल आदि की छोटी टहनी का एक बालिश्त के बराबर टुकड़ा, जिससे दाँत साफ किये जाते हैं।
मुहा.- दाद चाहना— अन्याय या अत्याचार के विरोध या प्रतिकार की प्रर्थना करना।
दाद देना— (१) न्याय या इसाफ करना। (२) प्रशंसा या बड़ाई करना, सराहना।
मुहा.- दाधे पर लोन लगावै— जले पर नमक लगाना, दुखी या पीड़िच को वाक्यों या कार्यों से और पीड़ा पहुँचाना। उ.— सूरदास प्रभु हमहिं निदरि दाधे पर लीन लगावै— ३०८८।
उ.—बिबरन भये खंड जो दाधे बारिज ज्यों जलमीन—२७६७।
उ.—हरि-मुख ए रंग-संग बिधे दाधौ फिरे जरै—२७७०।
उ.— तुम समरथ की बाम कहा काहु को करिहौ। चोरी जातीं र्बेचि दान सब दिन का भरिहौं।
राजनीति का एक उपाय जिसमें कुछ देकर शत्रु के विरुद्ध सफलता पाने का प्रयत्न किया जाय।
उ.—(क) मनु बरषत मास अषाढ़ दादुर मोर ररे—१०-२४। (ख) गर्जत गगन गयंद गुंजरत अरु दादुर किलकार—२८२०। (ग) दादुल जल दिन जियै पवन भख मीन तजै हठि प्रान—३३५७।
दादा के लिए स्नेह-सूचक संबोधन।
आत्मीयता सूचत सामान्य संबोधन।
अकबर के समकालीन एक साधु जिनका पथ प्रसिद्ध है।
दादू या दादू दयाल नामक साधु के अनुयायी, जिनके तीन वर्ग हैं—विरक्त या संन्यासी, नागा या सैनिक और विस्तर धारी या गृहस्थ।
उ.—(क)निरखत बिधि भ्रमि भूलि परयौ तब, मन-मन करत समाधा। सूरदास प्रभु और रच्यौ बिधि, सोच भयौ तन दाधा—९०५। (ख) सूरदास प्रभु मिले कृपा करि गये दुरति दुख दाधा—१४३७।
उ.—ज़्यौं पावस रितु घन-प्रथम घोर। जल जावक, दादर रटत मोर—९-१६६।
बड़ों के लिए आदरसूचक शब्द।
उ.—सदा सर्बदा राजाराम कौ सूर दादि तहँ पाई—९-१७।
अक्रूर का एक नाम जो उसे स्यमंतक मणि के प्रभाव से प्रति दिन प्रचुर दान देने के कारण दिया गया था।
वह पत्र या लेख जिसमें संपति दान का लेखा हो।
थूकने का कार्य दूसरे से कराना।
[हिं. थूक +हाई (प्रत्य.)]
वह स्त्री जिसकी सब निंदा या बुराई करें।
थुकायल, थुकेल, थुकैल, थुकैला
(हिं. थूक + आयल, एल, ऐल, ऐला)
दानवाकार भयानक आकृति और क्रूर प्रकृतिवाली स्त्री।
श्रीकृष्ण की एक लीला जिसमें उन्होंने गोपियों से गोरस का कर वसूल किया था।
वह ग्रंथ जिसमें इस लीला का वर्णन किया गया हो।
दनु' नामत पत्नी ,से उत्पन्न कश्यप के पुत्र, दनुज, असुर, राक्षंस।
(सं. दानव =दैत्य; यहाँ आशय कुंभकरण से है; कुंभकरण की प्रिया=नींद)
उ.—दानव प्रिया सेर चलि सौ सुरभी रस गुड़ सीचों। तजत न स्वाद आपने तन को जो बिधि दीनो नीचो—सा. ९०।
छोटी गोल वस्तु जो प्रायः गूँथी जाय।
माला की एक मनका या गुरिया।
छोटी छोटी गोल चीजों के लिए संख्या-सूचक शब्द।
शरीर के चमड़े पर किसी कारण पड़ जानेवाला हल्का उभार।
दान करनेवाला व्यक्ति, दाता।
कर-संग्रह करने या दान लेनेवाला।
उ.—(क)तुम जो कहति हौ मेरौ कन्हैया गंगा केसौ पानी। बाहिर तरुन किसोर बयस बर बाट-घाट का दानी—१०-३११। (ख) परुसत ग्वारि ग्वार सब जेंवत मध्य ऊष्ण सुखकारी। सूर स्याम दधि दानी कहि कहि आनँद घोष-कुमारी।
मुहा.- दाने दाने को तरसना— भोजन का बहुत कष्ट सहना।
दाने दाने को महताज— बहुत दरिद्र।
उ.—हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीं सो हमता क्यौं मानौं| प्रगट खंभ तैं दए दिखाई जद्यपि कुल कौ दानो—१-११।
उ. — जल दान्हें कर आनि कहत मुख धोरहु नारी - ३०९०।
उ. — (क) दियौ क्रोध करि सिवहिं सराप करौ कृपा जो मिटै यह दाप — ४-५। (ख) हरि आगे कुबिजा अधिकारनि को जीवै इहिं दाप—२१७१।
उ. — कच कौं प्रथम दियौ मैं साप। उनहूँ मोहि दियौ करि दाप— ९-१७४।
दान का प्रबंध करनेवाला कर्मचारी या सेवक।
मुहा.- दाना-पानी उठना— जीविका न रहना।
दान करनेवाला व्यक्ति, दाता।
उ.—सकल सुख के दानि आनि उर, दृढ़ विश्वास भजौ नँदलालहिं—१-७४।
उ.—कृपा निधान दानि दामोदर सदा सँवारन काज—१-१०९।
उ.— सो प्रभु हैं जल-थल सब ब्यापक। जो है कंस दर्प को दापक— १००१।
मुहा.- दाब में होना वश या अधीन होना।
आतंक, अधिकार, दबदबा, शासन।
मुहा.- दाब दिखाना— अधिकार या हुकूमत जताना।
दाब मानना— वश में या अधीन होना।
दाब में रखना— वश या शासन ममें रखना।
दाब में लाना— वश या शासन में करना।
दाब में होना— वश या शसन में हाना।
शरीर के किसी अंग से जोर लगाना
गुण या महत्व की अधिंकता से दूसरे को हीन कर देना।
बात या चर्चा को फैलने न देना।
उ.—नंद पितु माता जसोदा बाँधे ऊखल दाम—२५८३।
उ.—(क) कहुँ क्रीड़त, कहुँ दाम बनावत, कहुँ करत सिंगार। (ख) निरखि कोमल चारु मूरति ह्रदय मुक्रुता दाम—२५३५।
उ.—लोचन चोर बाँधे स्याम। जात ही उन तुरत पकरे कुटिल अलकनि दाम—पृ. ३२४ (२८)।
मुहा.- दाम दाम भर देना-लेना— कौड़ी-कौड़ी चुका देना-लेना।
उ.—हमसौं लीजै दान के दाम सबे परखाई—१०१७।
मुहा.- दाम उठना— कोई वस्तु बिक जाना।
(किसी वस्तु का) दाम करना (चुकाना)— मोल-भाव करना।
दाम खड़ा करना— मूल्य वसूलना।
दाम भरना— नष्ट करने के कारण किसी चीज का मूल्य देने को विवश होना, डाँड़ देना।
दाम भर पाना— सारा मूल्य पा जाना।
उ.—(क) बालापन खेलत ही खोयौ, जोबन जोरत दाम—१-५७। (ख) कोउ कहै दैहैं दाम नृपति जेतौ धन चाहै—५८९।
उ.—हरि कौ नाम, दाम खोटे लौं, झकि झकि डारि दयौ—१-६४।
राजनीति में धन देकर शत्रु को वश में करने की चाल।
अंगे, कुर्ते आदि का निचला भाग, पल्ला।
मुहा.- बिन दामन मो हाथ बिकानौ— बिना मोल के दश में या अधीन हो गयी। उ.— धन्य धन्य डढ़ नेम तुमारों बिन दामन मो हाथ बिकानी— १७१९।
पल्ला पकड़ने या पाछे पड़ जानेवाला, सिर हो जानेवाला।
उ.—अपनो पिंड पोषिबैं कारन कोटि सहस जिय मारे। इन पापनि तैं कयौं उबरौगे दामनगीर तुम्हारे—१-३३४।
मुहा.- दामनगीर होना— पीछे पड़ना या लगना।
(सं. दाम=(१) रस्सी, (२) लोक + उदर ) (दम अर्थात इंद्रिय-दमन में श्रोठ)
श्रीकृष्ण जो एक बार रस्सी से बाँधे गयॆ थे।
उ. — (क) तौलौं बँधे देव दामादर जौ लौं यह कृत कीनी— सारा. ४५२।(ख) जन-कारन भुज आपु बँधाए वचन कियौ रिषि ताम। ताही दिन तैं प्रगट सूर प्रभु यह दामोदर नाम — २६१।
(सं. दाम=(१) रस्सी, (२) लोक + उदर ) (दम अर्थात इंद्रिय-दमन में श्रोठ)
विष्णु जिनके उदर में सारा विश्व है।
(सं. दाम=(१) रस्सी, (२) लोक + उदर ) (दम अर्थात इंद्रिय-दमन में श्रोठ)
कटी हुई फसल को बैलों से रौंदवा कर दाना-भूसा अलग करने की क्रिया, दवँरी।
किसी की दिया जानेवाला धन।
[सं. स्थिर, हिं. थिर+ना (प्रत्य.)]
मैल बैठने पर जल, तेल आदि का स्वच्छ हो जाना।
द्रवों का हिलना-डोलना बंद करना।
द्रवों को स्थिर करके घुली हुई चीजों को तल में बैठालना।
‘है’ किया का भूत. स्त्री रूप।
उ.—कहि राधा किन हार चोरायौ।¨¨¨¨ प्रेमा दामा रूपा हसा रंगा हरषा जाउ—१५८०।
उ. — घन-दामिनि घरती लौं कौंधै, जमुना-जल सौं पागे — १०-४। (ख) नील बसन तनु, सजल जलद मनु, दामिनि बिवि भुज-दंड चलावति — १०-१४९।
स्त्रियों के सिर का एक गहना, बेंदी, बिंदिया, दावँनी।
उत्तराधिका रियों में बाँटा जा सकनेवाला पैतृक धन।
वह धन जो विवाह में वर-पक्ष को दिया जाय, दहेज, यौतुक।
उ.—कहुँ सुत ब्याह कहूँ कन्या को देत दायजौ रोईं—सारा. २३५।
पैतृक या संबंधी के धन के बटवारे की व्यवस्था।
मुहा.- दायर होना— किसी के समक्ष पेश होना या उपस्थित किया जाना।
उ.—दाया करि मोकौं यह कहिए अमर हाहुँ जेहि भाँति—सारा. १५१।
हिस्सा या दाय पाने का अधिकारी।
मुहा.- दायें होना— अनुकूल या प्रसन्न होना।
उ.—नाम सुनीति बड़ी तिहिं दार। सुरुचि दूसरी ताकी नार—४-९।
फाड़ने या विदीर्ण करनेवाला।
उ.—(क) सुख-संपत्ति दारा-सुत हय-गय झूठ सबै समुद्राइ—१-३१७। (ख) धन-दारा-सुत-बंधु-कुटुँब-कुल निरखि-निरखि बौरान्यौ—१-३१९।
उ.—बेसन दारि चनक करि बान्यौ—१००९।
उ.—सुदामा दारिद्र भंजे कूबरी तारी—१-१७६।
युद्ध में जीत कर लायी गयी दासी।
उ.—जो यह बधू होइरंकाहू की, दारु-ध्वरूप धरे। छूटै देह, जाइ सरिंता तजि, पग सौं परस करे—९-४१।
श्रीकृष्ण के सारथी का नाम जो इनके परम भक्त थे।
उ.—(क) जहाँ न कहू कौ गम दुसह दारुन तम सकल बिधि बिषम खल मल खानि—१-७७। (ख) दुस्सासन अति दारुन रिस करि केसनि करि पकरी—१-२५४। काहै कौ कलह नाध्यौ दारुन दाँवरि बाँध्यौ. कठिन लकुट लैतैं त्रास्पौ मेरे भैया—३७२।
उ.—(क) दारुन दुख दवारि ज्यौं तृन बन नाहिंन बुझति बुझाई—९-५२। (ख) नाहीं सही परति अब मापै दारुन त्रास निसाचर केरी—९९३।
(अनु. थू थू =थूकने का शब्द)
घृणा या धिृक्कार-सूचक शब्द, लानत, फिटकार।
मुहा.- थुड़ी थुड़ी होना— निंदा या तिरस्कार होना।
थूकने की क्रिया, भाव या शब्द।
उ. — अति पूरन पूरे पुन्य, रोपी सुथिर थुनी — १०-२४।
दर्शन शास्त्र से संबंध रखनेवाला।
दर्शन शास्त्र का ज्ञाता व्यक्ति, तत्ववेत्ता।
पानी में उबाला गया दला अन्न जिंसे लोग रोटी-भात के साथ खाते हैं।
उ. — दाल-भात घृत कढ़ी सलोनी अरू नाना पकवान-सारा. १८७।
मुहा.- दाल गलना— दाल का अच्छी तरह पक जाना।
(किसी की) दाल न गलना— (किसी का) मतलब पूरा न होना या काम सिद्ध न होना।
दाल-दलिया— रूखा-सूखा भोजन।
दाल नें कुछ काला होना— किसी काम या बोत में संवेह, खउका या रहस्य होना।
दाल-रोटी- सादा भोजन।
दाल-रोटी चलना- जीविका का निर्वाह होना।
दाल-रोटी से खुश— अच्छी-खासीं हैसियत का, खाता-पीता।
जूतियों दाल ब़ना— बहुत झगड़ा या अनबन होना।
चेचक, फुंसी आदि की पपड़ी या खुरंडा।
मुहा.- दाल छूटना— खुरड अलग होना।
दाल बँधना— खुरंड पडूना।
दूर करने वाले, दमन करने में समर्थ।
उ.—सूरदास प्रभु असुर निकंदन व्रज जन के दुख-दालक—२३६९।
उ.—अति घायल धीरज दुवाहिआ तेज दुर्जन दालि—२८२६।
उ.—जिनि पहिले पलना पौढ़े पय पीवत पूतना दाली—२५६७।
उपयुक्त अवसर, अनुकूल संयोग।
मुहा.- दाँव करना— घात लगाना।
दाँव चूकना- अनुकूल संयोग पाकर भी कुछ लाभ न उठाना।
दाँव ताकना (लगानाँ)— अनुकूल अवसर की ताक में रहना।
दाँव लगना— अनुचित व्यवहार का बदला लेना। उ.— असुर कुपित ह्रै कह्यौ बहुत असुर संहारे। अब लैहौं वह दाँव छाँड़िहौं नहिं बिनु मारे।
उ.—सुनहु सूर याको बन पठऊँ यहै बनैगो दाँव—२९१२।
मुहा.- दाँव पर आना (चढ़ना)— ऐसी स्थिति में पड़ जाना जिससे दूसरे का मतलब सिद्ध हो सके।
दाँव पर चढ़ाना (लाना)— दूसरे को ऐसी स्थिति में डालना जिससे अपना मतलब सिद्ध हो सके।
कुश्ती जीतने की चाल या पेच।
उ.—तब हरि मिले मल्लक्रीड़ा करि बहु बिधि दाँव दिखाये।
मुहा.- दाँव खेलना— चाल चलना, धोखा देना।
मुहा.- दाँव बदना (रखना, लगाना)— खेल या जुए में धन लगाकर हार-जीत होना।
उ.—दाँव बलराम को देखि उन छल कियौ रुक्म जीत्यौ कहन लगे सारे। देव-बानी भयी जीति भई राम की, ताहुँ पै मूढ़ नाहीं सँभारे।
मुहा.- दाँव देना— खेल में हार जाने पर पूर्व-निश्चित दंड भोगना या श्रम करना। उ.— तुमरे संग कहौ को खेलै दाँव देंत नहिं करत रुनैया।
दाँव लेना— खेल में जीत जाने पर हारनेवाले से पूर्वनिश्चित श्रम कराना या दंड देना।
अनाज अलग करने के लिए फसल को बैलों से रौंदवाना।
स्त्रियों का माथे का एक गहना, बंदी।
भोजन का निमंत्रण, न्योता।
गुच्छेदार सुंदर फूलों का एक पौधा।
उ.—(क) ब्रह्म लियौ अवतार, दुष्ट के दावन रे—१०-२८। (ख) हरि ब्रज-जन के दुख-बिसरावन। कहाँ कंस, कब कमल मँगाए, कहाँ दवानल-दावन—६०३।
दाना-भूसा अलग करने के लिए डंठलों को बैलो से रौंदवाना, माँड़ना।
स्त्रियों के माथे का एक गहना, बंदी, दामिनी।
किसी वस्तु को अपनी कहना, किसी वस्तु पर अधिकार जताना।
अधिकार या हक सिद्ध करने के लिए न्यायालय में दिया गया प्रार्थना-पत्र।
दावा करने या अपना हक जतानेवाला।
राजा दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र।
दशरथ के पुत्र श्रीराम आदि।
उ.—ग्राह गहे गजपति मुकराययौ हाथ चक्र लै धायौ। तजि बैकुंठ, गरुड़ तजि, श्री तजि, निकट दास कैं आयौ—१-१०।
वह दृढ़ता या साहस जो यथार्थ स्थिति के निश्चय के कारण व्यक्ति में आ जाता है।
दावा करने, हक जताने या अधिकार सिद्ध करनेवाला।
दावा करने या हक जतानेवाला।
वन की आग जो बाँसों या पेड़ों की टहनियों के रगड़ने से उत्पन्न होकर दूर तक फैलती चली जाती है।
उ. कबहुँ तुम नाहिंन गहरू कियौ।¨¨¨। अघ-अरिष्ट, केसी, काली मथि दावानलहिं पियौ — १-१२१।
स्त्रियों का माथे का एक गहना, बंदी।
उ.—दासी-सुत तैं नारद भयौ। दोष दासपन कौ मिटि गयौ—१-२३०।
[सं. दास + हिं. पन (प्रत्य.)]
उ.—बंदन दासपनौ सो करै। भक्तनि सख्य-भाव अनुसरै—९-५।
दास का व्रत, सेवक का प्रण।
भक्त का प्रण, भक्त का निश्चय।
उ.—मुनि-मद मेटि दास-ब्रत राख्यौ, अंबरीष-हितकारी—१-१७।
सेवक का सेवक, तुच्छ सेवक। (नम्रता-सूचक प्रयोग)।
कुब्जा जो कंस की सेविका थी और जिसे श्रीकृष्ण ने, प्रसिद्धि के अनुसार, अपनाया था।
सूरज स्याम सुध दासी की करो कही बिधि कैसौ—सा. १०४।
उ.— गगन मेध घहरात थहरात गात— ९६०।
गहराई का पता लगाकर, थाह लेकर।
उ. — सूर कहै ऐसो को त्रिभुवन आवै सिंधु थहाइ - पृ. ३२८।
थाह लेना, गहराई का पता लगाना।
किसी की योग्यता, कुशलता, विद्वता, बुद्धि आदि का पता लगाना।
लुकने-छिपने का गुप्त स्थान।
मुहा.- थूक उछालना— बेकार बकना।
थूक लागाकर रखना— कंजूसी से जोड़ जोड़कर रखना।
थूक से (थूकी. सत्तू सानना कंजूसी) के मारे बहुत जरा सी चीज से बड़ा काम करने चलना।
[हिं. थूक + ना (प्रत्य.)]
मुँह से थूक निकाल कर फेंकना।
मुहा.- किसी (वातु या व्यक्त) पर न थूकना— बहुत घृणा करना।
थूकना और चाटना— (१) बात कहना और कहकर मुकर जाना। (२) वस्तु देकर फिर वापस कर लेना।
[हिं. थूक + ना (प्रत्य.)]
मुँह की वस्तु उगलकर फेंकना।
[हिं. थूक + ना (प्रत्य.)]
निंदा या बुराई करना, धिक्कारना।
मुहा.- (क्रोध-आदि) थूकना (थूक देना)— गुस्सा दबा लेना या शांत करना।
घृणा या तिरस्कार सूचक शब्द, छिः।
मुहा.- थू-थू करना— घुणा तिरस्कार प्रकट करना।
थू-थू होना— निंदा या तिरस्कार होना।
नर पशुऒं का लंबा मुँह। थूथन फुलाना (सुजाना)—नाराज होना।
मुहा.- थूथन फुलाना (सुजाना)— नाराज होना।
शव या मुर्दा जलाने की क्रिया।
उ.—अंतर-दाह जु मिटट्यौ ब्यास कौ, इक चित ह्रै भगवान किऐ —१-८९।
भस्म कराने या जलवाने का काम।
(सं. दक्षिण, हीं. दाहिना)
दायाँ, बायाँ का उलटा, दक्षिण
जो घूमने में दाहिनी ऒर से बढ़े।
उ.—अहि मयंक मकरंद कंद हति दाहक गरल जिवाये—२८५४।
उ.—(क) जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि-नाम—१-९२। (ख) जैहै काहि समीप सूर नर कुटिल बचन-दव दाहत—१-२१०। (ग) सूरदास प्रभु हरि बिरहा-रिपु दाहत अंग दिखावत बास—सा. उ. २८।
मुहा.- दाहिनी देना (लाना)— परिक्रमा या प्रदक्षिणा करना।
दाहिनी देहि- प्रदक्षिणा करके। उ.— जटा भस्म तनु दहै वृथा करि कर्म बँधावै। पुहुमि दाहिनी देहि गुफा बसि मोहि न पावै।
मुहा.- दाहिने होना— अनुकूल या प्रसन्न होना।
दाहिने हाथ की तरफ, दाहिनी ऒर।
उ.—बाएँ काग, दाहिनैं खर-स्वर, व्याकुल घर फिरि आई—५४०।
उ.—बड़ी बैस बिधि भयौ दाहिनौ, धनि जसुमति ऐसौ सुत जायौ—१०-२४८।
उ.—चंदन तजि अँग भस्म बतावत बिरह अनल अति दाहीं—३३१२।
उ.—सुरति सँदेस सुनाइ मेटौ बल्लमिनि को दाहु—३०२०।
उ.—पलक न परत चहूँ दिसि चितवत बिरहानल के दाहे—३०७८।
उ.—घर बन कछु न सुहाइ रैनि दिन मनहु मृगी दौ दाहै—२८०१।
जलाने या भस्म करने योग्य।
दिशा-रूपी कन्याएँ जो ब्रह्मा की पुत्रियाँ मानी जाती है।
दिशाऒं के स्वामी ग्रह, यथा-दक्षिण के स्वामी मंगल, पश्चिम के शनि, उत्तर के बुध, पूर्व के सूर्य, अग्निकोण के शुक्र, नैर्ऋत-कोण के राहु, वायुकोण के चंद्रमा और ईशानकोण के वृहस्पति।
दसों दिशाऒं के पालक देवता।
दसों दिशाऒं के पालन-कर्त्ता देवता, यथा पूर्व के इंद्र, अग्निकोण के अग्नि, नैर्ऋतकोण के नैर्ऋत, पश्चिम के वरुण, वायुकोण के मरुत, उत्तर के कुबेर, ईशानकोण के ईश, ऊर्द्ध दिशा के ब्रह्मा, और अधोदिशा के अनंत।
‘देना’ क्रिया के भूतकालिक रूप ‘दिया’ का बहुवचन।
उ.—अरघावन करि हेत दिए (दए)—१०-८५२। इसका प्रयोग संयोजक-क्रिया के रूप में भी होता हे।
उ.—गुरु-सुत आनि दिए जमपुर तैं—१-१८
उ.—चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिए—१०-९९।
सूर्यास्त के पश्चात् भी दिशाओं का जलती-सी दिखायी देना।
उन्नीस मात्राऒं का एक छंद
उ.—तब फिरि जरनि भई नखसिख तें दिआ बात जनु मिलकी—२७८६।
सूखे घाव के ऊपर की पपड़ी, खुरंड दाल।
चौबीस मात्राऒं का एक छंद।
विशिष्ट दिनों में, विशिष्ट दिशाऒं में यात्रा न करने का योग; यथा-शुक्र और रविवार को पश्चिम की ऒर, मंगल और बुध को उत्तर की ऒर, शनि और सोम को पूर्व की ऒर और वृहस्पति को दक्षिण की ऒर।
दिखलाऊँगा, दृष्टिगोचर कराऊँगा।
उ. — हँसि कह्यौ तुम्हैं दिखराइहौं रूप वइ।
(हिं. देखना का प्रे. रूप, दिखलाना )
दिखायी, दृष्टिगोचर करायी।
उ. — कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल १-१५३।
(हिं. ‘देखना’ का प्रे. रूप दिखलाना)
दिखलाऊँ, प्रदर्शि करूँ, दृष्टिगोचर कराऊँ।
उ. — (क) बन बारानसि मुक्ति-छेत्र है, चलि तोकौं दिखराऊँ — १.३४०। (ख) कैसैं नाथहिं मुख दिखराऊँ जौ बिनु देखे जाऊँ — ६-७५। (ग) देखि तिया कैसौ बल करि तोहिं दिखराऊँ — ६-११८।
दिखाये, दृष्टि-गोचर कराये।
उ.— मुख मैं तीनि लोक दिखराए, चकित भई नँदरनियाँ— १०८३।
अनुभव कराना, मालूम कराना।
दिखाया, देखने को प्रवृत्त किया।
उ. — (क) मैं ही भूलि चंद दिखरायौ, ताहि कहत मैं खैहौं — १०-१८९। (ख) माटी कैं मिस मुख दिखरायौ, तिहूँ लोक रजधानी — १०-२-५६।
जताते या अनुभव कराते हैं।
उ.— सूर भजन-महिमा दिखरावत, इमि अति सुगम चरन आराधे — ९५८।
उ. — जसुमति तब नंद बुलावति, लाल लिए कनियाँ दिखरावति, लगन घरी आवति, यातैं न्हवाइ बनावौ —१०-९५। (ख) ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं हरिहिं लिए चंदा दिखरावति — १०-१८८।
अनुभव कराती है, मालूम कराती है, जताती है।
उ.— हा हा लकुट त्रास दिखरावति— १०-३५६।
उ.— करिहौं नाम अचल पसुपतिं कौ, पूजा-बिधि कौतुक दिखरावन— ९-२३२।
मुहा.- थूथनी फैलाना— नाराज होना।
उ.—देख्पौ भरत तरून अति सुंदर। थूल सरीर रहित सब सुंदर - ५-३।
मोटपे के कारण भद्दा, मोटा और थलथल।
उ.—तबहुँ देहुँ जल बाहर आवहु। बाँह उठाइ अंग दिखरावहु—७९९।
(हिं. ’देखना‘ का प्रे. रूप)
दिखाता हे, दृष्टिगोचर कराता है।
उ.—ज्यौं बहु कला काछि दिखरावै, लोभ न छूटत नट कैं—१-२९२।
दिखाऊँ, दृष्टि-गोचर कराऊँ।
उ.—(क) मेरे कहैं नहीं तू मानति दिखरावौं मुख बाइ—१०-२५५। (ख) ब्रत-फल इनहिं प्रगट दिखरावौं।बसन हरौ लै कदम चढ़ावौं—७९९।
दिखाओं, दृष्टि-गोचर कराओ।
उ.—अछत-दूब दल बँधाइ, ललन की गँठि जुराइ, इहै मोहिं लाहौ नैननि दिखरावौ—१०-९५।
दिखलाने की क्रिया या भाव।
वह धन जो दिखाने के बदले में दिया या लिया जाय।
दूसरे को दिखाने में लगाना या प्रवृत्त करना।
[हिं. दिखाना + आव (प्रत्य.)]
[हिं. देखना + आव (प्रत्य.)]
[हिं. देखना + आव (प्रत्य.)]
दूर और नीचे तक देखने का भाव।
[हिं. देखना + आवट (प्रत्य.)]
[हिं. देखना + आवट (प्रत्य.)]
[हिं. दिखावट +ई (प्रत्य.)]
जो सिर्फ देखने के लिए हो, काम न आ सके, दिखौआ।
दिखाते हें या दिख-लाते हुए।
उ.—धर्म-धुजा अंतर कछु नाहीं, लोक दिखावत फिरतौ—१-२०३।
दिखाती है, देखने को प्रवृत्त करती है।
उ.—कुम्हिलानौ मुख चंद दिखावति, देखौ धौं नँदरानि—३६५।
दिखलायँगे, दृष्टिगोचर करायँगे।
उ.—तैसिए स्याम घटा घन-घोरनि बिच बगपाँति दिखावहिंगे—२८८९।
उ.—(क) अपनी भक्ति देहु भगवान। कोटि लालच जौ दिखावहु, नाहिनैं रुचि आन—१-१०६। (ख) अब की बार मेरे कुँवर कन्हैया नंदहि नाच दिखा-वहु—१०-१७९।
[हिं. दिखाना + आई (प्रत्य.)]
वह धन जो देखने के बदले में दिया जाय।
[हिं. दिखाना + आई (प्रत्य.)]
वह धन जो दिखाने के बदले में मिले।
[हिं. दिखाना या देखना + आऊ (प्रत्य.)]
[हिं. दिखाना या देखना + आऊ (प्रत्य.)]
[हिं. दिखाना या देखना + आऊ (प्रत्य.)]
जो सिर्फ देखने लायक हो, काम न आ सके।
[हिं. दिखाना या देखना + आऊ (प्रत्य.)]
उ.पहिले ही अति चतुर हुए अरु गुरु सब ग्रंथ दिखाए—३३७३।
उ.—सूर अनेक देह धरि भूतल, नाना भाव दिखायौ—१-२०५।
अनुभव कराना, मालूम कराना।
[(हिं. दिखाना+वैया (प्रत्य.))]
[(हिं. दिखाना+वैया (प्रत्य.))]
उ.—सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौं दिखाइ बौरावै—१-४३।
दीख पड़ना, सामने आना, प्रत्यक्ष होना।
उ.—प्रगट खंभ हैं दए दिखाई, जद्यपि कुल कौ दानौ—१-११।
[हिं. दिखाना + आई (प्रत्य.)]
[हिं. दिखाना + आई (प्रत्य.)]
दिशाऒं का वस्त्र, अंधकार।
दिशाऒं का वस्त्र धारण करनेवाला, नंगा।
उ.—कहँ अबला, कहँ दसा दिगंबर।
नंगा रहने का भाव, नग्नता।
वह नगर या स्थान जहाँ दिगंबर रहने वाले व्यक्ति बसते हों।
उ.—सूरदास दिगंबरपुर ते रजक कहा ब्यौसाइ—३३३४।
[हिं. देखना + आवा (प्रत्य.)]
ऊपरी तड़क-भड़क, झूठा आडंबर, बनावटीपन।
दिखलाती है, देखने को प्रेरित करती है।
उ.—महा मोहिनी मोहि आतमा, अपमारगहिं लगावै। ज्यौं दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुष दिखावै—१-४२।
दिखायी देता है, जान पड़ता है।
उ.—सूरदास गाहक नहिं कोऊ दिखिअत गरे परी—३१०४।
उ.—कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा, कहँ रँग-रुप दिखैहै—१-८६।
[हिं. देखना + औआ (प्रत्य.)]
जो देखने भर का हो, काम न आ सके; बनावटी।
क्षितिज वृत्त का ३६० वां अंश।
(सं. दिग्गाज=सिंदुर=१. हाथी। २. सिंदुर जिसकी बिंदी लगायी जाती है)
सिंदूर नामक लाल चूर्ण जिसकी बिंदी लगायी जाती है।
उ.—दिगज बिंदु बिजे छन बेनन भानु जुगल अन-रूप उँ ज्यारी—सा. ९८।
[सं. दिक् +हिं. दंतार=दंत +आर (प्रत्य.)]
आठ हाथी जो आठों दिशाऒं की रक्षा के लिए स्थापित हैं। यथा—पूर्व में ऐरावत, पूर्व—दक्षिण में पुंडरीक, दक्षिण में वामन, दक्षिण पश्चिम में कुमुद, पश्चिम में अंजन, पश्चिम-उत्तर में पुष्प-दंत, उत्तर में सार्वभौम, उत्तर-पूर्व में सप्तसीक।
उ.—बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिगदंतीनि सकेलत—१०-६३।
दसों दिशाऒं के पालक देवता, यथा—पूर्व के इंद्र, अग्नि-कोण के वह्रि, दक्षिण के यम, नैर्ऋतकोण के नैर्ऋत, पश्चिम के वरुण, वायुकोण के मरुत, उत्तर के कुबेर, ईशानकोण के ईश, ऊर्द्ध दिशा के ब्रह्मा और अधोदिशा के अनंत।
बिडरि चले धन प्रलय जानि कै, दिगपति दिगदंतीनि सकेलत—१०-५३।
अपना महत्व स्थापित करने के उद्देश्य से राजाऒं का देश देशांतरों में ससैन्य जाकर विजय प्राप्त करने की प्राचीन प्रथा।
उ.—(क) बहुरि राज ताकौ जब गयौ।मिस दिगविजय चहूँ दिसि गयौ—१-२९०। (ख) दिगबिजय कौं जुवति-मंडल भूप परि हैं पाइ—३२२७।
सभी दिशाऒं के राजाऒं को जीतनेवाला।
उ.—राज-अहँकार चढ़ यौ दिगबिजयी, लोभ छत्रकरि सीस। फौज असत-संगति की मेरैं, ऐसौं हौं मैं ईस—१-१४४।
आठ हाथी आठों दिशाओं की रक्षा के लिए स्थापित हैं; पूर्व में ऐरावत, पूर्व-दक्षिणकोण में पुंडरीक, दक्षिण में वामन, दक्षिण-पश्चिमकोण में कुमुद, पश्चिम में अंजन, पश्चिम-उत्तर कोण में पुष्पदंत, उत्तर में सार्वभौम और उत्तर-पूर्व कोण में सप्ततीक।
क्षितिज वृत्त का ३६० वाँ भाग।
दिशाओं का ज्ञान करानेवाला।
उदाहरण-रूप प्रस्तुत आदर्श या नमूना।
आदर्श या नमूना दिखाने का काम।
दिशा-ज्ञान करानेवाली वस्तु।
सूर्यास्त के पश्चात् भी दिशाओं का लाल और जलती हुई सी दिखायी देना।
राजाओं का देश-देशांतरों में जाकर विजय करना और इस प्रकार अपना महत्व स्थापित करना।
उ. — करि दिग्विजय विजय को जग में भक्त पक्ष करवायौ।(२) गुण, विद्वता आदि में दूमरों को पराजित करके स्व-प्रतिष्ठा स्थापित करना।
अँगूठी का घर जिसमें नगीना जड़ा जाता है।
धातु का पत्तर जिस पर मुहर खोदी जाती है।
कार्तिक शुक्ल एकादशीं को विष्णु का शेष-शैया से उठना।
[हिं. दीठ=दृष्टि+इयार या आर (प्रत्य)]
जिसे दिखायी देता हो, देखनेवाला।
उ.—गज अहँकार चढ़यौ दिग्विजयी लोभ छत्र करि सीस।
बहुत से पुरुषों से प्रेंम करनेवाली स्त्री।
[हिं. दीठ=दृष्टि+औना (प्रत्य.)]
नजर लगने से बचाने के लिए बच्चों के माथे पर लगाया गया काजल का बिंदु।
विचार आदि पर दृढ़ रहने का भाव।
विचार या निश्चय पर दृढ़ रहने का भाव।
[सं. दृढ़+आना (प्रत्थ.) ]
[सं. दृढ़+आना (प्रत्थ.) ]
कश्यय ऋषि की स्त्री जो दक्ष प्रजापति की कन्या और दैत्यों की माता थी।
उ.—कस्यप की दिति नारि, गर्भ ताकैं दोउ आए—३-११
सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय।
मुहा.- दिन को तारे दिखाई देना— इतना मानसिक कष्ट होना कि बुद्धि ठिकाने न रहे।
दिन को दिन रात को रात न जानना (समझना)— सुख या आराम की चिंता न करना।
दिन चढ़ना— सूर्योदय के बाद समय बीतना।
दिन छपना (हूबना, बृड़ना, मूँ दना)— संध्या होना।
दिन टलना— सूर्यास्त होने को होना।
दिन दहाड़े या दिन दोपहर— ठीक दिन के समय।
दिन दूना रात चौगुना बढ़ना (हीना)— बहुत जल्दी उन्नति करना।
दिन निकलना (होना)— सूर्योदय होना।
आठ पहर या चौबीस घंटे का समय जिसमें पृथ्वी एक बार अपने अक्ष पर घूम लेती है।
मुहा.- चार दिन— बहुत थोड़ा समय। उ.— चारि चारि दिन सबै सुहागिनि री ह्णै चुकी मैं स्वरूप अपनी— १७६२। दिन-दिन (दिन पर दिन)-हर रोज, सदा। उ.— मैं दिन दिन उनमानी मुहाप्रलय की नीति— ३४५७।
मुहा.- दिन काटना— कष्ट के दिन बिताना।
दिन गँकाना— बेकार समय खोना।
दिन पूरे करना— कष्ट का समय किसी तरह बिताना।
दिन बिगड़ना— बुरे दिन आना।
दिन भुगतना— कष्ट के दिन काटना।
पतले दिन—बुरे, खोटे या कष्ट के दिन।
नियत निश्चित या उचित समय।
उ.—सूर नंद सौं कहति जसोदा दिन आये अब करहु चँड़ाई—११८।
मुहा.- दिन आना— अंत समय आना।
दिन धरना— दिन निश्चित करना या ठहराना।
दिन धराना (सुधाना)— दिन निश्चित करना या मुहूर्त्त निकलवाना।
दिन धराइ (सुधाइ)— मुहूर्त्त निकलवाकर। उ.— पालनो आन्यौ सबहिं अति मन मान्यौ नीको सो दिन धराइ (सुधाइ) सखिन मंगल गवाइ रंगमहल में पौढ़यौ है कन्हैया— १०-४१।
विशेष घटना का काल या समय।
मुहा.- दिन चढ़ना- किसी स्त्री का गर्भवती होना।
दिन पड़ना— बुरा समय आना।
दिन फिरना (बहुरना)- बुरे दिनों के बाद अच्छे दिन आना।
दिन भरना- बुरे दिन बिताना।
दिन उतरना— युवावस्था बीतना।
[सं. दिन + हिं. कंत (कांत)]
उ.—ज्यौं दिन-करहिं उलूक न मानत, परि आई यह टेव—१-१००।
[दिन (=हिं. वार) + चर (=वारचर=वारिचर=पानी में चलनेवाली मछली) + सुत (=मछली-सुत=व्यास) + सुत (व्यास के पुत्र शुकदेव=शुक=तोता)]
उ.—दिनचर-सुत-सुत सरिस नासिका है कपोल श्री भाई—सा. १०३।
दिन में चलने वाला, सूर्य।
मित्र ('मित्र' सूर्य का पर्यायवाची है। इसका दूसरा अर्थ सखा है। वही यहाँ लिया गया है।)
उ.—दिनपति चले धौं कहा जात—सा. ८।
दिनपति-सुत-अरि-पिता-पुत्र-सुत
[सं. दिन-पति (=सूर्य) + सुत (=सूर्य का पुत्र कर्ण) + अरि (कर्ण का अरि या शत्रु अर्जुन) + पिता (=अर्जुन के पिता इंद्र) +पुत्र (=इंद्र का पुत्र बालि) + पुत्र (=बालि का पुत्र अंगद)]
अंगद या बाजूबंद नामक आभूषण।
उ.—दिनपति-सुत-अरि-पिता-पुत्र-सुत सो निज करन सँभारे। मानहु कंज रिच्छ गहि तीजो कंचन भू पर धारे—सा. १३।
[सं. दिनपति (=सूर्य) + सुत (=सूर्य का पुत्र शनि) + पत्नी (=शनि की पत्नी कर्कशा) + प्रिय (=कर्कशा स्त्री का प्रिय कठोर वचन या वाणी)
उ.—लषि वृजचंद चंदमुख राधे। दधि सुतसुत पतिनी न निकासत दिनपति-सुत-पतिनी-प्रिय बाधे—सा. ६।
उ.—(क) लै मुरली आँगन ह्णै देखौ, दिनमनि उदित भए द्विधरी—४०३। (ख) तूल दिनमनि कहा सारँग, नाहिं उपमा देत—७०६। (ग) बिनय अंचल छोरि रबि सौं, करति हैं सब बाम। हमहिं होहु दयाल दिनमनि तुम विदित संसार—७६७।
सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन की अवधि या उसका मान।
ऐसी विषैली वस्तु जिसके खाने से मुत्यु हो जाय।
उ.—काके सिर पढ़ि मंत्र दियौ हम कहाँ हमारे पास दिनाई।
एक दिन का काम या उसकी मजदूरी।
(सं. स्तूप, प्रा. थूप, थूब)
(सं. स्तूप, प्रा. थूप, थूब)
घृणा का तिरस्कार सूचक शब्द।
मिट्टी के खंभे जिन पर गराड़ी की लकड़ी रखी जाती है।
थका-थकाया, सुस्त, परेशान।
थिरक-थिरक कर नाचने की मुद्रा और ताल।
उ.—(क) कालिनाग के फन पर निरतत, संकर्षन कौ बीर। लाग मान थेइ-थेइ करि उघटत, ताल मृदंग गँमीर- ५७५(ख) होड़ा-होड़ी नृत्य करैं रीझि रीझि अंग भरै ताता थेई उघटत हैं हरषि मन — १७८१।
दिनराइ, दिनराई, दिनराउ, दिनराऊ, दिनराज, दिनराय
वह जिसे दिन में दिखायी न दे।
प्रातः, मध्याह्न और सायं—दिन के तीन अंश या भाग।
दिन के पाँच अंश जिनमें प्रत्येक, सूर्योदय के पश्चात् तीन मूहूर्त का होता है; यथा प्रातः, संगव, मध्याह्न, अपराह्न, और सायंकाल
उ.—(क) जा दिना तैं जनम पायौ, यहै मेरी रीति। बिषय-बिष हठि खात, नाहीं डरत करत अनीति—१-१०६। (ख) एक दिना हरि लई करोटी सुनि हरिषी नँदरानी—सारा. ४२१। (ग) अपनी दसा कहौं मैं कासौं बन-बन डोलति रैनि-दिना—१४९१। (घ) माई वै दिना यह देह अछत बिधना जो आनंरी—२९०४।
मुहा.— चार दिना— थोड़ा समय। उ.— दिना चारि रहते जग ऊपर— १०५३।
उ.—भली बुद्धि तेरैं जिय उपजी। ज्यौं-ज्यौं दिनी भई त्यौं निपजी—३९१।
(सं. दिनकर, प्रा. दिनियर)
(सं. दिन + ईश + आत्मज=पुत्र)
(सं. दिन + ईश + आत्मज=पुत्र)
(सं. दिन + ईश + आत्मज=पुत्र)
(सं. दिन + ईश + आत्मज=पुत्र)
(सं. दिन + ईश + आत्मज=पुत्र)
उ. — सिव बिरंचि सनकादि महामुनि सेस सुरेस दिनेस। इन सबहिनि मिलि पार न पायौ द्वारावती नरेस — सारा. ६८४।
[हिं. दिन + अंध +ई (प्रत्य.)]
आँख का एक रोग जिसमें दिन के प्रकाश में कम दिखायी देता है।
चमकते हैं, शोभा पाते हैं।
उ. —नीकन अधिक दिपत दुत ताते अंतरिच्छ छबि भारी — सा. ५१।
वह परीक्षा जो सत्यता या निर्दोषता सिद्ध करने के लिए दी जाय।
(साँझ को) दिया जलाने का काम।
नदी-किनारे की भूमि, कछार।
उ.— (क) मूँडयौ मूँड़ कंठ बनमाला, मुद्रा-चक्र दिये— १-१७१। (ख) तन पहिरे नूतन चीर, काजर नैन दिये— १०-२४।
उ. — (क) करि बल बिगत उबारि दुष्ट तैं, ग्राह ग्रसत बैकुँठ दियौ— १-२६। (ख) मैं यह ज्ञान छली ब्रज-बनिता दियो सु क्यों न लहौं—१० उ. १०४।
मुहा.- दिमाग खाना (चाटना)— बहुत बकवाद करके परेशान कर देना।
दिमाग खाली करना— मगजपच्ची करना।
दिमाग आसमान पर होना (चढ़ना)— बहुत घमण्ड होना।
दिमाग न पाया जाना (मिलना)- बहुत धमण्ड होना।
दिमाग में खलल होना— पागल-सा हो जाना।
बुद्धि, समझ, मानसिक शक्ति।
मुहा.- दिमाग लड़ाना— सोच-विचार करना।
अभिमान, गर्व, घमण्ड, शेखी।
मुहा.- दिमा झड़ना— घमंड चूर होना।
[अ. दिमाग़ + फ़ा. दार (प्रत्य.)]
[अ. दिमाग़ + फ़ा. दार (प्रत्य.)]
दिमाग से संबंध रखने-वाला।
किसी को मार डालने या घायल करने के बदले में आक्रमणकारी को दिया जानेवाला धन।
मुहा.- दिल उछलना— (१) घबराहट होना। (२) प्रसन्नता होना।
दिल उड़ना— बहुत घबराहढ होना।
दिल उलटना— (१) वमन करते-करते परेशान हो जाना। (२) होश हवास जाते रहना।
दिल काँपना— डर लगना।
दिल जलना— (१) कष्ट पहुंचना (२) बहुत बुरा लगना।
दिल जलाना— दुख देना।
दिल टूटना— हिम्मत न रह जाना, निराश हो जाना।
दिल ठंढा करना— संतोष देना।
दिल ठंढा होना— संतोष होना।
दिल थाम कर बैंठ (रह) जाना— रोक कर, वेग दबाकर या मन मसोस कर रह जाना।
दिल धक-धक करना— डर स बहुत घबराना।
दिल घड़कना— (१) डर से घबराना। (२) बहुत चिंतित होना, जी में खटका होना।
दिल निकाल कर रख देना- सबसे प्रिय वस्तु या सर्वस्व दे देना।
दिल पक जाना— बहुत तंग या परेशान हो जाना।
दिल बैठना— हुदय की गति बहुत क्षीण हो जाना।
दिल का बुलबुला बैठना— शोक या दुख के आघात से हृदय की गति रूक जाना।
मुहा.- दिल अटकना— मुग्ध होना, प्रेम होना।
दिल आना— प्रेम करना।
दिल उकताना, उचटना— जी उचाट होना, मन न लगना।
दिल उठाना— (१) विरक्त होना। (२) इच्छा करना।
दिल उमड़ना— चित्त में दुख या दया उमड़ना।
दिल उलटना— (१) घबराहट होना। (२) मन न लगना। (३) घृणा होना।
दिल उठाना— (१) मन फेर लेना। (२) इच्छा करना।
दिल कड़ा करना— साहस या हिम्मत से काम लेना।
दिल कड़ा होना— कठोर साहसी या हिम्मती होना।
दिल कवाब होना— बहुत बुरा लगना, जी जल जाना।
दिल करना— (१) साहस करना। (२) इच्छा करना।
दिल का— जीवटवाला, हिम्मती, साहसी।
दिल का कमल खिलना— बहुत प्रसन्नता होना।
दिल का गवाही देना— किसी बात के करने या न करने अथवा उचित होने न होने का विचार मन में आना।
दिल का गुबार (गुब्बार, बुखार) निकालना— क्रोध दुख या झुँझलाहट में खूब भली-बुरी सुनकर संतोष करना।
दिल का बादशाह— (१) बहुत उदार। (२) मनमौजी।
दिल का भरना (भर जाना)— (१) संतुष्ट होना, छक जाना, मन भर जाना। (२) इच्छा पूरी होना (३) रूचि या इच्छा के अनुकूल काम होना। (४) खटका या संदेह मिटना। (५) दिलजमई होना।
दिल की दिल में रहना। (रह जाना)— इच्छा पूरी न हो सकना।
दिल की फाँस— मन का दुक या कष्ट।
दिल कुढ़ना— मन में दुख या कष्ट होना, जी जलना।
दिल कुढ़ाना— दुख या कष्ट देना, जी जलाना।
दिल कुम्हलाना— मन का खिन्न या उदास होना।
दिल के दरवाजे खुलना— जी का हाल या भेद मालूम होना।
दिल के फफोले फूटना— मन के भाव या चित्त के उद्गार प्रकट होना।
दिल के फफोले फोड़ना— भली बुरी सुनाकर जी ठंढा करना।
दिल को करार होना— जी को धैर्य, शांति या आशा होना।
दिल मसोसना— शोक, क्रोध आदि को प्रकट न करके मन ही में दबाना।
मन मसोस कर रह जाना— शोक, क्रोध आदि को कारणवश प्रकट न कर सकना।
दिल को लगना— (१) किसी बात का मन पर बड़ा प्रभाव पड़ना। (२) बहुत लगन होना।
दिल खट्टा होना— घृणा या विरक्ति होना।
दिल को खटकना— (१) संदेह या चिंता होना। (२) जी हिचकिचाना।
दिल खुलना— संकोच या हिचक न रह जाना।
दिल खिलना— चित्त बहुत प्रसन्न होना।
दिल खोलकर— (१) बिना हिचक या संकोच के, बेधड़क। (२) मनमाना (३) बहुत चाव या उत्साह के साथ।
दिल चलना— (१) इच्छा होना। (२) चित्त चंचल या विचलित होना। (३) मोहित या मुग्ध होना।
दिल, चुराना— किसी काम से भागना या टाल-टूल करना।
दिल जमना— (१) किसी काम में मन या चित्त लगना। (२) किसी विषय या पदार्थ का रूचि के अनुकूल होना।
दिल जमाना— किसी कार्य-व्यापार में ध्यान देना या मन लगाना।
दिल जलना— (१) गुस्सा या जुँजलाहट लगना, कुढ़ना। (२) डाह या ईर्ष्या होना।
दिल जलाना— (१) कुढ़ाना, चिढ़ाना। (२) सताना, दुखी करना। (३) डाह या ईर्ष्या पैदा करना।
दिलजान से जुटना (लगना)— (१) खूब मन लगाना, बहुत ध्यान से काम करना। (२) कड़ी मेहनत करना।
दिल टूट जाना, टूटना— निराशा या निरूत्साह होना।
दिल ठिकाने होना— शान्ति, संतोष या धैर्य होना।
दिल ठुकना— (१) चित्त स्थिर होना। (२) हिम्मत बाँधना।
दिल ठोंकना— (१) जी पक्का करना। (२) हिम्मत बाँधना।
दिल डूबना— (१) मूर्छित होना। (२) घबराहट होना। (३) निराशा होना।
दिल तड़पना— अधिक प्रेम के कारण किसी के लिए जी में बेचैनी होना।
दिल तोड़ना— हिम्मत या साहस भंग करग कर देना।
दिल दहलना— बहुत भय लगना।
दिल दुखना— कष्ट या दुख होना।
दिल देखना— जी की थाह लेना।
दिल देना— प्रेम करना।
दिल दौड़ना— (१) बड़ी इच्छा होना। (२) जी इधर-उधर भटकना।
दिल दौड़ाना— (१) इच्छा करना। (२) सोचना, ध्यान दौड़ाना।
दिल धड़कना— (१) डर से जी काँपना। (२) चित में चिंता होना।
दिल पक जाना— दुख सहते-सहते तंग आ जाना।
दिल पकड़ लेना (कर बैठ जाना)— शोक या दुख के वेग को दबाकर रह जाना— प्रकट न कर पाना।
दिल पकड़ा जाना— संदेह या खुटका पैदा होना।
दिल पकड़े फिरना— मोह-ममता से प्रिय पात्र के लिए भटकते फिरना।
दिल पर न वश होना— जी में अच्छी तरह बैठ जाना।
दिल पर मैल आना— किसी के प्रति पहले का सा प्रेम या सद्भाव न रह जाना।
दिल पर साँप लोटना— किसी की बढ़ती या उन्नति देखकर ईर्ष्या से दुखी होना।
दिल पर हाथ रखे फिरना— मोह-ममता से भटकना।
दिल पसीजना (पिघलना)— पुखी या पीड़ित को देखकर जी में दया उमड़ना।
दिल पाना— मन की थाह पा लेना।
दिल पीछे पड़ना— दुख-शोक भूलकर मन बहलाना।
दिल फटना (फट जाना)— (१) पहले-सा प्रेम या व्यवहार न रहना। (२) उत्साह भंग हो जाना।
दिल फिरना (फिर जाना)— पहले सा प्रेम न रहकर अरूचि या विरक्ति उत्पन्न हो जाना।
दिल फीका होना— घुणा या विरक्ति हो जाना।
दिल बढ़ना— (१) उत्साहित होना। (२) हिम्मत बढ़ना।
दिल बढ़ाना— (१) उत्साहित करना। (२) हिम्मत बढ़ाना।
दिल बह-लना— (१) आनंद या मनोरंजन होना। (२) दुख-चिंता भूलकर दूसरे काम में मन लगना।
दिल बहलाना— (१) आनंद या मनोरंजन करना। (२) दुख-चिंता भूलकर दूसरे काम में मन लगना।
दिल बुझना— मन में उत्साह या उमंग न रहना।
दिल बुरा होना— (१) जी मचलाना। (२) घिन या अरूचि होना। (३) अस्वस्थ होना। (४) मन में दुर्भाव या कपट होना।
दिल बेकल होना— बेचैनी या घबराहट होना।
दिल बैठ जाना (बैठना)- (१) मूर्छा आना। (२) बहुत उदास या खिन्न होना।
दिल बैठा जाना (१) चित्त ठिकाने न रहना। (२) जरा भी उमंग न रह जाना। (३) मूर्छा आने लगना।
दिल मटकना— चित्त का व्यग्र या चंचल होना।
दिल भर आना— मन में दया उमड़ना।
दिल भारी करना— चित्त खिन्न या दुखी करना।
दिल मसोसना— शोक-दुख आदि का वेग दबाना।
दिल मारना— (१) उमंग या उत्साह को दबाना। (२) संतोष करना।
दिल मिलना— स्नेह या प्रेम होना।
दिल में आना— (१) विचार उठना। (२) इच्छा या इरादा होना।
दिल में खुभना (गड़ना, चुभना)— (१) हृदय पर गहरा प्रभाव करना। (२) बराबर ध्यान बना रहना।
दिल में गाँठ (गिरह) पड़ना— अनुचित कार्य-व्यवहार के कारण बुरा मानना।
दिल में घर करना— (१) बराबर ध्यान बना रहना। (२) मन में बसना।
दिल में चुटकियाँ (चुटकी) लेना— (१) हँसी उड़ाना (२) चुभती हुई बात करना।
दिल में चोर बैठना— शंका या संदेह होना।
दिल में जगह करना— (१) बराबर ध्यान बना रहना। (२) मन में बसाना।
दिल में फफोले पड़ना— मन में बहुत दुखी होना।
दिल में फरक आना (बल पड़ना)— शंका या संदेह होना, सद्भाव न रह जाना।
दिल में धरना (रखना)— (१) ध्यान रखना। (२) बुरा मानना। (३) बात गुप्त रखना, अप्रकट रखना।
दिल मैला करना— चित्त में दुर्भाव उत्पन्न करना।
दिल रूकना— (१) जी घबराना। (२) जी में संकोच होना।
(किसी का) दिल रखना— (१) किसी की इच्छा पूरी कर देना। (२) प्रसन्न या संतुष्ट करना।
दिल लगना— (१) मन का किसी काम में रम जाना। (२) मन बहलाना। (३) प्रेम होना।
दिल लगाना- (१) मन बहलाना। (२) प्रेम करना।
दिल ललचाना— (१) कुछ पाने की इच्छा या लालसा होना। (२) मन मोहित होना।
दिल लेना— (१) अपने प्रेम में फँसाना। (२) मन की थाह लेना।
दिल लोटना— मन छटपटाना।
दिल से उतरना (गिरना)— स्नेह, श्रद्धा या आदर का पात्र न रह जाना।
दिल से— (१) खूब जी लगाकर। (२) अपनी इच्छा से।
दिल से उठना— स्वयं कोई काम करने की इच्छा होना।
दिल से दूर करना— भुला देना।
दिल हट जाना— अरूचि हो जाना।
(किसी के) दिल को हाथ में रखना— (किसी के) दिल को हाथ में लेना— किसी के दिल को अपने कार्य-व्यवहार से वश में कर लेना।
दिल हिलना— बहुत भय लगना।
दिल ही दिल में— चुपके-चुपके।
दिल-जान से— (१) खूब मन लगाकर। (२) कड़ा परिश्रम करके।
वह जिससे प्रेम हो, प्रेम-पात्र।
(फ़ा. दिलदारी + ई (प्रत्य.))
[फ़ा. दिलदारी + ई (प्रत्य.)]
प्रेम पात्र, प्रिय व्यक्ति।
देने का काम दूसरे से कराना।
[फ़ा. दिल + हिं. वाला (प्रत्य.)]
[फ़ा. दिल + हिं. वाला (प्रत्य.)]
इत-मीनान, तसल्ली, भरोसा, संतोष।
उदार या दानी होने का भाव।
दिल लगाने की क्रिया या भाव।
हँसी ठट्ठा, मजाक, मखौल, मसखरी।
मुहा.- दिल्लगी उडाना— हँसी में उड़ा देना।
(हिं. दिल्लगी + फ़ा. बाज़)
मस-खरा, मखौलिया, हँसोड़, हँसी- ठिठोली करनेवाला।
(हिं. दिल्लगी + फ़ा. बाज़ी)
यमुना नदी के किनारे बसा हुआ भारत का प्रसिद्ध नगर जो प्राचीन काल से हिंदू-मुसलमान राजाओं की राजधानी होता आया है। सन् ८०३ में अँग्रेजों ने इस पर अधिकार किया था और नौ वर्ष बाद इसको अपनी राजधानी बनाया था। स्वतंत्र भारत की राजधानी के रूप में आज यह नगर संसार में प्रसिद्ध है।
[हिं. दिल्ली +वाला (प्रत्य.)]
दिल्ली से संबंधित, दिल्ली का।
[हिं. दिल्ली +वाला (प्रत्य.)]
दिलाने-वाला —प्राप्त करानेवाला।
देने का काम दूसरे से कराना।
इक्ष्वाकुवंशी एक राजा, ‘रघुवंश के अनुसार जिनकी पत्नी सुदक्षिणा के गर्भ से राजा रघु जन्मे थे।
जिसकी धार तेज न हो, गुठला।
किसी गीली चीज की मोटी तह ऊपर जमाना, छोपना।
उ. —नीलावती चाँवर दिव दुरलभ। भात परोस्यौ माता सुरलभ— ३८६।
उ.— सूरदास प्रभु कृपा करहिंगे सरन चलौ दिवराज।
उ. — एक दिवस हौं द्वार नंद के नहीं रहति बिनु आई— २५३८।
पैर से स्वर्ग को छूनेवाले वामनावतारी विष्णु।
जिसे दिन में दिखायी न दे।
उ. — (क) सिव-बिरंचि नारद मुनि देखत,, तिनहुँ न मौकौं सुरति दिवाई-७-४। (ख) कहा करौं, बलि जाउँ, छोरि तू तेरी सौंस दिवाई - ३६३। (ग) काहू तौ मोहिं सुधि न दिवाई - १०६४। (घ) जो भाई सो सौंह दिवाई तब सूघे मन मान्यौ— २२७५।
(सं. दिवसपति (=सूर्य) + नंदिनी=पुत्री)
(सं. दिवसपति (=सूर्य) + नंदिनी=पुत्री)
[सं. दिवसपति (=सूर्य) + सुत (=सूर्य का पुत्र कर्ण) + माता (=कर्ण की माता कुंती=कुंत=वर्छा)]
उ. — दिवसपति सुतमात अवधि विचार प्रथम मिलाप— सा. ३२।
एक दिन का वेतन या मजदूरी।
उ.— (क) तब तू कहति सबनि सौं हँसि-हँसि अब तू प्रगटहिं भई दिवानी— ११९०। (ख) सूरदास प्रभु मिलिकै बिछुरे ताते भई दिवानी— ३३५९।
वह नायिका जो दिन में पति से मिलने के लिए जाय।
उ.— फगुवा हमको देहु दिवाय—२४१०।
उ.— (क) जय अरू बिजय कर्म कइ कीन्हौ, ब्रह्मसराप दिवायौ—१-१०४। (ख) दोइ लख धेनु दई तेहि अवसर बहुतहि दान दिवायो— सारा. ३९२।
[हिं. देना + दाल (प्रत्य.)]
धन या पूँजी न रह जाने के कारण ऋण चुकाने की अस मर्थता, टाट उलटना।
किसी पदार्थ का बिलकुल खत्म हो जाना।
दूसरे को देने के लिए प्रवृत्त करती है, दिलवाती है।
प्राप्त कराती है, (शपथ आदि) रखती है।
उ. — छाँड़ि देहु बहि जाइ मथानी। सौंह दिवावति छोरहु आनी — ३९१।
भूत-प्रेत की बाधा रोकने के लिए (हाथ) फिरवाती है।
उ. — (क) घर-घर हाथ दिवावति डोलति, बाँधति गरै बघनियाँ — १०-८३।। (ख) घर-घर हाथ दिवावति डोलति, गोद लिए गोपाल बिनानी—१०-२५८।
उ. — (क) सूर भयौ आनंद नृपति-मन दिवि दुंदुभी बजाए—९-२४।
उ. — जैं दिवि भूतल सोभा समान। जै जै सूर, न सब्द आन —९-१६६।
उ. — पाटंबर दिवि-मंदिर छायौ —१००१।
अपराधी या निरपराधी की परीक्षा की एक प्राचीत रीति।
वह स्तोत्र जिसका पाठ करने से अंग-रक्षा हो
व्यक्ति को अपराधी-निर-पराधी सिद्ध करने की प्राचीन परीक्षा-प्रणाली।
ज्ञान-चक्षु अंतःदृष्टि, दिव्यदृष्टि
स्वर्ग से संबंध रखनेवाला, स्वर्गीय।
उ. — आजु दीपति दिव्य दीप मालिका— १०-८०९।
स्वर्ग में रहनेवाले, देवता।
[हिं. देना + वैया (प्रत्य.)]
रूपयों से भरी हुई थैली, तोड़ा।
मुहा.- थैली खोलना थैली से रूपया देना।
मुहा.- थोक करना इकट्ठा या जमा करना। सकै थोक कई- इकट्ठा कर सके। उ.— द्रुम चढ़ि काहे न टेरौ कान्हा, गैयाँ दूरि गयीं।¨¨¨¨। छाँड़ि खेल सब दूरि जात हैं बोले जो सकै थोक कई।
[सं. स्तोक, पा. थोअ + ढ़ा (प्रत्य.)
थोड़-बहुत—कुछ-कुछ किसी कदर।
मुहा.- थोड़ा थोड़ा होना- लज्जित होना। जो करॆ सो थोड़ा बहुत-कुच करना चाहिए।
कम मात्रा में, जरा, तनिक, टुक।
थोड़े परिमाण या मात्रा में।
मुहा.- थोड़े ही- नहीं, बिलकुल नहीं।
किसी इच्छा की सिद्धि के लिए देवता को अर्पित किया जानेवाला पदार्थ।
अंतः दृष्टि, अलौकिक दृष्टि।
तीन प्रकार की नायिकों में एक, स्वर्गीय अथवा अलौकिक नायिका।
तीन प्रकार कॆ नायकों में एक, वह मनुष्य जिसमें देबगुण हों।
तीन प्रकार की नायि काओं में एक, वह स्त्री जिसमें देवियों के गुण हों।
वह अस्त्र जो देवों से मिला हो।
वह अस्त्र जो मंत्रों से चले।
देवता जिनकी उत्पत्ति बिना माता-पिता के मानी जाती है।
क्षितिज-वृत्त के किये गये चार विभागों में से किसी एक की ओर का विस्तार। ये चार विभाग हैं -पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। इनकें बीच के कोणों के नाम ये हैं। पूर्व दक्षिण के बीच अग्निकोण, दक्षिण पश्चिम के बीच नैर्ऋत्य कोण, पश्चिम-उत्तर के बीच वायव्य कोण और उत्तर-पूर्व के बीच ईशान कोण। इन आठ दिशाओं के सर के ऊपर की दिशा को ‘ऊद्र्ध्व’ और पैर के नीचे की दिशा को ‘अधः’ कहते हैं।
दिशाओं के अंत तक, बहुत दूर तक।
समय का वह योग जब विशेष दिशाओं में यात्रा करने का निषेध हो।
सूर्यास्त के पश्चात् भी दिशाओं की जलती हुई सी दिखायी देना।
मुहा.- दिसावर उतरना— विदेशों में भाव गिरना।
[हिं. दिसावर + ई (प्रत्य.)]
विदेश या परदेश से आया हुआ, बाहरी, परदेशी।
उ. — (क) जापर कृपा करै करूनामय ता दिसि कौन निहारै—१-२५४। (ख) सूरदास भक्त दोऊ दिसि का पर चक्र चालाऊँ —
दिशाएँ जिनकी संख्या दस है।
[हिं. दिन + हार (प्रत्य.)]
[हिं. दिन + हार (प्रत्य.)]
(हिं. दिहाड़ा + ई प्रत्य.)
वह स्थान जो सभ्यतादि में पिछड़ा हो।
विवाह में कन्यापक्ष की ओर से वर-पक्ष को दिया जानेवाला सामान आदि।
(सं. दिशा + प, पति = पालक स्वामी, रक्षक)
[हिं. दिसना=दिखना + ऐया (प्रत्य.)]
[हिं. दिसना=दिखना + ऐया (प्रत्य.)]
(सं. देव + हिं. धर=देवहर)
[पू. हिं. में 'देना' क्रिया का भूत. रूप]
मुहा.- दीए का हँसना-दीप की बत्ती से फूल झड़ना।
दीक्षा-संस्कार की समाप्ति पर किया जानेवाला यज्ञ।
महाविद्या-लय या विश्वविद्यालय का उपाधि-वितरणोत्सव।
मंत्र की शिक्षा, मंत्रोपदेश।
उपनयन-संस्कार जिसमें गायत्री मंत्र दिया जाता है।
जिसने आचार्य से दीक्षा ली हो।
दिखायी देता है, दृष्टिगोचर होता है।
जान पड़ता है, मालूम होता है।
उ. दीखति है कछु होवनहारी ४-५।
किसी के मत्थे मढ़ना या लगाना।
उ.—धनुष-बान सिरान, कैधौं गरुड़ बाहन खोर। चक्र काहु चारायो, कैधौं भुजनि-बल भयौ थोर—१-२५३।
मुहा.- जो कीजे सो थोर— इनके लिए जो कुछ किया जाय वह कम होगा। उ.— हरि का दोष कहा करि दीजै जो कीजै सो इनको थोर— पृ.३३५(४०)
उ.—बार-बार डरात तोकौं बरन बदनहिं थोर—३६४।
केले की पेड़ी का बिचला भाग।
उ.—जैसी ही हरी हरी भूमि हुलसावनी मोर मराल सुख होत न थोरनो—२२८०।
उ.— ताहिं कै हाथ निरमोल नग दीजिए— १-२२३।
देना, प्रदान करना। प्र.— अंक दीजियो—गले लगाना।
उ.— तुम लछिमन निज पुरहिं सिधारौ।¨¨¨¨¨। सूर सुमित्रा अंक दिजियौ, कौसिल्याहिं प्रनाम हमारौ—९-३६।
उ.— नर-देही पाइ चित्त चरन-कमल दीजै—।
मुहा.- दीठ मारी जाना— देखने की शक्ति न रहना।
देखने के लिए आँख की पुतली का घुमाव या स्थिति, अवलोकन, चितवन, नजर।
मुहा.- दीठ करना- देखना।
दीठ चुकना— देत न पाना।
दीठ फिरना— (१) किसी दूसरी ओर देखने लगना। (२) कृपादृष्टि न रह जाना।
दीठ फेंकना— नजर डालना।
दीठ फेरना— (१) दूसरी ओर देखना। (२) अप्रसन्न हो जाना, कृपादृष्टि न रखना।
दीठ बचाना— (१) सामने न पड़ना या होना। (२) छिपाना, दूसरे को देखने न देना।
दीठि बाँधना— ऐसा जादू करना कि कुछ का कुछ दिखायी दे।
दीठि लगाना— ताकना।
ज्योति प्रसार जिससे रूप रंग का बोध हो।
मुहा.- दीठ पर चढ़ना— (१) अच्छा लगना, पसंद आना, निगाह में जँचना। (२) आंखों को बुरा लगना, नजरों में खटकना।
दीठ बिछाना— (१) बड़ी उत्कंठा से प्रतीक्षा करना। (२) बड़ी श्रद्धा और प्रीत से स्वागत करना।
दीठ में आना (पड़ना)— दिखायी पड़ना। दीठे में समाना— भला या प्रिय लगने के कारण बराबर ध्यान में बना रहना।
दीठि से उतरना (गिरना)— श्रद्धा, प्रीति या विश्वास के योग्य न रह जाना।
किसी अक्छी चीज पर ऐसी कुदृष्टि पड़ना जिसका प्रभाव बहुत बुरा हो, कुदृष्टि, नजर।
मुहा.- दीठ उतारना (जाड़ना)— मंत्र द्वारा नजर या कुदृष्टि का बुरा प्रभाव दूर करना।
दीठि खा जाना (चढ़ना, पर चढ़ना)— कुदृष्टि पड़ना, मजर लगना, हूँस में आना, टोंक लगना।
जीठि जलना— नजर या कुदृष्टि का प्रभाव दूर करने के लिए राई-नोन का उतारा करके जलाना।
देखने के लिए खुली हुई आंख।
मुहा.- दीठि उठाना— निगाह ऊपर करके देखना।
दीठ गड़ाना (जमाना)— एकटक देखना या ताकना।
दीठ चुराना— लज्जा, भय आदि से सामने म आना।
दीठ जुड़ना (मिलना)— देखा देखी होना।
दीठ जोढ़ना (मिलाना)— देखा-देखी करना।
दीठी फिसलना— आंख में चकाचौंध होना।
दीठ भर देखना— जी भरकर या अच्छी तरह देखना।
दीठ मारना— (१) आंख से संकेत करना। (२) आंख के संकेत से माना करना।
दीठ लगना— देखा-देखी के वाद प्रेम होना।
दीठ लड़ना— देखा देखी होना।
दीठ लड़ाना— आंख के सामने आंख किये रहना, एकटक देखना।
कृपादृष्टि, भलाई का ध्यान।
ऐसा जादू या इन्द्रजाल कि कुछ का कुछ दिखायी दे।
ऐसी माया या जादू कि कुछ का कुछ दिखायी दे।
जिसे दिखायी दे, जिसके आंखें हों।
उ.—(क) उनकी मोसौं दीनता कोउ कहिं न सुनावौ—१-२३७।
अधीनता का भाव, विनीत भाव।
उ.—कोमल बचन दीनता सब सौं, सदा अनंदित रहियै—२-१८।
उ.—आइ निकट श्रीनाथ निहारे, परी तिलक पर दीठि—१-२७४।
उ.—(क) लालन वारी या मुख ऊपर। माई मेरिहि दीठि न लागै, तातैं मसि-बिंदा दियौ भ्रू पर—१०-९२। (ख) खेलत मैं कोउ दीठि लगाई, लै लै राई लौन उतारति—१०-२००। (ग) कुँवरी कौं कहु दीठि लागी, निरखि कै पछि-ताइ—६९६।
मुहा.- दीदा लगाना (जमना)— जी लगना, मन रमना।
दीदे का पानी ढल (में पानी रह) जाना— निर्लज्ज हो जाना।
दीदा निकालना— (१) आंख फोड़ना। (२) क्रोध से देखना।
दीदा पट्ट होना— (१) अंधा होना। (२) अक्ल कुंद होना।
दीदा फाड़कर देखना— विस्मय या आश्चर्य से एकटक निहारना।
दीदा मटकाना— आँख चमकाना।
सूर्य-चन्द्रमा आदि की किरण।
उ.—(क) सूर दीन प्रभु-प्रगट-बिरद सुनि अजहूँ दयाल पतत सिर नाई—१-६। (ख) सूरस्याम सुन्दर जौ सेवै क्यौं होवै गति दीन—१-४६। (ग) तुमहिं समान और नहिं दूजौ, काहि भजौं हौं दीन—१-१११।
उ.—(क) पानि-ग्रहन रधुबर बर कीन्हयौ जनक-सुता सुख दीन—९-२६। (ख) जिन जो जाँच्यौ सोई दीन अस नँदराइ ढरे—१०-२४। (ग) षंडामर्क जो पूछन लाग्यौ तब यह उत्तर दीन—सारा. ११२। (घ) दीन मुक्ति निज पुर की ताकौं—सारा. २७३।
उ.—दीननाथ अब बारि तुम्हारी—१-११८।
[सं. दीन + हिं. नि (प्रत्य.)]
उ.—जब जब दीननि कठिन परी। जानत हौं करुनामय जन कौं तब तब सुगम करी—१-१६।
उ.—दीन-बंधु हरि, भक्त -कृपानिधि, वेद-पुराननि गाए (हो)—१-७।
[हिं. दीन + हिं (प्रत्य.)]
उ.—कह दाता जो द्रवै न दीनहिं, देखि दुखित ततकाल—१-१५९।
दीनों का स्वामी या रक्षक, दुखियों का पालक और सहायक।
उ.—दीनानाथ दयाल मुगारि—७-२।
सोने का एक प्राचीन सिक्का।
उ.—(क) नर-देही दीनी सुमिरन कौं—१-११६। (ख) बकी जु गई घोष मैं छल करि, जसुदा की गति दीनी—१-१२२। (ग) बिभीषण कौ लंक दीनी—१-१७६। (घ) तिल-चाँवरी गोद करि दीनी फरिया दई फारि नव सारी—७०८।
उ.—पारथ बिमल बभुबाहन कौं सीस-खिलौना दीनौ—१-२९।
प्र.—मन दीनौ—मन लगाया, चित्त रमाया।
उ.—भाव-भत्कि कछु हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ—१-६५।
उ.—बड़े पतित पासंगहु नाही, अजामिल कौन बिचारौ। भाजे नरक नाम सुनि मेरौ, जम दीन्यौ हठि तैरौ—१-१३१।
उ.—बिप्र सुदामा कौं निधि दीन्हीं—१-३६।
उ.—असुर-जोनि ता ऊपर दीन्ही, धर्म-उछेद करायौ—१-१०४।
उ.—हरि की माया कोउ न जानै आँखि धूरि सी दीन्ही—९६४।।
उ.—कवै भपौनरक से प्रोसौ, दीन्हे रहत किवार—१-१४१।
उ.—बिनु दीन्हैं ही देत सूर-प्रभु ऐसे हैं जदुनाथ-गुसाईं—१-३।
उ.—(क) बारह बरस बसुदेव देवकिहिं कंस महा दुख दीन्हौ—१-१५। (ख) निकसे खंभ-बीच तैं नरहरि, ताहि अभय पद दीन्हौ—१-१०४।
उ.—अंजन दोउ दृग भरि दीन्हौ—१०-१८३।
उ.—मागध हत्यौ, मुक्त नृप कीन्हें, मृतक बिप्र-सुत दीन्ह्यौ—१-१७।
उ.— धूप-नैवेद्य साजि कै, मंगल करै विचारि—३०-५०।
उ. — कंसहिं कमल पठाइहै, काली पठवै दीप—५८९।
उ.— दीपक पीर न जानई (रे) पावक परत पतंग—१-३२५।
प्रकाश करने या फैलानेवाला।
उ.—बासुदेव जादव कुल-दीपक बंदीजन बर भावत—२७२९।
बढ़ाने या वृद्धि करनेवाला।
(हिं. दीपक + जात=उत्पन्न)
उ.— अलिहता रँग मिट्यौ अधरन लग्यौ दीपकजात—२१३०।
बड़ी दीयट जिसमें कई दीपक रखें जा सकें।
संध्याकाल जब दीप जलता है।
देवनागरी वर्णमाला का अठारहवाँ और तवर्ग का तीसरा व्यंजन; इसका उच्चारण स्थान दंतमूल है।
उ.—जब रथ साजि चढ़ौं रन सनमुख जीय न आनौं दंग। (तंक) राघव सैन समेत सँहारौं करौं रुधिरमय अंग—(पंक)—६-१३४।
दंगा या झगड़ा करनेवाला, उपद्रवी।
दंगा करने का भाव, उपद्रव।
उ.—दधि-सुत दीपत तज मुरझानो दिनपति-सुत है भूषन हीन-सा. ९६।
उ.— भू-सुत-सत्रु गेह में काडू दीपत द्वार दई —सा. ३१।
प्रकाशित होता है, चमकता है।
उ.— रामदूत दीपत नछत्र में पुरी धनद रूचि रचि तमहारी—सा.९८।
चमकता हुआ, प्रकाश फैलाता हुआ।
प्रकाशित होती है, चमकती है।
उ.— आज दीपति दिव्य दीपमालिका—८०९।
पूजा का एक अंग जिसमें देवता के सामने दीपक जलाया जाता है।
कार्तिक में राधादामोदर के लिए दीपक जलाने का कृत्य।
एक क्रिया जिसमें मरणासन्न के अथवा मृत व्यक्ति के हाथ से आटे के जलते हुए दीप का संकल्प कराया जाता है।
उ.— भस्म अंत तिल-अंजलि दीन्हीं देव बिमान चढ़ायौ। दिन दस लौं जल कुंभ साजि सुचि, दीपदान करवायौ—९-५०।
दीपक का समान-घी, बत्ती आदि—रखने की डिबिया।
प्रकाश के लिए जलाने की क्रिया।
वेग या उमंग को उत्तेजित करने की क्रिया।
बढ़ाने या उत्तेजित करनेवाला।
मंत्र-सिद्धि का एक संस्कार।
जलते हुए दीपकों की पंक्ति।
जली हुई बत्तियों का समूह।
दीपकों की पंक्ति या समूह।
उ.— आज दीपति दिव्य दीपमालिका—८०९।
दीपदान या आरती के लिए जलायी गयी बत्तियों की पंक्ति।
उ.—दीपमालिका रचि-रचि साजत। पुहुपमाल मंडली बिराजत।
उ.—दोउ रूख लिये दीपिका मानो किये जात उजियारॆ—२१९०।
एक रागिनी जो प्रदोषकाल में गायी जाती है।
[सं. द्विप, हिं. दीप + पै (प्रत्य.)]
उ. — तद्यपि भवन भाव नहिं ब्रज बिनु खोजौ दीपै सात—३३५१।
जिसका शरीर कुन्दन सा चमकता हो।
सूर्य से प्रकाशित (दिशा)।
जिसकी आँखें खूब चमकती हों।
जिसकी पाचन शक्ति तीव्र हो।
अगस्त्य मुनि जिन्होंने समुद्र पी डाला था और वातापि राक्षस को पचा डाला था।
सत्यभामा से उत्पन्न श्रीकृष्ण का एक पुत्र।
उ.— (क) मंत्री काम कुमति दीबे कौं, क्रोध रहत प्रतिहारी —१-१४४। (ख) या छबि की पटतर दीबे कौं सुकवि कहा टकटोहै—१०-१५८।
देने या प्रदान करने की क्रिया।
मुहा.- दीया जलना (जले)— संध्या होना (होने पर)।
दीया जलाना— दिवाला निकालना।
दीया ठंढ़ा करना— दिया बुजाना।
दिया ठंढा होना— दिया बुझना।
किसी के घर का दीया ठंढ़ा होना— किसी कें वंश में पुत्र न रहने से घर में रौनक न रह जाना।
दीया बढ़ाना— दीप बुझाना।
दीया-बत्ती करना— रोशनी का सामान करना।
दीया लेकर ढूंढना— बहुत छानबीन करना।
बत्ती जलाने का पात्र या बरतन।
उ.—नृप कह्यौ, इंद्रपुरी की न इच्छा हमैं, रिषिनि तब पूरनाहुती दीयौ—४-११।
उ.— इन पै दीरघ धनुष चढ़ौ क्यौं, सखि, यह संसय मोर—९-२३।
गुरू या दीर्घ मात्रावाला।
उ. पाछिले कर पहिल दीरघ बहुरि लघुता बोर— सा. ११०।
लंबाई, बड़ापन, (लघु का विपरीतार्थक), अधिकता
उ.— (क) तप अरू लघु-दीरघता सेवा, स्वामि-धर्म सब जगहिं सिखाए —९-१६८। (ख) लघु-दीरघता कछू न जानैं, कहुँ बछरा कहुं धेनु चराए —१०-३०९।
दीर्घ या गुरू मात्रावाला।
गुरू या द्विमात्रिक वर्ण।
मुहा.- दंगल में उतरना- कुश्ती लड़ने को तैयार होना।
[हिं. दंगा + ऐत (प्रत्य.)]
उ.—(क) जानु-जंध त्रिभंग सुंदर, कलित कंचन-दंड—१-३०७। (ख) पिनाकहु के दंड लौं तन लहत बल सतराइ —३-३। (ग) बटुआ झोरी दंड अधारा इतने न को आराधै—३२८४।
मुहा.- दंड ग्रहण करना- संन्यास लेना।
ऊँट (जो लंबे डग रखता है)।
जिसके लंबे-लंबे पत्ते हों।
एक राक्षसी जो विरोचन की पुत्री थी और जिसे इंद्र ने मारा था।
एक ऋषि जिनके रचे मंत्र ऋग्वेद के पहले मंडल में हैं।
दूर तक सोचने की क्रिया, भावना या क्षमता, दूरदर्शिता।
दूर तक की बात सोचनेवाला, दूरदर्शी।
लंबी साँस जो दुख-शोक में ली जाती है।
बहुत समय तक यज्ञ करनेवाला।
जिसका नाम दूर-दूर तक फैला हो।
बहुत दिनों में समाप्त होने-वाला एक यज्ञ।
ऐसा दरबार जिसमें राजा से साधारण लोग भी मिल सकें।
बड़े आदमियों के घर की बैठक।
ऐसा दरबार जिसमें राजा चुने हुए व्यक्तियों के साथ बैठता है।
मुहा.- किसी के पीछे दीवाना होना— उसको प्राप्ति के लिए पागल या बेचैन होना।
[फ़ा. दीवाना + हिं. पन (प्रत्य.)]
धन-व्यवहार-संबंधी न्यायालय।
पत्थर, ईंट आदि से बना ऊँचा परदा या घेंरा, भीत।
किसी वस्तु का उठा हुआ घेरा।
दिया आदि का आधार जो दीवार में लगाया जाता है।
कार्तिकी अमावास्या को मनाया जानेंवाला हिंदुओं का एक उत्सव जिसमें लक्ष्मी का पूजन करके दीपक जलायें जाते हैं।
उ.— गरजत रहत मत गज चहुँ दिसि, छत्र-धुजा चहुँ दीस —९-८५।
ग्रीष्म ऋतु, जब दिन बड़े होते हैं।
(सं. दीपस्थ, प्रा. दीवट्ठ)
[हिं. दीवा + ला (प्रत्य.)]
राज्य-प्रबन्धकर्त्ता मंत्री, प्रधान।
उ. —भक्त ध्रुव कौं अटल पदवी, राम के दीवान—१-२३५।
उ.— (क) जहाँ तहाँ दीसत कपि करत राम-आन—९-९६। (ख) उड़त धूरि, धुँआँ धुर दीसत सूल सकल जलधार—१० उ. २।
उ.— (क) वै लखि आये राम रजा। जल कैं निकट आइ ठाढ़े भये दीसति बिमल ध्वजा—। (ख) उज्ज्वल असित दीसति हैं दुँहु नैननि-कोर—।
जान पड़ती है, मालूम होती है।
उ.— राजा कह्यौ, सप्त दिन माहिं। सिद्धि होत कछु दीसति नाहिं—१-३४१।
दो पक्षों में होनेवाला जगड़ा।
उ.— कहा करौं हरिबहुत खिझाई।¨¨¨¨¨। भोर होत उरहन लै आबहिं, ब्रज की बधू अनेक। फिरत जहाँ तहै दुंद मचावत घर न रहत छन एक—३८८।
उ. — अरून अधरनि दसन झाई कहौं उपमा थोरि। नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५।
उ.— राज-पाट सिंहासन बैठो, नील पदुम हूँ सों कहै थोरी।¨¨¨¨। हस्ती दॆखि बहुत मन-गर्वित, ता मूरख की मति है थोरी — १३०३।
मुहा.- जा कछु कह्या से थोरी (१) ऐसा (अनुचित कार्य किया है कि चाहे जितना बुरा भला या उचित अनुचित कहा जाय, कम है। (२) बहुत-कुछ कहा जा सकता है। उ.— सूरदास प्रभु अतुलित महिमा जो कछु कह्यौ सो थोरी— १० उ.-५२।२. मामूली, साधारण सी, तुच्छ। उ.— बौट न लेहु सबै चाहत है, यहै बात है थारी— १०-२६७।
उ. — (क) थोरे जीवन भयो भारौ — १-१५२। (ख) की यहि गाउँ बसत की अनतहिं दिननि बहुत की थोरे — १२६०।
उ. — थोरेक ही बल सौं छिन भीतर दीनौ ताहि गिराइ — ४१०।
थोड़े (के ही लिए), जरा से (के लिए)।
उ. — सुनहु महरि ऐसी न बुझिए , सुत बाँघति माखन दधि थोरैं — ३४४।
उ. — औगुन और बहुत हैं मो मैं, कह्यौ सूर मैं थोरौ - १-१८६।
उ.— देख्यौ भरत तरून अति सुन्दर। थूल सरीर रहित सब दुंदर—५-३।
उ.— जुरी ब्रज सुंदरी दसन छबि कुंदरी कामतनु दुंदरी करनहरी—१२६०।
उ.— हरि कह्यौ, मम हुदय माहिं तू रहि सदा, सुरनि मिलि देव-दुंदभि बजाई—८-८।
एक राक्षस जिसे मारकर ऋष्यमूक पर्वत पर फेंक देने पर बालि को वहाँ न जाने का शाप मिला था।
जिस (काम) का करना कठिन या मुश्किल हो।
जिसके अंत में कष्ट मिलें।
जिसके अंत में कष्ट या दुख का वर्णन हो।
जिस (स्त्री) पर दुख पड़ा हो।
ऐसा लक्षण या दर्शन जिसका फल बुरा समझा जाता हो।
धुतराष्ट्र की पुत्री जो जयद्रथ की व्याही था।
धृतराष्ट्र का एक पुत्र जो दुर्योधन का प्रिय पात्र और मंत्री था।
जिस (व्यक्ति) का सुधार करना कठिन हो।
जिस (धातु आदि) का शोधना कठिन हो।
काव्य का एक दोष जो उसमें कर्णकटु वर्ण आने से माना जाता है।
दुख से पीड़ित, बहुत दुखी।
जो कष्ट से प्राप्त हो सके।
व्यर्थ का या निरर्थक साहस जिससे कुछ लाभ न हो।
अनुचित साहस, ढिठाई, धृष्टता।
जिस (कार्य) का करना निष्फल या अनुचित हो।
निष्फल या अनुचित साहस के काम करनेवाला।
जिसकी स्थिति अच्छी न हो, दुर्दशा में पड़ा हुआ।
जिसका छूना या पाना कठिन हो।
बुरा या अनुचित विचार रखनेवाला।
बुरे लोगों का साथ, कुसंग।
काव्य का एक रस जो बेमेल बातों को सुनकर होता है।
जिसका उपाय या उपचार करना कठिन हो।
ऐसा स्वप्न जिसका फल बुरा हो।
‘दो’ का संक्षिप्त रूप जो समास-रचना के काम आता है।
दो नदियों के बीच का उपजाऊ भू-भाग।
उ.— (क) मानिनि बार बसन उघार। संभु कोप दुआर आयो आद को तनु मार —सा. ८९। (ख) देखि बदन बिथ-कित भईं बैठी हैं सिंह-दुआर —२४४३।
द्वार का शत्रु, कपाट या किवाड़।
उ.— छूटे दिन दुआर के बैरी लटकत सो न सम्हार-सा. ८३।
उ.— दुइ मृनाल मातुल उभे द्वै कदली खंभ बिन पात-सा. उ. ३।
मुहा.- दुइ नाव पाँव धरि- दो नावों पर पैर रखकर, दो ऐसे पक्षों का आश्रय लेकर जो साथ-साथ न रह सके, न हो सकें। उ.— दुई तरंग दुइ नाव पाँव धरि ते कहि कवन न मूठे।
मुहा.- दुकान उठाना— दूकान बंद करना।
दुकान बढ़ाना— दूकान बंद करना।
दुकान लगाना— (१) दूकान का सामान आकर्षक ढंग से सजाना। (२) बहुत सी चीज इधर-उधर फैलाना।
वह जो ढोंग या तिकड़म से पैसा बनाता हो।
तिकड़म से धन पैदा करने का काम।
उ.—परयौ जो रेख ललाट और मुख भेंटि दुकार बनायौ—३३८८।
खोयी हुई चीज की खोज, सुराग।
चोरी का माल लेने या रखनेवाला।
इक्ष्वाकु राजा का एक पुत्र।
एक घड़ी या चौबिस मिनट का समय।
उ. -- एक दंड दूदसी सुनायी - १००१।
२६ से अधिक वर्णों का छंद।
इक्ष्वाकु राजा का एक पुत्र जो शुक्राचार्य का शिष्य था और गुरु-कन्या का कौमार्य भंग करने के कारण जो अपने राज्य-सहित भस्म होगया थाः
[(हिं. दुकड़ा + हा (प्रप्य.)]
जिसका मूल्य एक दुकड़ा हो।
[(हिं. दुकड़ा + हा (प्रप्य.)]
[(हिं. दुकड़ा + हा (प्रप्य.)]
[सं. द्विक + ड़ा (प्रप्य.)]
[सं. द्विक + ड़ा (प्रप्य.)]
दो घोड़ों की बग्घी या गाड़ी।
सूत या तीसी के रेशे से बना कपड़ा।
वस्त्र का समूह, कपड़े का ढेर।
उ.— रिपु कच गहत द्रुपद-तनया जब सरन सरन कहि भाषी। बढ़ौ दुकूल-कोट अंबर लौं सभा माँझ पति राखी—१-२७।
[हिं. दुक्का + एला (प्रत्य.)]
जिसके साथ की दूसरा भी हो।
अकेला-दुकेला-जिसके साथ कोई न हो या एक ही दो मामूली आदमी हों।
अकेला-दुकेला-जिसके साथ कोई न हो या एक ही दो मामूली आदमी हों।
अकेले-दुकेले—बिना किसी को साथ लिये या एक ही दो आदमियों के साथ।
जो किसी (व्यक्ति) के साथ हो।
ताश का एकपत्ता जिसमें दो बूटियाँ हों।
उ.—बारह बरस बसुदेव-देवकहिं कंस महा दुख दीन्हौ—१-१५।
[हिं. दुख + ड़ा (प्रत्य.)]
मुहा.- दुखड़ा रोना— दुख का हाल कहना।
[हिं. दुख + ड़ा (प्रत्य.)]
मुहा.- (स्त्री पर) दुखड़ा पड़ना— (स्त्री का) विधवा हो जाना।
दुखड़ा पीटना (भरना)— बहुत कष्ट भोगना।
(सं. दुःखदायिन्, हिं. दुखदायी)
दुख देनेवाला। जिससे कष्ट मिले।
उ.—(क) कह्यौ वृषभ सौं, को दुखदाइ? तासु नाम मोहिं देहु बताइ—१-२९०। (ख) कोउ कहै सत्रु होइ दुखदाई—१-२९०।
[सं. दुःख + दान +ई (प्रत्य.)]
उ.—(क) भ्रम्यौ बहुत लघु धाम बिलोकत छन-भंगुर दुख दानी—१-८७। (ख) दरस-मलीन, दीन दुरबल अति, तिनकौं मैं दुख दानी। ऐसौ सूरदास जन हरि कौ, सब अधमनि मैं मानी—१-१२९।
दुख दूर करनेवाले, क्लेश मिटानेवाले।
उ.— सूरदास सठ तातैं हरि भजि, आरत के दुख-दाहक—१-१९।
उ.—छन महँ सकल निसाचर मारे। हरे सकल दुख-दुंद हमारे।
[सं. दुःख + नि (प्रत्य.)]
उ.— जिहिं जिहिं जोनि भ्रम्यौ संकट-बस, सोइ-सोइ दुखनि भरि—१-८१।
कष्ट-समूह, अनेक प्रकार के दुख, दुख की अधिकता, अधिक दुख।
उ.—मैं अज्ञान कछू नहिं समुझयौ, परि दुख-पुंज सह्यौ—१-४६।
दुख का समुद्र, अथाह समुद्र के समान महान दुख, महान क्लेश।
[हिं. दुख + हाया (प्रत्य.)]
मुहा.- जी दुखाना— मानसिक कष्ट देना।
किसी पीड़ित या पके हुए अंग को छू देना।
[हिं. दुख + आर (प्रत्य.)]
[हिं. दुखारी=दुख + आर (प्रत्य.)]
उ.—कुलिसहुँ तैं कठिन छतिया चितै री तेरी अजहुँ द्रवति जो न देखति दुखारि—३६१।
[हिं. दुख + आर (प्रत्य.)]
उ.— (क) सूरदास जम कंठ गहे तैं, निकसत प्रान दुखारे—१-३३४। (ख) इती दूर स्त्रम कियो राज द्विज भए दुखारे—१० उ. ८।
उ.—(क) रसना द्विज दलि दुखित होत बहु, तउ रिस कहा करै—१-११७। (ख) कुरूच्छेत्र मैं पुनि जब आयौ। गाइ बृषभ तहाँ दुखित पायौ—१-२९०। (ग) जननि दुखित करि इनहिं मैं लै चल्यौ भई ब्याकुल सबै घोष नारी—१५५१।
[हिं. दुख + इया (प्रत्य.)]
उ.—पाऊँ कहाँ खिलावन कौ सुख, मैं दुखिया, दुख कोखि जरी—१०-८०।
जो दुख में पड़ा हो, दुखी।
जिसे शारीरिक कष्ट हो, रोगी।
[(हिं. दुख + ईला (प्रत्य.)]
दुख अनुभव करने या माननेवाला (स्वभाव)।
दुख, पीड़ा या कष्ट अनुभव करने की प्रकृति।
[हिं. दुख + औहाँ (प्रत्य.)]
मुहा.- दुगदुगी में दम— मरने के समीप।
गले से छाती तक लटकनेवाला एक गहना।
(सं. द्विगुण, हिं. दुगना)
दुर्ग के समीप या नीचे बसा हुआ गाँव।
पुराणों के अनुसार सात समुद्रों में से एक, क्षीरसमुद्र, क्षीरसागर।
उ.— स्वास उदर उससित यों मानौ दुग्ध-सिंधु छवि पावै —१०-६५।
(हिं. दो + घड़ी + सं. मुहुर्त्त)
दो-दो घड़ियों का निकाला हुआ महूर्त।
छत जो दोनों ओर को ढालू हो।
जो दुबिधा में हो, अस्थिर चित्त।
दुबिधा, चित्त की अस्थिरता।
उ.— साँची कहहु देख स्त्रवनन सुख छाँढ़हु छिआ कुटिल दुचिताई—।
जो दुबिधा में हो, अस्थिर चित्त।
उ.—देखत कपि बाहु-दंड तन प्रस्वेद छूटै—९-९७।
भूमि पर गिरकर किया हुआ प्रणाम, दडवत्।
मुहा - दंड पड़ना - घाटा या हानि होना। दंड भरना - (सहना) - १. जुरमाना देना। २. दूसरे का घाटा स्वयं पूरा करना। दंड भुगतना (भोगना) - १. सजा भुगतना। २. जान बूझकर कष्ट सहना।
चिंतित, जिसके मन में खटका हो।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातियाँ जो यज्ञोपवीत संस्कार के बाद नया जन्म धारण करती मानी गयी हैं।
दो टुकड़ों में तोड़ा हुआ।
उ.— किया दुटूक चाप देखत ही रहे चकित सब ठाढ़े।
मुहा.- दुटूक बात— साफ-साफ बात जिसमें घुमाव-फिराव, राजनीति या छल-कपट न हो।
तिरस्कार के साथ हटाने के लिए बोला जानेवाला शब्द।
बच्चों के लिए स्नेंह-सूचक शब्द।
‘दुत’ कहकर किसी को तिरस्कार के साथ हटाना।
प्रत्येक पक्ष की दूसरी तिथि, दूज, द्वितीया।
उ.— (क) वै देखौ रघुपति हैं आवत। दूरहिं तैं दुतिया के ससि ज्यौं, ब्योम बिमान महा छबि छावत—९-१६७। (ख) दुतिया के ससि लौं बाढ़ै सिसु देखौ जननि जसोइ—१०-५६।
चमकीला, कांतिवान, आभायुक्त, प्रकाशवान्।
उ.—दुती लगन में है सिव-भूषन सो तन को सुखकारी— सा. ८१।
फूटने या टूटने पर जिसके दो बराबर खंड हो जायें।
दुबिधा में पड़ा हुआ, दुचिता।
[हिं. दूध + आर (प्रत्य.)]
[हिं. दूध + आर (प्रत्य.)]
(तलवार, छरी आदि) जिसमें दोनों ओर धार हो।
चौड़ा, तेज खाँड़ा या तलवार।
कटारी जिसम दोनों ओर धार हो।
चालाकी से काम निकालनेवाला।
दुनियाँ का कार-बार या व्यवहार।
दुनियाँ में काम निकालने की रीति-नीति।
मुहा.- दुनियादारी की बात— मन का भाव छिपा कर की जानेवाली ल्लले-चप्पो की बात।
मतलब निकालने की रीति-नीति।
(हिं. दो + सं. नदी, प्रा. णई)
वह स्थान जहाँ दो नदियों का संगम हो।
लचाकर या झुकाकर दोहरा कर देना।
मुहा.- दुनियाँ के परदे पर— सारे संसार में।
दुनियाँ की हा लगना— (१) सांसारिक अनुभव होना। (२) छल-कपट या चालाकी सीख जाना।
दुनियाँ भर का— (१) बहुत अथिक। (२) बहुतों का।
दुनियाँ से उठ जाना (चल बसना)— मर जाना।
[अ. दुनिया + हिं. ई (प्रप्य.)]
मुहा.- दुपट्टा तान कर सोना— चिंतारहित होकर सोना।
दुपट्टा बदलना— सखी या सहेली बनाना।
कंधे या गले में डालने का लंबा कपड़ा।
उ.—राजा, इक पंडित पौरि तुम्हारी। अपद-दुपद-पसु-भाषा बूझत, अबिगत अल्प अहारी—८-१४।
बगलबंदी या मिर्जई जिसमें दोनों ओर पर्दे हों।
उ.— दुपहर दिवस जानि घर सूनौ, ढूँढ़ि-ढँढ़ोरि आपही खायौ—१०-३३१।
मध्याह्नकाल, दोपहर का समय।
दंडकारण्य जहाँ श्रीरामचंद्र ने बसकर शूर्पणखा का नासिकोच्छेदन किया था। विंध्य पर्वत से गोदावरी नदी तक फैले हुए इस प्रदेश में पहले इक्ष्वाकु राजा के एक पुत्र का राज्य था। गुरु-कन्या का कौमार्य भंग करने के अपराध में शुक्राचार्य के शाप से राज्य सहित वह भस्म हो गया था। तभी से वह प्रदेश दंडकारण्य कहलाने लगा।
उ.—तहँ ते चल दंडकबन को सुख निधि साँवल गात—सारा.२५४।
दिया हुआ दंड न मानने वाला।
दंड देते-देते, दंड देकर, शासित करके।
उ.—मुसल मुदगर इनत, त्रिबिध करमनि गनत, मोहिं दंडत धरम-दूत हारे—१-१२०।
उ.—यह सुनि दूत चले खिसियाइ। कह्य। तिन धर्मराज सौं जाइ। अबलौं हम तुमहीं कौं जानत। तुमहीं कौं दंड-दाता मानत—६४.।
अनिश्चिय, चित्त की अस्थिरता।
असमंजस, पसोपेश (खटका, चिंता)।
दोनों हाथ से तलवार चलानेवाला।
अनिश्चय चित्त की अस्थिरता।
उ.—(क) इक लोहा पूजा मैं राखत इक घर बधिक परौ। सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ—१-२२०। (ख) को जानै दुबिधा-सँकोच में तुम डर निकट न आवैं
(सं. द्विभाषित्, हिं. दुभाषिया)
दो भिन्न भाषाएँ बोलनेवालों का मध्यस्थ वह व्यक्ति जो एक को दूसरे का तात्पर्य समझाने की योग्यता रखता हो।
मुहा.- दुम के पीछे फिरना- साथ लगे रहना।
दुम बचाकर भागना— डरकर भाग जाना।
दुम दबा जाना— (१) डर से भाग जाना। (२) डर से काम छोड़ बैठना।
दम में घुसना— दूर हो जाना, छट जाना।
दुम में घुसा रहना— खुशामद या लालच से साथ सगे रहना।
दुम हिलाना— प्रसन्नता दिखाना।
पूँछ की तरह पीछे लगी, बँधी या टँकी चीज।
दोनों पक्षों से मेल—मुलाकात बनाये रखनेवाला।
दोनों पक्षों से मिली हुई।
कुछ बातें पक्ष की, क्रुछ विपक्ष की अपनाने कि वृत्ति, दुबधा।
जिसका अंत या पार पाना कठिन हो।
जिसे करना या पाना कठिन हो, दुर्गम, दुस्तर।
उ.—वह जु हुती प्रतिमा समीप की सुखसंपति दुरंत जई री—२७८९।
पीछे-पीछे या साथ लगा रहनेवाला आदमी।
तसमा जो दुम के नीचे दबा रहता है।
पुट्टठों के बीच की हड्डी।
जिसके पीछे दुम—जैसी कोई चीज बँधी या टँकी हो।
एक शब्द जिसका प्रयोग किसी को अपमान के साथ हटाने के लिए किया जाता है।
मुहा.- दुर-दुर करना— तिरस्कार के साथ हटाना।
दुर-दुर फिट-फिट— तिरास्कार और फटकार।
मोती का लटकन जो नाक में स्त्रियाँ पहनती हैं।
छोटी बाली जो कान में पहनी जाती है।
उ.—(क)कान्ह कुँ वर कौ कनछेदन है, हाथ सोहारी भेली गुर की।.......। कंचन के द्वै दुर मंगाइ लिए, कहौं कहा छेदनि आतुर की—१०-१८०। (ख) दुर दमंकत सुभग—स्रवननि १०-१८४।
जिसको लाँघा न जा सके, दुस्तर।
उ.—(क) दुरद मूल के आदि राधिका बैठी करत सिंगार—सा. ३५। (ख) दुरद कौ दंत उपटाइ तुम लेत हे वहै बल आजु काहैं न संभारौ—३०६६।
उ.—हरि राधा-राधा रटत जपत मंत्र दुरदाम। बिरह बिराग महाजोगी ज्यों बीतत हैं सब जाम।
बड़े अपमान या तिर स्कार के साथ हटाना या भगाना।
जिसकी प्राप्ति संभव न हो।
जो समझ में न आ सके, दुर्बोध।
छिपाइए, गुप्त रखिए, प्रकट न कीजिए।
उ.—तुम तौ तीनि लोक के ठाकुर, तुम तैं कहा दुरइयै—१-२३९।
जहाँ जाना या पहुँचना कठिन हो।
उ.— जीव जल-थलांजिते, बेष धर-धर तिते अटत दुरगम अगम अचल भारे—१-१२०।
उ.—काकी ध्वंजा बैठि कपि किलकिहि, किहिं भय दुरजन डरिहैं—२-२९।
धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र दुर्योधन जिसे युधिष्टिर 'सुयोधन' कहा करते थे।
उ.—(क)सूरदास प्रभु दुरत दुराए डुँगरनि ओट सुमेर—४५८। (ख) दुख अस हाँसी सुनौ सखी री, कान्ह अचानक आए। सूर स्याम कौ मिलन सखी अब, कैसे दुरत दुराए—७९४।
छिपाती है, दिखायी नहीं देती।
ऒट में हो जाती है, आँख के आगे से हट जाती हे।
उ.—दूध-दंत-दुति कहि न जाति कछु अद्भुत उपमा पाई। किलकल-हँसत दुरति प्रगटति मनु, घन मैं बिञ्जु, छटाई—१०-१०८।
जिसका उल्लंघन या अतिक्रमण न हो सके।
ऐसा प्रबल कि जिसके बाहर या विरुद्ध कोई न हो सके।
जिसका पार पाना बहुत कठिन हो।
उ.—सूर प्रत्यच्छ निहारत भूषन सब दुख दुरप झुलानौ—सा. १००।
उ.—पट कुचैल, दुरबल द्विज देखत, ताके तंदुल खाए (हो)—१-७।
उ.—अब मोहिं कृपा कीजिए सोइ। फिरि ऐसी दुर-बुद्धि न होई—४-५।
उ.— लै राखे ब्रज सखा नंदगृह बालक भेष दुराइ—२५८०।
छिपान से, प्रकट न करने से, गुप्त रखन से।
उ.— (तुम) केरि बालक जुवा खेल्यो, केरि दुरद दुराइयाँ — ५७७।
दूर किया, हटाया, अदृश्य कर लिया।
उ.— रूद्र को बीर्य खसि कै परयौ धरनि पर, मोहिनी रूप हरि लियो दुराई—८-१०।
नाहिंन परति दुराई—छिपायी नहीं जाती।
उ.— जान देहु गोपाल बुलाई। उर की प्रीति प्रान कैं लालच नाहिंन परति दुराई —८०१। (ख) लै भैया केवट, उतराई। महाराज रघुपति इत ठाढ़ेत कत नाव दुराई—९-४०।
उ.— तुम तौ तीन लोक के ठाकुर तुम तैं कहा दुराइए।
उ.— गोपी इहै करत चबाउ। देखौ धौं चतुराई वाकी हम सौं कियो दुराउ—११८३।
दंड देने की क्रिया, शासन।
दंड पाने योग्य (व्यक्ति-कार्य)।
जो मुश्किल से पकड़ा जा सके।
बुरे अभिप्राय से किया गया षङयंत्र या रचा गया कुचक्र।
उ.—परम गंग कौ छाँड़ि पियासौ दुरमति कूप खनावै—१-१६८।
उ.— भीषम, करन, द्रोन देखत, दुस्सासन बाहँ गही। पूरे चीर, अंत नहिं पायौ, दुरमति हारि लही—१-१५८।
[सं. दुर (उप.) + मुस = कूटना]
गच या फर्श कूटन का लोहे या पत्थर-जड़ा डंडा।
जो कठिनता से प्राप्त हो, दुर्लभ।
उ.—अब सूरज दिन दरसन दुरलभ कलित कमल कर कंठ गहौ (हो) —९-३३।
छिपाने से, अलक्षित रखने से, छिपाकर, आड़ में धरके।
उ.— (क) सूरदास प्रभु दुरत दुराए कहुँ डुँगरनि ओट सुमेरू—४५८।
गुप्त रखने या प्रकट न करने से।
उ.— सूर स्याम कौ मिलन सखी अब, कैसे दुरत दुराए —६७५।
छिपाये रखता है, आड़ में किये रहता है।
उ.—मानौ मनिधर मनि ज्यौं छाँड़यौ फन तर रहत दुराए—६७५।
वधू का दूसरी बार (गौना करके) ससुराल जाना।
मुहा.- दुरागौन देना— गौना करना।
दुरागौन लाना— गोना लाना।
गलत बात पर भी अड़े रहने का भाव।
अनुचित हठ या जिद रखनेवाला।
मुहा.- दुरादुरी करके— छिपे-छिपे, गुपचुप।
धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम।
जिसको वश में करना कठिन हो।
एक ही राज्य में दो का शासन जिससे प्रजा दुखी रहे।
वह राज्य जहाँ दो शासक हों।
[सं. दुर् + राज्य + ऐं (प्रत्य.)]
बुरे राज्य को, बुरे शासन को।
उ.— मारि कंस-केसी मथुरा मैं मेटूयौ सबै दुराजैं—१-३६।
[सं. दुर् + राज्य + ऐं (प्रत्य.)]
उ.— (क) कठुला कंठ। चिबुक तरैं मुख-दसन बिराजैं— खंजन बिच सुक आनि कै मनु परयौ दुराजैं १०-१३४। (ख) जोग-बिरह के बीच परम दुख परियत हैं यह दुसह दुराजैं—३२७३।
उ.— जदपि सूर प्रताप स्याम को दानव दूरि दुरात—३३५१।
उ.—सूर प्रतच्छ निहारत भूषन ,सब दुख-दुरप दुरानौ—सा. १००।
जिसे पाना कठित हो, दुष्प्राप्य।
उ.—कासौं कहौं सखी कोउ नाहिंन, चाहति गर्भ दुरायौ—१०-४। (ख) मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्ही, दोना पीठि दुरायौ—१०-३३४।
आड़ म कर दिया, सामने न रहने दिया, अलक्षित किया।
उ.—(क) मनौ कुबिजा के कूबर माँह दुरायौ—३४४२। (ख) सूरदास ब्रजबासिन को हित हरि हिय माँझ दुरायौ—३४६४। (ग) इतने माँझ पुत्र लै भाज्यौ निधि मैं जाय दुरायौ—सारा. ६९२।
जिसका मिलना या प्राप्त होना कठिन हो, दुष्प्राप्य।
जिसका उद्देश्य अच्छा न हो।
ऐसी आशा जो पूरी न हो सके, व्यर्थ की आशा।
ऐसी आशा जो पूरी न हो, व्यर्थ की आशा।
उ.—ऐसैं करत अनेक जनम गए, मन संतोष न पायौ। दिन-दिन अधिक दुरासा लाग्यो, सकल लोक भ्रमि आयौ—१-१५४।
छिपकर, ओट में होकर, आड़ में जाकर।
उ.— (क) अधम-समूह उधारन-कारन तुम जिय जक पकरी। मैं जु रह्यौं राजीव-नैन, दुरि, पाप-पहार-दरी—१-१३०। (ख) सात देखत बधे एक ब्रज दुरि बच्यौ इत पर बाँधि हम पंगु कीन्हो—२६२४।
कटु या बुरी बात कहनेवाला।
[हिं. दुराना + आव (प्रत्य.)]
उ.—(क) औरनि सौं दुराव जो करती तौ हम कहती भली सयानी—१२६२। (ख) मेरी प्रकृति भलै करि जानति मैं तो सौं करिहौं दुराव ही—१२३७। (ग)कछू दुराव नहीं हम राख्यौ निकट तुम्हारे आई—११९२।
[हिं. दुराना + आव (प्रत्य.)]
छिपाते है, आड़ में करते है, गुप्त रखते हो, प्रकट नहीं करते।
उ.—(क) अखिल ब्रहमंङ खंड की महिमा, सिसुता माहिं दुरावत—१०-१०२। (ख) स्याम कहा चाहत से डोलत ? पूँछे तैं तुम बदन दुरावत, सूधे बोल न बोलत—१०-२७९। (ग) ब्रजहिं कृष्ण-अवतार है, मैं जानी प्रभु आज। बहुत किए फ़न-धात मैं, बदन दुरावत लाज—५८९। (घ) सगुन सुमेर प्रगट देखियत तुम तृन की ऒट दुरावत—३१३५।
छिपाती है, ऒट में करती है।
उ.—सूरदास-प्रभुंहोहु पराकृत, अस कहि भुज के चिन्ह दुरावति—१०-७। (ख) कबहुँ हरि कौं चितै चूमति, कबहुँ गावति गारि। कबहुँ लैं पाछे दुरावति, ह्याँ नहीं बनवारि१०-११८।
दूर करो, हटाओ, अदृश्य करो।
उ.—महाराज, यह रूप दुरावहु। रूप चतुर्भुज मोहिं दिखावहु—८-२।
उ.—अब तू कहा दुरावैगी—२०७७।
उ.— सारँगरिपु की ओट रहे दुरि सुंदर सारँग चारि— सा. उ. १७
उ.— मात-पिता दुरित क्यों हरते—११०२।
पाप करनेवाला पापी, पातकी।
उ.— देवलोक देखत सब कौतुक, बाल-केलि अनुरागे। गावत सुनत सुजस सुखकरि मन, सूर दुरित दुख भागे—४१६।
दुरदुराना, अपमान से हटाना।
मुहा.- दुरूस्त करना— (१) सुधारणा। (२) दंड देना।
जिसका समझना कठिन हो, गूढ़।
छिप गये, ओट में हो गये, आड़ में हो गये।
उ.—(क) प्रगटति हँसत दँतुलि, मनु सीपज दमकि दुरे दल ओलै री—१०-१३७। (ख) गोपाल दुरे हैं माखन खात—१०-२८३। (ग) अब कहा दुरे साँवरे ढोटा फगुआ देहु हमार —१४०४।
उ.— मुरली मुख-छबि पत्र-साखा दृग दुरेफ चढ़यौ-३३-७।
उ.— मोसौ कही, कौन तो सी प्रिय, तोसों बात दुरैहौं—१२६०।
दूर करोगे, हटाओगे, बचाओगे।
उ.— भक्ति बिनु बैल बिरानै ह्यौहौ।¨¨¨¨ लादत, जोतत लकुट बाजिहै, तब कहँ मूँढ़ दुरैहौ—१-३३१।
छिपेगी, प्रकट न होगी, दिखायी न देगी।
उ.— तातैं यहै सोच जिय मोरैं, क्यौं दुरिहै ससि-बचन-उज्यारी—१०-११।
उ.—ज्ञान-बिवेक बिरोधे दोऊ, हते बंधु हितकारी। बाँध्यौ बैर दया भगिनी सौं, भागि दुरी सु बिचारी —१-१७३।
अहित या अकल्याण की कामना।
जिसकें दोनों ओर अलग-अलग रंग या उनकी छाया हो।
जो टूटा-फूटा या खराब न हो, ठीक।
शिव जी के वर से काशी में स्थापित भैरव की एक मूर्ति।
भूमि पर गिरकर सादर प्रणाम करने की मुद्रा।
साधुओं के दो चिन्ह—दंड और मुद्रा।
जहाँ जाना कठिन हो, दुर्गंम।
एक असुर जिसको मारने से देवी का नाम दुर्गा पड़ गया।
उ.— (क) तब चानूर गर्व मन लीन्हौ। दुर्ग प्रहार कुष्न पर कीन्हौ —३०७०।
जिसकी दशा बुरी या गिरी हो, दुर्दशाग्रस्त।
दुर्दशा, बुरी गति, विपत्ति।
उ.— ध्रुवहिं अमै पद दियौ मुरारी। अंबरीष की दुर्गति टारी—१-२८।
परलोक में होने वाली दुर्दशा, नरक-भोग।
जहाँ जाना-पहुँचना कठिन हो।
जिसका करना कठिन हो, दुस्तर।
दुर्गम स्थान तक पहुँचने के साधन।
आदि शक्ति, देवी जिन्होंने महिषासुर, शुंभ, निशुंभ आदि को मारा था।
कार्तिक, चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष की नवमी।
बुरा या भयानक घात या प्रहार।
जो कटु या कर्कश ध्वनि करे।
उ.—(क) दुर्जन-बचन सुनत दुख जैसौ। बान लगैं दुख होइ न तैसौ—४-५। (ख) अति घायल धीरज दुवाहिआ तेज दुर्जन दालि—२८२६।
जो बुरी रीति से जन्मा हो।
चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष की अष्टमी।
दुर्ग का स्वामी या रक्षक।
जो कठिनता से समझा जा सके।
अशुभ या हानि-कारिणी घटना, बुरा संयोग।
जिसका जन्म व्यर्थ ही हो |
बुरी रीति से जीविका पानेवाला।
जो सरलता से जीता न जा सके।
धृतराष्ट्र का पुत्र जो चचेरे भाई पांडवों से वैर रखता या।
जो कठिनता से समझ में आ सके।
जो सरलता से दबाया या जीता न जा सके।
रोहिणी और वसुदेव का एक पुत्र।
जिसको दबाना कठिन हो, प्रचंड।
जिसको दबाना कठिन हो प्रबल।
जो देखने में बड़ा भयंकर हो।
जिसको दबाना कठिन हो, प्रबल।
रावण का एक सैनिक जो हनुमान द्वारा मारा गया था।
जिसका दमन करना कठिन हो, प्रचंड।
पृथ्वी पर लेटकर किया हुआ साष्टांग प्रणाम।
उ.—छेम-कुसल अरु दीनता. दंडवत सुनाई। कर जोरो बिनती करी, दुरबल-सुखदाई—१-२३८।
कर्कश या अप्रिय ध्वनि करनेवाला।
गुरू की बात शीघ्र न माने।
रावण का एक सैनिक जो अशोक वाटिका उजाड़ते हुए हनुमान को पकड़ने आया था; परंतु राम दूत द्वारा स्वयं मारा गया था।
उ.— दुर्धर परहस्त संग आइ सैन भारी। पवन-दूत दखव दल ताड़े दिसि चारी—९-९-६।
दुर्निरीक्ष, दुर्निरीक्ष्य
दुर्निरीक्ष, दुर्निरीक्ष्य
दुर्निरीक्ष, दुर्निरीक्ष्य
जिसे जल्दी दूर न किया जा सके।
उ.— सुत-कलत्र दुर्बचन जो भाखैं। तिंन्हैं मोहवस मन नाहिं राखै -५-४।
एक क्रोधी मुनि जो अत्रि के पुत्र थे। इनकी पत्नी कंदली थी।
दुर्वासा को, दुर्वासा पर।
उ.— उलटी गाढ़ परी दुर्बासे, दहत सुदरसन जाकौं—१-११३।
उ.— निर्घिन, नीच, कुलज, दुर्बुद्धी, भौदू, नित कौ रौऊ —१-१८६।
जो जल्दी समझ में न आये, गूढ़।
पति-प्रेम से वंचिता पत्नी।
जो जल्दी ध्यान में न आ सके।
अकाल का समय, अन्न के अभाव का काल।
जिसका भेदना या छेदना कठिन हो।
जिसे जल्दी पार न किया जा सके।
बुरे चित्त या विचार का, दुष्ट।
जिसकी मृत्यु बड़े कष्ट से हो।
जिसको सहना कठिन हो, दुःसह।
उपरूपक का एक भेद जो हास्यरस प्रधान होता है।
एक मात्रिक और एक वर्णिक छंद।
श्रीराम की सेना का एक बंदर।
कटु-भाषी, कठोर बात कहनेवाला।
गच या फर्श कूटने का डंडा जिसके नीचे लोहा या पत्थर लगा होता है।
जो कठिनता से मिल सके, जिसे प्राप्त करना सहज न हो, दुष्प्राप्य।
उ.—सोइ सारँग चतुरानन दुर्लभ सोइ सारँग संभु मुनि ध्यात—सा. उ. २४।
उ.—दुर्लभ रूप देखिबे लायक—२४४४।
उ.—जहाँ तहाँ तैं सबै धार्इं सुनत दुर्लभ नाम—२९५५।
जो बुरी लिखावट में लिखा हो।
जिसे उठाकर ले चलना कठिन हो।
जिसका दाम अधिक हो, मँहगा।
कठिनाइयाँ सहकर भी युद्ध के मैदान में डटा रहनेवाला, विकट साहसी।
कुरुवंशीय राजा धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र जो चचेरे भाई पांडवों को अपना शत्रु समझता था और जिसे युधिष्ठिर ‘सुयोधन’ कहा करते थे। गदा चलाने में यह बड़ा निपुण था। धृतराष्ट्र की इच्छा युधिष्ठिर को ही युवराज बनाने की थी; परंतु दुर्योधन ने इसका विरोध किया और पांडवों को वन भेज दिया। लौटने पर युधिष्ठिर न इन्द्रप्रस्थ को राजधानी बनाकर राजसूय यज्ञ किया। उनके अपार वैभव को देखकर वह जल उठा। पश्चात् अपने मामा शकुनि के कौशल से युधिष्ठिर का राज्य और धन ही नहीं, द्रौपदी सहित उनके भाइयों को भी इसने जुए में जीत लिया। तब दुःशासन द्रोपदी को सभा में घसीट लाया और दुर्योधन ने उसे अपनी जाँघ पर बैठने का संकेत किया। भीम का क्रोध यह देखकर भभक उठा और उन्होंने गदा से दुर्योधन की जाँघ तोड़ने की प्रतिज्ञा की। द्युत के नियमानुसार पांडवों को बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास करना पड़ा। पश्चात् श्रीकृष्ण पांडवों के दूत होकर कौरव सभा में गये; परंतु दुर्योधन पूर्व निश्चय के अनुसार आधा राज्य तो क्या, पाँच गाँव देने को भी तैयार न हुआ। फलतः कुरुक्षेत्र का भयानक युद्ध हुआ जिसमें सौ भाइयों सहित दुर्योधन मारा गया।
जो कठिनता से दिखायी पड़े।
बुरा उदेश्य, लक्ष्य या स्वार्थ।
एक क्रोधी मुनि जो अत्रि के पुत्र थे। इन्होंने और्व मुनि की कन्या कंदली से विवाह किया था। पत्नी से सौ बार क्रुद्ध होने पर इन्होंने उसे क्षमा कर दिया; पश्चात किसी अपराध पर उसे शाप देकर भस्म कर दिया। इस पर इनके ससुर और्व मुनि ने शाप दिया—तुम्हारा गर्व चूर होगा। इसी कारण अंबरीष के प्रसंग में इन्हें नीचा देखना पड़ा।
बुरी विधि, अनीति, कुनीति।
दंतमूल से उच्चरित होने वाले (वर्ण जैसे त, थ)।
करुष देश का राजा जो वृद्ध शर्मा का पुत्र था और शिशुपाल का भाई लगता था। इसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.—सूर प्रभु रहे ता ठौर दिन और कछु मारि दंतवक्र पुर गमन कीन्हो—१० उ. ५६।
[(हिं. दाँत + आर (प्रत्य.)]
[(हिं. दाँत + आर (प्रत्य.)]
जिसके दाँत बड़े-बड़े हो, बड़दंता।
[हिं. दाँत + इयाँ (प्रत्य.)]
बच्चों के छोटे-छोटे दाँत।
उ.—(क) किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत—१०-११०। (ख) बोलत स्याम तोतरी बतियाँ, हँसि-हँसि दतियाँ दूमै—१०-१४७। (ग) बिहँसत उघरि गर्ई दँतियाँ, लै सूर स्याम उर लायौ—१०-२८८।
जिसका अनुमान भी न हो सके।
महादेव जिन पर विष का कोई प्रभाव न हुआ।
जिसे सहना कठिन हो, दुःसह।
बुरी इच्छा रखनेवाला, नीचाशय।
पशुओ का पिछले पैर उठा कर मारना।
लाड़ प्यार करके, दुलार करके।
उ.—जसोदा हरि पालनै झुलावै। हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै—१०-४३।
दुलारे बच्चों का सा व्यवहार करना।
दुलार-प्यार कंरती है, लाड़-प्यार दिखाती है।
उ.—(क) बैठी हुती जसोदा मंदिर, दुलरावति सुत कुँवर कन्हाई—१०-५०। (ख) कर सौ ठोकि सुतहिं दुलरावति, चटपटाइ बैठे अतुराने—१०-१९७।
लागी दुलरावन—दुलार-प्यार का व्यवहार करने लगी।
उ.—अब लागी मोको दुलरावन प्रेम करति टरि ऐसी हो। सुनेहु सूर तुमरे छिन छिन मति बढ़ी प्रेम की गैसी हो।
उ.—(क) दुलरी कंठ नयन रतनारे मो मन चितै हरयौ—८८३। (ख) स्त्रुति मंडल मकराकृत कुंडल कंठ कनक दुलरी—३०२६।
उ.—अंग-अभूषन जननि उतारति। दुलरी ग्रीव माल मोतिनि कौ, लै केयूर भुज स्याम निहारति—५१२।
उ.—श्री बलदेव कह्यौ दुर्योधन नीको दुलह विचारो—सारा. ८०३।
दुलहन, दुलहिन, दुलहिनि, दुलहिनी , दुलहिया, दुलही,
उ.—(क) आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहिं न जनैहों। हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया लैहौं—१०-१६३। (ख) दुलहिनि कहत दौरि दीजहु द्विज पाती नंद के लालहिं—१०-३-२०।
श्रीकृष्ण का गैया-विशेष के लिए दुलार का संबोधन।
उ.—अपनी अपनी गाइ ग्वाल सब, आनि करौ इकठौरी।¨¨¨¨¨। दुलही, फुलही,भौंरी, भूरी, हाँकि ठिकाई तेती-४४५।
(सं. दुर्लालन, प्रा. दुल्लाडन)
लाड़-प्यार करना, लाड़ लड़ाना।
लाड़ली बेटी, प्रिय कन्या।
उ.—यह सुनिकै बृषभानु मुदित चित, हँसि हँसि बूझति बात दुलारी—७०८।
जिसका खूब दुलार-प्यार हो, लाड़ली।
जिनका बहुत लाड़-प्यार होता हो, लाड़ले प्यारे।
उ.—कोमल कर गोबर्धन धारथै जब हुते नंद-दुलारे—१-२५।
लाड़ला बेटा, प्रिय पुत्र।
मिटि जु गयौ संताप जनम कौ, देख्यौ नंद-दुलारौ—१०-१५।
दुष्ट प्रकृति का आदमी, दुर्जन।
(सं. द्वादश=सूर्य + वर्ण)
सूर्य के समान चमक-दमक वाला, खरा, दमकता हुआ।
किसी पक्ष की बारहवीं तिथि।
द्वार, दरवाजा, बाहर निकलने का पथ।
उ.—(क) आँखि, नाक, मुख, मूल दुवार—। (ख) दधिसुत जामें नंद-दुवार—४-१२। (ग) देहरि उलँधि सकत नाहिं सो अब खेलत नंद-दुवार—१०-१७३।(घ) सब सुंदरि मिलि मंगल गावत कंचन कलस दुवार—सारा.—१६३।
उ.—अर्थ काम दोउ रहैं दुवारें, धर्म-मोक्ष सिर नावैं—१-४०। (ख) हरि ठाढ़े रथ चढ़े दुवारे—१-२४०। (ग) देखि फिरि हरि ग्वाल दुवारे। तब इक बुद्धि रची अपनैं मन, गए नाँधि पिछवारैं—१०-१७७।
श्रीराम का सेनानायक एक बंदर।
मुहा.- दुशाले में लपेटकर— छिपे-छिपे।
जो कठिनता से समझ में आवे।
सुनी-सुनायी बात, जनश्रुति।
जिसको करना कठिन हो (काम)।
नीच या अप्रतिष्ठित घराने का।
तुच्छ या अप्रतिष्ठित घराने का।
दुष्टता, खोटापन, दुर्जनता।
[हिं. दुष्ट +पन (प्रत्य.)]
उ.—बालक लियौ उछंग दुष्टमति, हरषित अस्तन-पान कराई—१०-५०।
दुराचारी कौरवों की राजसभा।
उ.—अंबर हरत द्रपद-तनया की दुष्ट-सभा मधि लाज सम्हारी—१-२२।
जो आसानी से मिल न सके, जिसका मिलना कठिन हो।
दुष्प्रेक्ष, दुष्प्रेक्ष्य
दुष्प्रेक्ष, दुष्प्रेक्ष्य
एक पुरुवंशी राजा जिसने कण्व ऋषि की पोषिता कन्या शकुंतला से विवाह किया था और जिनकी कथा लेकर कालिदास ने ¨अभिज्ञान शाकुंतल¨ नाटक लिखा।
[हिं. दूसरा + हा (प्रत्य.)]
[हिं. दूसरा + हा (प्रत्य.)]
जो सरलता से सहा न जा सके, असह्य, बहुत कष्टदायक।
उ.—(क) तुम बिनु ऐसो कौन नंद-सुत यह दुख दुसह मिटावन लायक—९५४। (ख) अति ही दुसह सह्यौ नहिं जाई—२६५०। (ग) चलते हरि धिक जु रहत ये प्रान कहँ वह सुख, अब सहौं दुसह दुख, उर करि कुलिस समान—२९८४।
उ.—यह अति दुसह पिनाक पिता-प्रन राघव बयस किसोर—९-२३।
[हिं. दुःसह + ई (प्रत्य.)]
जिसको स्पर्श करना कठिन हो।
कुकर्म, खोटा या बुरा काम।
खोटा या बुरा काम करनेवाला।
बुरा काम करनेवाला, कुकर्मी।
जो सरलता से प्राप्त न हो सके।
[हिं. दुःसह + ई (प्रत्य.)]
डाह रखनेवाला, डाही, ईर्ष्यालु।
लकड़ी जिसमें दो कनखे हों।
आर पार किया गया या होनेवाला छेद।
धृतराष्ट्र का एक पुत्र जो भीम द्वारा मारा गया था।
उ. — सूरजदास स्याम सेए तैं दुस्तर पार तरै—१-९२।
जिसे तर्क से सिद्ध करना कठिन हो।
उ. — हिरनकसिप दुस्सह तप कियौ—७-२।
धुतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक जो भीम द्वारा मारा गया था।
दुहते हैं, दुही जाती हैं।
उ. नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बड़ौ नाम है नंद महर कौ—१०-३३३।
जिसमें दो हत्थे हों या मूँठें हों।
दुहने की क्रिया, (थन से) दूध निकालने की किया।
उ. (क) काल्हि तुम्हें गो दुहन सिखावैं, दुही सबै अब गाइ—४००। (ख) मैं दुहिहौं, मोहिं दुहन सिखावहु —४०१। (ग) बाबा मोकौं दुहन सिखायौ—६६७।
सारा तत्व-भाग निचोड़ लेना।
वह पात्र जिसमें दूध दूहा जाय।
उ. — डारि दियौ भरी दूध-दुहनियाँ अबहीं नीकैं आई—७४१।
किसी बात को बार-बार कहना।
उ.— कहा करौं अपथि भई मिलि बढ़ी ब्यथा दुख दुहरानी —२८८७।
दुहो, (पशुओं के) थन से दूध निकालो।
उ.—सूरदास नँद लेहु दोहिनी, दुहहु लाल की नाटी—१०-२५९।
मुहा.- फिरी दुहाइ— विजय-घोषणा हुई, जयजय कार हुई, प्रभुत्व का डंका पिटा। उ.— कुंभकरन तन पंक लगाई, लंक बिभिषन पाइ। प्रगट्यौ आइ लंक-दलकवि कौ, फिरी रघुबीर दुहाइ— ९-८३।
(सं. द्वि = दो +आह्वान=पुकार)
मुहा.- (किसी की) दुहाई फिरना— (१) राजा के सिंहासनासीन होने की घोषणा। उ.— (क) बैठे राम राज-सिंहासन जग में फिरी दुहाई— सारा. ३०२। (२) प्रताप का डंका बजना, जयजयकार होना। उ.— बंसी बनराज आज आई रन जीति। ¨¨¨। देत मदन मारूत मिलि दसों दिसि दुहाई— ६५०।
(सं. द्वि = दो +आह्वान=पुकार)
सहायता, बचाव या रक्षा के लिए पुकार।
मुहा.- दुहाई देना— संकट पड़ने पर सहायता या रक्षा के लिए पुकारना।
(सं. द्वि = दो +आह्वान=पुकार)
उ.— (क) अब मन मानि धौं राम दुहाई। मन-बच-क्रम हरिनाम ह्रदय धरि, ज्यों गुरू बेद बताई—१-३१८। (ख) मोहिं कहत जुवती सब चोर।¨¨¨¨। जहाँ मोहिं देखति तहँ टेरति, मैं नहिं जात दुहाई तोर—१३९८। (ग) जब लगि एक दुहौगे तब लौं चारि दुहौंगो नंद दुहाई—६६८।
गाय-भैस आदि को दुहने की क्रिया।
उ.—हरि कौ भेद पाय के अजु— न धरि दंडी कौ रूप—सारा. ५०४।
संस्कृत का एक प्रसिद्ध कवि।
साष्टांग प्रणाम, पृथ्वी पर लेटकर किया हुआ नमस्कार, दंडवत्।
उ.—तातैं तुंम कौं करत दँडौत। अरू. सब नरहूँ कौ परिनौत—५-४।
उ.—पटक्यो भूमि फेरि नहिं मटक्यो लीन्हे दंत उपारी—२५६४।
मुहा.- दंत तृन धरि कै- दया की विनती करके, गिड़गिड़ाकर, सविनय क्षमा माणगकर। उ.- सुनु सिख कंत, दंत तृन धरि कै, क्यौं परिवार सिधारौ- ६-११५। अँगुरीनि दंत दै रह्यौ- दाँतौं में उँगली दबा ली, बहुत चकित हुआ। उ. मैं तो जे हरे हैं, ते तो सोवत परे हैं. ये करे हैं कौनैं आन, अँगुरीनि दंत दै रह्यौ- ४८४।
उ.—कामधेनु छाँढ़ि कहा अजा लै दुहाऊँ—१-१६६।
(सं. दुर्भाग्य, प्रा. दुव्भाग)
(सं. दुर्भाग्य, प्रा. दुव्भाग)
[वि. दुहाग + इल (प्रत्य.)]
[वि. दुहाग + इल (प्रत्य.)]
[वि. दुहाग + इल (प्रत्य.)]
जो (पुरुष) पहली पत्नी के मर जाने पर दूसरा विवाह करे।
वह स्त्री जो पति के मरने पर दूसरा विवाह करे।
गाय-भैस आदि को दुहने का काम दूसरे से कराना।
एक प्रथा जिसमें विशेष त्योहारों पर असामियों की गाय-भैंसों का दूध मालिक दूहा लेता है।
वह दूध जो इस प्रथा के अनुसार मालिक को मिले।
उ.—सूरदास प्रभु पास दुहावति. धनि-धनि श्री बृषभानु-लली—७३९।
दुहाने के उद्देश्य से या दुहाने (के लिए)।
उ.—खरिक दुहावन जाति हौं, तुम्हरी सेवकाई—७१३।
दुहने का काम कराये, दूध निकलवाये।
उ.—सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै—१-१६८।
उ.—पाछे पृथु को रूप हरि लीन्हें नाना रस दुहि काढ़े—सारा. २४।
उ.—अबहीं सुनि बसुदेव-देवकी हरषित ह्ण हैं दुहिनि हियौ—३०८६।
दुहते हैं, थन से दूध निकालते हैं।
उ.—(क) चहुँ ओर चतुरंग लच्छमी, कोटिक दुहियत धैन री—१०-१३९। (ख) साँझ कुतूहल होत है जहँ तहँ दुहियत गाइ—४९२।
उ.—मैं दुहिहौं मोहिं दुहन सिखावहु—४०१।
जो दुह ली गयी हों, जिनका दूध दुहा जा चुका हो।
उ.—काल्हि तुम्हैं गो-दुहन सिखावै, दुहीं सबै अब गाइ—४००।
दुह ली, (थन से) दूध निकाला।
उ.—सूर स्याम सुरभी दुही, संतनि हित-कारी—४०९।
[हिं. दो + हूँ (प्रत्य.)]
उ.—मेरी पीर परम पुरुषोत्तम, दुख मेटूयौ दुहुँ घाँ कौ—१-११३।
उ.—सूर स्याम कह्यौ काल्हि दुहैंगे, हमहूँ तुम मिलि होड़ लगाई—६६८।
उ.—(क) सूरदास प्रभु खेल्योइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैया—१०-२४५। (ख) मानी हार सूर के प्रभु तब, बहुरि न करिहौं नँद दुहैया—७३५। (ग) दोउ सींग बिच ह्णै हौं आयौ, जहाँ न कोउ हो रखवैया। तेरौ पुन्य सहाय भयौ है उबरयौ बाबा नंद-दुहैया—१०-३३५। (घ) दै री मैया दोहनी, दुहिहौं मैं गैया।माखन खाए बल भयौ, करौं नंद-दुहैया—६६६।
उ.—अति रस काम की प्रीति जानिकै आवत खरिक दुहैया—७३३।
दुह लूँगा, (थन से) दूध निकालूँगा।
उ,—जब लौं एक दुहौगे तब लौं चारि दुहौंको, नंद दुहाई—६६८।
दुहो, (थन से) दूध निकालो।
उ.—(क) भोर दुहौ जनि नंद-दुहाई, उनसौं कहत सुनाइ—४००। (ख) ग्वाल एक दोहनि लै दीन्ही, दुहौ स्याम अति करौ चँडाई—७१७।
उ.—इत-उत देखत जनम गयौ। या झूठी माया कैं कारन, दुहुँ दृग अंध भयौ—१-२९१।
उ.—दोऊ लगत दुहुन तैं सुंदर भले अनोन्या आजु-सा-४५।
उ.—(क) दुहूँनि मनोरथ अपनौ भाप्यौ—१-२६८। (ख) सुर-असुर बहुत ता ठौर ही मरि गऐ, दुहुँनि कौ गर्व यौं हरि नसायौ—८-८।
[हिं. दो + हूँ (प्रत्य.)]
विकट खेल, कठिन या दुःसाध्य कार्य।
दुहोगे, थन से दूध निकालोगे।
उ.—जब लौं एक दुहौगे तब लौं, चारि दुहौगे नंद दुहाई—६६८।
ययाति और शर्मिष्ठा का एक पुत्र जिसने पिता को अपनी युवावस्था देना अस्वीकार कर दिया था।
गर्मी को तपन के बाद होनेवाली हलकी वर्षा।
सरबस मैं पहिलैं ही वारयौ नान्हीं नान्हीं दँतुली दू पर—१०-९२।
उ.—इते मान इहि जोग सँदेसनि सुनि अकुलानी दूखी—३०२९।
(सं. द्वितीया, प्रा. दुइय, दुइज)
किसी पक्ष की दूसरी तिथि, दुइज, द्वितीया।
मुहा.- दूज का चाँद होना— (१) कम दिखायी देनवाला। (२) जो बहुत दिन बाद दिखायी दे।
उ.—सूर स्याम की इहै परेखो इक दुख दूजी हाँसी—३४०५।
ब्याह की रीति जिसमें माता वर को दूध पिलाने की सी मुद्रा बनाती है।
वह धन या नेग जो माता को इस रीति के बदले में मिलता है।
उ. —दूध-पूत की छाँड़ी आस।
दूसरे की माता का दूध पीकर पलनेवाली लड़की जो उस स्त्री के पुत्र की ‘दूध-बहन’ कहलाती है।
दूसरे की माता का दूध पीकर पलन वाला लड़का जो उस स्त्री के पुत्र-पुत्रियों का ‘दूधभाई’ कहलाता है।
अबोघ और अनुभवहीन (व्यक्ति)।
अन्न के कच्चे दानों का रस।
उ.—दूजे करज दूरि करि दैयत, नैंकु न न तामैं आवै—१-१४२।
उ.—(क) ऐसौ सूर नाहिं कोउ दूजौ, दूरि करै जम-दायौ—१-६७। (ख) तुमहिं समान और नहिं दूजौ, काहि भजौं हौं दीन—१-१११। (ग) कौरव छाँड़ि भूमि पर कैसैं दूजौ भूप कहावै—१-२७५। (घ) सूरदास कारी कामरि पै. चढ़त न दूजै रंग—१-३३२।
संदेश ले जानेवाला मनुष्य, चर।
उ.—पठवौ दूत भरत कौं ल्यावन, बचन कह्यौ बील-खाइ—९-४७।
प्रेमी-प्रेमिका का परस्पर संदेसा ले जाने वाला व्यक्ति।
राजाज्ञा का प्रचार करनेवाला कर्मचारी।
उ.—पांडव कौ दूतत्व कियौ पुनि उग्रसेन कौं राज दयौ—१-२६।
[हिं. दाँत + इया (प्रत्य.)]
बच्चों के छोटे-छोटे दाँत।
उ.—दमकति दूध दँतुरियाँ रूगी—१०-११७।
बच्चों के छोटे-छोटे दाँत।
उ.—(क) दबहिं दँतुलि द्वै दूध की देखौं इन नैननि—१०-७४। (ख) माता दुखित जानि हरि बिहँसे, नान्ही दँतुलि दिखाइ—१०-८१। (ग) प्रगटति हँसत दँतुलि, मनु सीपज दमकि दुरे दल ऒलै री—१०-१३७। (घ) तनक-तनक सी दूध-दँतुलिया, देखौ, नैन सफल करौ आई—१०-८२। (च) दमकति दूध-दँतुलिया बिहँसत, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर—१०-६३। (छ) सरबस सैं पहिलै ही वारथौ, नान्हीं-नान्हीं दँतुली दू पर—१०-६२। (ज) दुहुँघाँ द्वै दँतुली भंई. मुख अति छबि पावत—१०-१२२।
दाँत और ओठ से उच्चरित होनेवाले (वर्ण जैसे 'व')
(त, थ आदि वर्ण) जिसका उचरण दाँत से हो।
प्रेम-संदेसा ले जानेवाली स्त्री।
उ.—(क) निदरि हमैं अधरनि रस पीवति, पढ़ी दूतिका भाइ—६५६। (ख) ज्यों दूती पर-ब्रधू भोरि कै लै पर-पुरुष दिखावै—१-४२।
मुहा.- दूध उतरना— थन या स्तन में दूध भर जाना।
दूध का दूध और पानी का पानी करना— ठीक-ठीक और निष्पक्ष न्याय करना। उ.— हम जातहिं वब उघरि परैगी दूध दूध पानी सौं पानी— १२६२।
दूध का बच्चा— बहुत छोटा बच्चा जो दूध पर ही निर्भर हो।
दूध का सा उबाल- शीघ्र ही शांत हो जानेवाला आवेग।
दूध की मक्खी— तुच्छ और तिरस्कृत वस्तु।
दूध की मक्की की तरह निकालना (निकालकर फेक देना)— किसी को तुच्छ या तिरस्कार योग्य समझकर अलग कर देना।
काढ़ि डार्यौ ज्यों दूध माँझ तैं माखी— दूध की मक्की की तरह बेकार समझकर अलगद दिया। उ.— मनसा ज्यों बाचा कर्मना अब हम करत नहीं कछु राखी। सूर काढ़ि डार्यौ ब्रज तें ज्यों दूध माँज ते माखी— ३४८९।
मुँह से दूध की गंध (बू) आना— अबोध और अनुभवहीन होना।
दूध के दाँत (दँतियाँ दँतुलियाँ)- छोटी अवस्था के दाँत। उ.— (क) कब द्वौ दाँत दूध के देखौं, कब तोतरैं मुख बचन करै— १०-७६। (ख) हरषित देखि दूध की दँतियाँ ¨¨। तनक तनक सी दूध दँतुलिया— १०-८२।
दूध के दाँत न टूटना— ज्ञान और अनुभव का अभाव होना।
दूध चढ़ना— (१) स्तन में दूध कम हो जाना। (२) स्तन से अधिक दूध निकलना।
दूध चढ़ाना— गाय-भैस का दूध इस तरह चढ़ा लेना कि कम दुहा जा सके और उसके बछड़े के लिए बच जाय।
छठी का दूध याद आना— बहुत कष्ट या हैरानी होना।
दूध छुड़ाना— बच्चे की दूध पीने की आदत छुड़ाना।
दूध पीता— (१) गोदी का, बहुत छोटा। (२) अबोध और अनुभवहीन।
किसी चीज का दूध पीना— किसी वस्तु का सुरक्षित रहना।
दूध बढ़ाना- बच्चे की दूध पीने की आदत छुड़ाना।
दूध भर आना— अधिक ममता के कारण स्तन में दूध उतर आना।
अनाज के हरे-भरे बीजों का रस।
मुहा.- दूध पड़ना— अनाज का तैयारी पर होना।
पौधों पत्तियों से निकलनेवाला सफेद पदार्थ।
जिनका दूध पहले से अधिक बढ़ गया हो।
उ. गैयाँ गनी न जाहिं तरूनि सब बच्छ बढ़ीं। ते चरहिं जमुन के तीर दूने दूध चढ़ीं—१०-२४।
विवाह की एक रीति जिसमें विवाह के चौथे दिन वर-कन्या एक दूसरे को दूध-भात खिलाते हैं।
[हिं. दूध + इया (प्रत्य.)]
[हिं. दूध + इया (प्रत्य.)]
[हिं. दूध + इया (प्रत्य.)]
कच्चे होने के कारण जिसका दूध सूखा न हो।
उ.— ताको कहा परेको कीजै माँगत छाँछ, न दूधो—३२७८।
उ.— ललित लट छिटकाति मुख पर देति सोभा दून—१०-१८४।
मुहा.- दून की लेना (हाँकना)— बहुत बढ़-चढ़-कर बातें करना।
दून की सूजना— बहुत बड़ी या असंभव बात ध्यान म आना।
साधारण समय से कुछ जल्दी गाना।
पहाड़ों के बीच या नीचे की समतल भूमि, तराई।
मुहा.- कलेजा (दिल) दूना होना— मन में खूब उमंग या जोश होना।
दिन दूना रात चौगुना— प्रति पल बढ़ती या उन्नति होना।
उ.— (क) वा तैं दूनी देह धरी, असुर न सक्यौ सम्हारि —४३१। (ख) दिन प्रति लेत दान बृंदाबन दूनी रीति चलाई —३२५२।
उ. — (क) उनके सिर लै गयौ उतारि। कह्यो, पांडवनि आयौ मारि। बिन देखे ताकौं सुख भयौ। देखे तैं दूनौ दुख ठ्यौ—१-२८९। (ख) तहँ गैंयाँ गनी न जाहिं तरूनी बच्छ बढ़ी। जे चरहिं जमुन कैं तीर, दूनैं दूध चढ़ीं —१०-२४। (ग) यह सुखसूर-दास कैं नैननि दिन दिन दूनौ होइ —१०-५६।
एक प्रकार की प्रसिद्ध घास जिसे हिंदू मंगल द्रव्य मानते हैं और जिसका व्यवहार वे पूजन में करते है।
उ.दधि-दूब-हरद, फल-फूल-पान कर कनक-थार तिय करतिं गान—९-१६६।
दूबर, दूबरा, दूबरो, दूबला
उ.- तन स्थूल अरु दूबर होइ। परमातम कौं ये नहिं दोइ—५-४।
दूबर, दूबरा, दूबरो, दूबला
दूबर, दूबरा, दूबरो, दूबला
(सं. दुर्भर=जिसका निबाहना कठिन हो)
जिस (काम) का करना बहुत कठिन हो।
आगा-पीछा सोचनेवाला, दूर की बात सोचनेवाला, दूरदर्शी।
उ.— (क) दूर देखि सुदामा आवत धाइ परस्यौ चरन—१-२०२। (ख) अब रथ देख परत न धूर। दूर बड़ि गो स्याम सुंदर बृज सँजीवन मूर - सा. ३८।
मुहा.- दूर करना— (१) हटाना, अलग करना। (२) मिटाना, न रहने देना। उ.— जसुमति कोख आय हरि प्रगटे असुर-तिमिर कर दूर-सारा. ३९०।
दूर क्यों जायँ (जाइए)— दूर या अपरिचित की बात न करके निकट या परिचित का उदाहरण देना।
दूर भागना (रहना)— बचे रहना, पास न जाना, संबंध न स्थापित करना।
दूर होना- (१) हट जाना, छट जाना। (२) मिट जाना, नष्ट होना।
दूर पहुँचना- (१) शक्ति या साधन के बाहर होना। (२) दूर की या महत्व की बात सोचना।
दूर की बात- (१) महत्व की बात। (२) आगे होनेवाली बात। (३) दुःसाध्य बात।
दूर की कहना- दूरदर्शिता की बात कहना।
जो निकट न हो, जो फासले पर हो।
बुद्धिमान या विद्वान व्यक्ति।
दूर या आगे की बात सोचने की योग्यता या विशेषता, दूरंदेशी।
अंतर पर, फासले पर, निकट नहीं।
उ. —(क) दूरि गयौ दरसन के ताईं, ब्यापक प्रभुता सब बिसरी —१-११५। (ख) जद्दपि सूर प्रताप स्याम को दानव दूरि दुरात—३३५१।
मुहा.- दूरि करन (करना)- (१) अलग करना, पास से हटाना। (२) मिटाना, नाश करना। उ.— कलिमल दूरि करन के काजैं, तुम लीन्हौ जग मैं अवतार— १-४१।
दुरि करौ— मिटाओ, नाश करो। उ.— सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नँदलाल— १-१५३।
दूरी धरयौ— छिपा कर या संचित करके रखा हुआ। उ.— ठाढ़ी कृष्न यौं बोलै। जैसैं कोऊ बिपति परे तैं, दूरि धरयौ धन धन खौलै— १-२५६।
बहुत अंतर पर ही, दूर से ही।
उ.—वै देखौ रघुपति हैं आवत। दूरिहिं तै दुतिया के ससि ज्यौं, ब्योम बिमान महा छबि छावत—९-१६७।
दूर होता है, जाता रहता है।
उ.— अरू तैसियै गाल मसूरी। जो खातहिं मुख-दुख दूरी—१०-१८३।
सूर्यलोक जहाँ जाना असंभव है।
दूर या आगे की बात सोचनेवाला।
दूर की चीजें देखने का यंत्र।
अस्त्र जो दूर से मारा जाय।
(सं. दुर्लभ, प्रा. दुल्लह)
(सं. दुर्लभ, प्रा. दुल्लह)
उ.—एकहिं एक परस्पर बूझतिजनु मोहन दूलह आए —२९५९।
दोष उत्पन्न करनेवाला (पदार्थ)।
रावण का एक भाई जो शूर्पणखा की नाक और कान कटने के पश्चात श्री रामचंद्र के हाथ से मारा गया।
दोष लगाने की क्रिया या भाव।
उ.— दूसरैं कर बान न लैहों। सुनि सुग्रीव, प्रतिज्ञा मेरी, एकहिं बान असुर सब हैहौं—९-१५७।
साँप जो आँख से सुनता भी है।
उ.—आदि निरंजन, निराकार, कोउ हुतौ न दूसर—२-३६।
गीत का स्थायी या ध्रुव पद जो गाने में बार-बार कहा जाता है।
उ.—स्त्रवन न सुनत, चरन-गति थाकी, नैन भए जलधारी—१-११८।
हार गयी, ऊब गयी, परेशान हो गयी।
उ.—(क) बार-बार हा-हा करि थाकी मैं तट लिए हँकारी— ११४१। (ख) बुधि बल छल उपाइ करि थाकी नेक नहीं मटके—१८५२।
झूठा आडंबर, ऊपरी दिखावट, पाखंड।
मुहा.- दृक्पथ में आना— दिखायी देना।
उ.—इत-उत देखत जनम गयौ। या झूठी माया कैं कारन, दुहुँ दृग अंध भयौ—१-२९१।
मुहा.- दृग डालना (देना)— देखना।
दृग फेरना- (१) आँख हटा लेना, न देखना। (२) अप्रसन्न हो जाना।
निश्चय या सिद्धांत पर अटल, निडर, कड़े दिल का।
उ.—अब मैं हूँ याकौं दृढ़ देखौं। लखि विस्वास बहुरि उपदेसौं —४-९।
दृढ़ता के साथ, अटल स्वर में।
उ.— दुर्योधन से कह्यौ दूत ह्यो भक्त पक्ष दृढ़ बोले—सारा. ७७३।
गणित का वह अंक जो दूसरे अंक से पूरा विभाजित न हो सके; जैसे- ३ आदि।
धीरता और स्थिरता से अपने काम में लगा रहनेवाला।
दृढ़ता और स्थिरता से काम करनेवाला।
जो जल्दी नष्ट या विचलित न हो।
उ.—(क) जीव न तजै स्वभाव जीव कौ, लोक बिदित दृढ़ताई। तौ क्यौं तजै नाथ अपनौं प्रन? है प्रभु की प्रभुताई—१-२०७। (ख) दृढ़ताई मैं प्रगट कन्हाई—७९९।
जो धनुष चलाने में दृढ़ हो।
मन को स्थिर करने का अभ्यास।
जोर से या कसकर पकड़नेवाला।
जिसका अंग मजबूत हो, हृष्ट-पुष्ट।
दीन्हो दृढ़ाइ—दृढ़ कर दिया।
उ.—पाछे बिबिध ज्ञान जननी को दीन्हों कपिल दृढ़ाइ।
लेत दृढ़ाइ—मजबूत या दृढ़ कर लेते हैं।
उ.—सूर प्रभु सन और यह कहि प्रेम लेत दृढ़ाई—३०२२।
[हिं. दृढ़ + ना (प्रत्य.)]
दृढ़, पक्का या मजबूत करना।
उ.— पहिलो जोग कहा भयो ऊधो अब यह जोग दृढ़ानो—३०५९।
उ.— (क) करि उपदेस ज्ञान हरि भक्तिहि अरू बैराग्य दृढ़ाय—सारा. १३६। (ख) देखि चरित्र बिनोद लाल के बिस्मित भे द्विजराय। अदुभुत केलि कृपा करि कीनी द्विज को ज्ञान दृढ़ाय—८०१।
अस्त्र ग्रहण करने में दृढ़।
उ.—सुन कटु बचन गये माता पै तब उन ज्ञान दृढ़ायौ—सारा. ७३।
उ.— कहुँ उपदेस कहूँ जैबे को कहूँ दृढ़ावत ज्ञान—सारा. ६६९।
जो (स्त्री) सम्मान योग्य हो।
गर्व से ऐंठा या इतराया हुआ।
जो देखने योग्य हो, दर्शनीय।
उ.—बोलि लीन्हीं कदम कैं तर, इहाँ आवहु नारि। प्रगट भए तहँ सबनि कौं हरि, काम-दंद निवारि—७६५।
किसी पदार्थ से निकलती हुई गरमी।
उ.—संत-उबारन, असुर-सँहारन, दूरि करन दुख-दंदा—१०—१६२।
दाँत की तरह उभरी हुई चीजों की कतार जैसी कंधी या आरी में होती है।
वह शब्द जिसका अर्थ स्पष्ट हो।
देखने की शक्ति या वृत्ति।
मुहा.- दृष्टि मारी जाना— देखने की शक्ति न रह नाना।
देखने के लिए नेत्रों की प्रवृत्ति, अवलोकन।
मुहा.- दृष्टि करना (चलाना, देना, फेंकना,)— नजर डालना, देखना।
दृष्टि चूकना— नजर का इधर-उधर होना।
दृष्टि फिरना— (१) नेत्रों का दूसरी ओर हो जाना। (२) पहले की तरह प्रेम कृपा का भाव न रह जाना।
दृष्टि फेरना— (१) दूसरी ओर देखना। (२) पहले की तरह प्रेम-कृपा का भाव न रखना।
दृष्टि बचाना (१) सामने न आना, सामना बचाना। (२) छिपाना, न दिखाना।
दृष्टि बाँधना— ऐसा जादू करना कि कुछ का कुछ दिखायी दे।
दृष्टि लगाना— (१) टकटकी बाँधकर देखना, ताकना। (२) नजर लगाना।
नेत्र-ज्योति-प्रसार जिससे वस्तु के रूप-रंग आदि का बोध हो, दृक्पथ।
मुहा.- दृष्टि पड़ना— दिखाई देना। उ.— (क) नैंकु दृष्टि जहँ पर गई, सिव-सिर टोना लागे (हो)— १-४४। (ख) मेरी दृष्टि परे जा दिन तैं ज्ञान-मान हरि लीने री।
दृष्टि पर चढ़ना— (१) देखने में सुंदर लगना, निगाह में जँचना। (२) आँखों को खटकना।
दृष्टि बिछाना— अत्यंत प्रेम या श्रद्धा से प्रतीक्षा करना। (२) किसी के आने पर बहुत प्रेम या श्रद्धा दिखाना।
दृष्टि में आना- दिखायी पड़ना।
दृष्टि से उतरना (गिरना)— पहले की तरह प्रेम या श्रद्धा का पात्र न रह जाना।
देखने के लिए खुली हुई आँख।
मुहा.- दृष्टि उठाना— देखने के लिए आँख उठाना।
दृष्टि गड़ाना (जमाना)— एकटक देखना।
दृष्टि चुराना— सामने न पड़ना।
दृष्टि जुड़ना (मिलना)— देखा देखी होना।
दृष्टि जोड़ना (मिलाना)— देखा देखी करना।
दृष्टि फिसलना— चमक-दमक के कारण नजर न ठहरना।
दृष्टि भर देखना— जी भर कर निहारना। उ.— सूर श्रीगोपाल की छबि दृष्टि भरि देहि।
दृष्टि मारना— (१) आँख से इशारा करना। (२) आँख के इशारे से किसी काम के लिए मना करना।
दृष्टि में समाना— अच्छा लगने के कारण ध्यान में बना रहना।
दृष्टि रखना— (१) ध्यान रखना, निगरानी करना (२) देख-रेख में रखना, चौकसी रखना।
दृष्टि लगना— (१) नजर का पड़ना, दिखायी देना। (२) देखादेखी के बाद प्रेम होना। (३) नजर लगना।
दृष्टि लगाना— (१) टकटकी बाँधकर देकना। (२) ताकना। (३) प्रेम करना। (४) नजर लगाना।
दृष्टि लगाई— टकटकी बाँधकर देखते रहे। उ.— उनके मन को कह कहौं, ज्यौं दृष्टि लगाई। लैया नोई बृषभ सौं, गैया बिसराई— ७१५।
दृष्टि लड़ना— (१) देखा-देखी होना। (२) प्रेम होना।
दृष्टि लड़ाना— (१) खूब घूरना या ताकना।
ऐसी कविता जिसका अर्थ शब्दों के साधारण अर्थ से स्पष्ट न हो, बल्कि प्रसंग या रूढ़ अर्थों से जाना जाय जो कवि को अभीष्ट हों। ऐसी कविता में एक ही शब्द का प्रयोग एक ही पद में विभिन्न अर्थों में किया जा सकता है। सूरदास की 'सहित्यलहरी' म ऐसे ही पद हैं।
प्रकट, व्यक्त, प्रत्यक्ष।
दृष्टमान नास सब होई। साक्षी व्यापक नसै न सोई।
प्रत्यक्ष या व्यक्त के समान।
एक दार्शनिक सिद्धांत जो केवल प्रत्यक्ष को मानता है।
दृष्टकूट, जिनका अर्थ सरलता से न खुले।
वह अंग जिससे कोई बात सोची-समझी जाय।
किसी विषय में निश्चित् मत।
जो देखने में शुद्ध जाना पड़े।
जिसके देखने से आँखें पवित्र हों।
वह जादू या क्रिया जिससे देखनेवाले को कुछ का कुछ दिखायी पड़े।
दृष्टि की रोक या रूकावट, देखने की बाधा |
[सं. दृष्टि + वंत (प्रत्य.)]
[सं. दृष्टि + वंत (प्रत्य.)]
उ.—दृस्यमान बिनास सब होइ। साच्छी ब्यापक, नसै न सोइ—५-२।
स्त्रियों के लिए आदर सम्मान सूचक शब्द, देवी।
उ.—यह छवि सूरदास सदो रहे बानी। नँदनंदन राजा राधिका दे रानी—१७६२।
उ.—तद्यपि हरि तिहिं निज पद देइ—६-४।
स्त्रियों के लिए आदर या सम्मान-सूचक शब्द।
पुरुषों के लिए आदर या सम्मान-सूचक शब्द।
पति के छोटे भाई की पत्नी।
मुहा.- देख में— प्रत्यक्ष आँख के सामने।
मुहा.- देख लेगे— उपाय या प्रतिकार करेंगे, समझ लेंगे।
उ.—परनि परेवा प्रेम की, (रे) चित लै चढ़त अकास। तहँ चढ़ि तीय जो देखई, (रे) भू पर परत निसास—१—३२५।
देखने से, देखते ही, देखने में या पर।
उ.—(क) मोहन के मुख ऊपर वारी। देखत नैन सबै सुख उपजत, बार बार तातैं बलिहारी—१-२९। (ख) काकैं द्वार जाई होउ ठाढ़ौ, देखत काहि सुहाउँ—१-२२८।
मुहा.- देखत-सुनत— जानकारी प्राप्त करके, समझ-बूझ कर।
सिर्फ देखते या ताकते रह जाओगे, कुछ कर न सकोगे।
उ.—लैहौं छीनि दूध दधि माखन देखत ही तुम रैहौ—१०८९।
मुहा.- देखति रहियौ— निगरानी रखना, नजर या ध्पान रखना। उ.— मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ। मेरे घर कौ द्वार सखी री तब लौ देखति रहियौ— १०-३१३।
मुहा.- किसी के देखते— किसी की उपस्थिति में, किसी के सामने।
देखते-देखते— (१) आँकों के सामने। (२) तिरंत, तत्काल।
देखते रह जाना— हक्का-बक्का रह जाना, चकित हो जाना।
हम भी देखते— हम समझ लेते, हम उपाय या प्रतिकार करते।
देखता, उपाय करता, प्रतिकार करता।
उ.—हौं तौ न भयौ री घर देखत्यौ तेरी यौं अर, फोरतो बासन सब जानति बलैया—३७२।
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
मुहा. देखने में (१) ऊपरी या साधारण बात, व्यवहार या लक्षण में। (२) रूप-रंग या आकृति में।
देखनै के उद्देश्य से, दृष्टिगोचर-हेतु।
उ.—सर-क्रीड़ा दिन देखन आवत, नारद, सुर तैंतीस—९-२०।
देखने की क्रिया, भाव या ढंग।
देखनहार, देखनहारा, देखनहारो, देखनहारौ
[हिं. देखना + हारा (प्रत्य.)]
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
अवलोकन करना, निहारना, ताकना।
देखना-भालना-जाँच, निरीक्षण करना।
मुहा.- देखना-सुनना— पता लगाना, जानकारी प्राप्त करना।
देखना चहिए— कह नहीं सकते कि क्या होगा, फल की प्रतीक्षा करो।
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
(सं. दृश्, द्रक्ष्यति, प्रा. देक्खइ)
रंग-रूप दिखाने की क्रिया या भाव।
उ.— पहिरे राती चूनरी, सेत उपरना सोहै (हो)। कटि लहँगा नीलौ बन्यौ, को जो देखि न मोहै (हो)—१-४४।
देखना, देखने की क्रिया या भाव।
उ.—(क) पद-नौका की आस लगाए, बूढ़त हौं बिनु छाँह। अजबूँ सूर देखिबौ करिहौ, बेगि गहौ किन बाँह—१-१७५। (ख) बहु रथौ देखिबो वहि भाँति—२६४५।
दिखायी देता है, दिखता है।
उ.—(क) गोबिंद चलत देखियत नीके—४३२। (ख) मन कठोर तन गाँठि प्रगट ही, छिद्र बिसाल बनाए। अन्तर सून्य सदा देखियत है, निज कुल बंस भुलाए—६६१।
देख लीजिए, निहारिए, दृष्टि डालिए।
उ,— सूरदास प्रभु समुझि देखियै, मैं बड़ तोहिं करि दीन्हौ—१-१९१।
उ.— जीवन-आस प्रबल स्रुति लेखी। साच्छात सो तुममैं देखी—१-२८४।
यौ.—देखी-सुनी— न देखी है और न कभी सुनी है।
उ.— अनहोनी कहुँ भई कन्हैया देखी-सुनी न बात—१०-१८९।
देहु देखराई—दिखला दो, प्रत्यक्ष करा दो।
उ. ब्रज जाहु देहु गोपिन देखराई—३४४३।
उ.—सुदिन कब जब देखबी बन बहुत बाल बिसाल—१८२८।
दिखाते हैं, प्रत्यक्ष कराते है, समझाते हैं।
उ.—(क) तीर चलावत सिष्य सिखावत धर निसान देखरावत सारा. १९०। (ख) सूरदास प्रभु काम-सिरोमनि कोक-कला देखरावत—१९०८।
(हिं. देखना + सं. प्रेक्षण)
देखभाल, निगरानी, निरीक्षण।
उ.जब लौ एक दुहौगे तब लौं, चारि दुहौगौ नंद दुहाई। झूठहिं करत दुहाई प्रातहिं, देखहिंगे तुम्हरी अधिकाई—६६८।
उ.—मत्त मातंग बल अंग दंभोलि दल काछनी लाल गजमाल सोहै—२६०७।
सूखे डंठलों से अनाज अलग करने को बैलों से रौंदवाने की क्रिया।
साँप जैसे विषैले जंतु के काटने का घाव।
झूठी तड़क झड़क वाला, जो देखने में ही सुंदर लगे (काम का न हो )।
मुहा.- देखना चाहिए— कह नहीं सकते कि आगे क्या होगा, फल की प्रतीक्षा करो।
देखा जायगा— (१) फिर विचार किया जायगा। (२) पीछे जो कुछ करना होगा किया जायगा।
देखने की दशा या भाव, दर्शन, साक्षात्कार।
दूसरों को देखकर, दूसरों के अनुसार।
रंग-रुप दिखाने का भाव, बनाव।
दीखे, दिखायी दिये, देखने पर, देखने से।
उ.— (क)गरुड़ चढ़े देखे नँदनंदन ध्यान चरन लपटानी—१-१५०। (ख) बिन देखे ताकौं सुख भयौ। देखे तें दूनौ दुख ठयौ—१-२८८।
मुहा.- देखे रहियौ— खबरदारी रखना, धयान या निगरानी रखना। उ.— (क) सूरदास बल सौं कहै जसुमति देखे रहियौ प्यारे— ४१३। (ख) सूरस्याम कौं देखे रहियौ मारै जनि कोउ गाइ— ६८०।
देखे, देखने से, देखते है।
उ.— बिनु देखै, बिनुहीं सुनै, ठगत न कोऊ बाच्वौ (हो)—१-४४।
उ.—नंदनंदन हमको देखैगे, कैसै करि जु अन्हैबौ—७७९।
उ.—कौन सुनैं यह बात हमारी। समरथ और न देखौं तुम बिनु, कासौं बिथा कहौं बनबारी—१-१६०।
(हिं. 'देखना' का संबोधन रूप)
अवलोकन करो, देख कर ज्ञान प्राप्त करो।
उ.—प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ। अति गंभीर उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ—२-८।
केवल ऊपरी या झूठी तड़क- भड़कवाला।
उ.—सुक नृप ओर कृपा करि देख्यौ—१-३४२।
उ.—हरि सौं मीत न देख्यौ कोई—१-१०।
व्याज पर रुपया उघार देना।
देनहार, देनहारा, देनहारो, देनहारौ
[हिं. देना + हार (प्रत्य.)]
उ.—बिनु दीन्हैं ही देत सूर-प्रभु ऐसे हैं जदुनाथ गुसाइ—१-३।
भरमाइ देति—भ्रम में डाल देती हैं।
उ,— हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ। कह करौ, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ—१-४५।
उ.—सूर रोम प्रति लोचन देत्यौ, देखत बनत गुंपाल—६४३।
उ.—अंबरीष कौ साप देन गयौ, बहुरि पठायौ ताकौं—१-११३।
मुहा.- देने-लेने में होना-संबंध रखना। उ.— ये पांडव क्यौं गाड़िऐ, धरनीधर डोलैं। हम कछु लेन न देन मैं, ये बीर तिहारे— १-२३८।
दी हुई या प्रदान की हुई वस्तु या चीज।
देवताओं की प्रसन्नता के लिए किये गये यज्ञादि कर्म
कंस की चचेरी बहन जो वसुदेव को ब्याही थी। विवाह के बाद ही नारद के उकसाने पर कंस ने पति-सहित इसे बंदी कर लिया और बड़ी क्रूरता से इसके छः बालक मार डाले। इसीके आठवें गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।
श्रीकृष्ण, जिनकी माता देवकी थी।
व्यक्ति जो बहुत तेजवान हो।
बड़ों के लिए सम्मानसूचक संबोधन।
राजा के लिए आदरसूचक संबोधन।
जो किसी देवता के अंश से उत्पन्न हो या किसी देवता का अवतार हो।
देवों के प्रति कर्तव्य, यज्ञादि।
भोगने को प्रवृत्त करना, अनुभव कराना।
स्वर्ग में रहनेवाले अमर प्राणी, देवता, सुर।
पूज्य व्यक्ति या सम्मनित व्यक्ति।
मृत्यु के बाद स्वर्ग-प्राप्ति।
उ.—श्री रघुनाथ धनुष कर लीनो लागत बान देवगति पाई।
मृत्यु के बाद देवयोनि की प्राप्ति।
वह व्यक्ति जो देवता के वीर्य से उत्पन्न हुआ हो।
कार्तिक शुक्ला एकादशी जब भगवान विष्णु सोकर उठते हैं।
देवताओं के पाँच वृक्षों—मंदार, पारिजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचंदन—में एक।
ब्रह्मा, विष्णु आदि देवों के नाम ले-ले कर तर्पण करने (पानी देने) की क्रिया।
स्वर्ग के अमर प्राणी, सुर।
उंगलियों का अग्र भाग जिससे होकर तर्पण का जल गिरता है।
देवता होने का भाव या धर्म।
देवताओं के गुरू,बृहस्पति।
देवताओं के वैद्य, अश्विनीकुमार।
विष्णु भगवान का सोकर उठना।
दाँत से काटने, डंक मारने या डसनेवाला।
कटूक्तियाँ या व्यंग्य वचन कहनेवाला।
देवमंदिर, देव-मंदिर का द्वार।
उ.—टोना-टामनि जंत्र मंत्र करि, घ्यायौ देव-दुआरौ री—१०-१३५।
मंदार, पारिजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचंदन में एक।
देवता का दिया हुआ, देवता से प्राप्त।
देव-अर्पित वस्तु या संपत्ति।
शरीर की पाँच वायुओं में एक जिससे जंभाई आती है।
मंदिर को दान की हुई कन्या जो वहाँ नाचती-गाती है।
मुहा.- देवधाम करना— तीर्थयात्रा करना।
उ.— महरि बृषभानु की यह कुमारी। देवधामी करत, द्वार द्वारैं परत, पुत्र द्वै, तीसरैं यहै बारी—६९९।
दूसरे से बढ़ने की इच्छा, जिगीषा।
भारत की प्रधान लिपि जिसमें संस्कृत, हिंदी आदि लिखी जाती हैं।
वह मनुष्य जो संकट पड़ने पर भी प्रयत्न न करे, भाग्य या देव पर विश्वास किये बैठा रहे।
जहाँ वर्षाजल से ही खेती आदि का काम चल जाय।
उ.—निदरि तुरत (ताहि) मार्यौ देवनाथा —२३१८।
[सं. देव + हिं. नि (प्रत्य.)]
उ.—फल माँगत फिरि जात मुकर ह्यौ, यह देवनि की रीति —१-१७७।
उ.—देवबानी भई जीत भई राम की ताहू पै मूढ़ नाहीं सँभारे।
सभी देवों में श्रेष्ठ, श्रीकृष्ण।
उ.—तातैं कहत दयाल देवमनि, काहैं सूर बिसार्यौ—१-१०१।
देवताओं को मत्त या मतवाला करनेवाला, सोमरस।
ईश्वर की अविद्या माया जो जीवों को भ्रम या बंधन में डालती और नाच नचाती है।
देवताओं का एक महीना जो हमारे तीस वर्ष के बराबर होता है।
देवता की प्रतिमा या मूर्ति।
देवराय, देवराया, देवरायो, देवरायौ
देवराय, देवराया, देवरायो, देवरायौ
उ.—अमर जय ध्वनि भई धाक त्रिभुवन गई कंस मारथौ निदरि देवरायौ—२६१५।
वब जो ऋषि होने पर भी देवता माना जाता हो।
मक्खी जिसके डंक विषैले हों।
दाँत से काटने, डंक मारने या डसनें का कार्य।
एक ऋषि जिन्होंने जल में पैर पकड़ने पर एक गंधर्व को ग्राह हो जाने का शाप दिया था।
स्वर्ग; भु, भुव आदि सात लोक।
उ.—देवलोक देखत सब कौतुक बालकेलि अनुरागे—४१६।
देवत्व को प्राप्त (प्राणी)।
जीवात्मा को ब्रह्मलोक ले जानेवाला मार्ग।
शुक्राचार्य की कन्या जो राजा ययाति को ब्याही थी।
स्वर्ग आदि लोकों में रहनेवाले जीव जो देवों के अन्तर्गत माने जाते हैं।
उ.—कौन बरन तुम देवर सखि री, कौन तिहारौ नाथ—९-४४।
मंदार, पारिजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचंदन में एक वृक्ष।
युधिष्ठिर की ‘सुधर्मा’ अद्भुत नामक सभा जो मयदानव ने बनायी थी।
स्वायंभुव मनु की तीन कन्याओं में से एक जो कर्दम मुनि को ब्याही थी। इसके गर्भ से नौ कन्याएँ और एक पुत्र हुआ। साँख्य शास्त्र-कर्त्ता कपिल इन्हीं के पुत्र थे।
उ.—जय जयकार करति देवांगन बरखन कुसुम अपार-सारा—७९४।
विद्याधर आदि उपदेव जो देवताओं के साथ चलते हैं।
देवताओं का दीर्घ जीवनकाल।
देने को प्रेरित किया, दिलाये।
उ.—आप प्रभासु बिप्र बहुजन को बहुतक दात देवाये—सारा. ८३६।
दिलाया, देने की प्रेरित किया।
उ.—(क) नौलख दान दयौ राजा नृग बहु-तक दान देवायो—सारा. ८२२। (ख) नाना बिधि कीन्ही हरि क्रीड़ा जदुकुल साप देवायो—८४२।
देवताओं के शत्रु, राक्षस।
उ.—हमहूँ कौं अपराध लगावहिं ऐऊ भई देवानी—पृ. ३२४ (८६)।
इन्द्र का घोड़ा, उच्चैःश्र्वा।
उ.—दूध दही नहिं लेव री, कहि कहि पचि हारी। कहति, सूर कोऊ घर नाहीं, कहै वई दउमारी।
देना किया के भूत-कालिक रूप ‘दिया’ के स्त्रीलिंग ‘दी’ का व्रजभाषा-प्रयोग; दी।
उ.—(क) बहुत सासना दई प्रहला-दहिं, ताहिं निसंक कियौ—१-३८। (ख) दई न जाति खेवट उतराई चाहत चढ़्यौ जहाज—१-१०८।
उ.—(क) तनया तीनि सुनौ अब सोई। दच्छ प्रजापति कौं इक दई—३-१२। (ख) महादेव कौं सो तिन दई—४-४। (ग) जब तैं कन्या रिषि कौं दई—६-३।
(हिं. देवी + भोयना=भुलाना)
देवी का भक्त या माननेवाला, ओझा।
उ.—(क) जो प्रभु नर-देहीं नहिं धरते। देवै गर्भ नहीं अवतरते—११८६। (ख) बारबार देवै कहै कबहूँ गोद खिलाए नाहिं—२६२५।
कार्तिक शुक्ला एकादशी को विष्णु का शेष-शैया त्यागना।
प्रान्त या प्रदेश की भाषा।
देश में रहने वाला या स्थित।
ध्रुवों की उत्तर-दक्षिणी मध्यरेखा से पूर्व या पश्चिम की दूरी।
वह शब्द जिसकी उत्पत्ति अज्ञात हो और जिसके मूल का पता न लगे।
देश की रीति-नीति जाननेवाला।
देश से निकाले जाने का दंड।
वह जो देश की उन्नति के लिए तन-मन-धन वार सके।
पृथ्वी का प्राकृतिक विभाग, जनपद।
उ.—(क) हरि, हौ सब पतितनि-पतितेस। और न सरि करिबैं कौ दूजौ, महामोह मम देस—१-१४१। (ख) हरीचंद सो को जग दाता सो घर नीच भरै। जे गृह छाँड़ि देस बहु धावै, तउ वह संग फिरै—१-२६४। (ग) छाँड़ि देस भय, यह कहि डाँटयौ—१-२९०। (घ) उदै सारंग जान सारंग गयौ अपने देस—सा. ५६। (ङ) सकल देस ताकौं नृप दयौ—९-२।
देश से निकाले जाने का दण्ड।
उ.—जो मेरैं लाल खिझावै। सो अपनौ कीनौ पावै। तिहिं दैहौं देस-निकारौ। ताकौ ब्रज नाहिंन गारौं—१०-१८३।
अपने देश में बना हुआ या उत्पन्न।
अपने ही शरीर के भरण-भोषण में लगा रहनवाला।
उ.—हरि के जन की अति ठकुराई। निरभय देह राज-गढ़ ताकौ, लोक मनन-उतसाहु। काम, क्रोध, मद लोभ, मोह ये भए चोर तैं साहु—१-४०।
मुहा.- देह छूटना— मृत्यु होना।
देह छोड़ना— मरना।
देहु धरना— जन्म लेना।
देह धरि— जन्म या अवतार लेकर। उ.— सूर देह धरि सुरनि उधारन, भूमि-भार येई हरिहैं— १०-१५।
देह लेना— जन्म लेना।
देह बिसारना— शरीर की सुध न रखना।
उ.—लिंग-देह नृप कौं निज गेह। दस इंद्रिय दासी सौं नेह—४-१२।
उ.—बहुत दुखित है (यह) तेरैं नेह। एक बेर इहिं दरसन देह—९-२।
शरीर धारण करनेवाला, जन्म लेने वाला।
चिड़ियों का पंख, पक्ष, डैना।
नदी किनारे की निचली भूमि।
उ.—निसि के सुख कहे देत अधर नैना उर नख लागे छबि देहरा—२००१।
दूसरे शरीर की प्राप्ति, पुनर्जन्म।
देहली दरवाजे के नीचे की चौखट।
उ.—(क) भीतर तैं बाहर लौं आवत। घर-आँगन अति चलत सुगम भए, देहरि अँटकावत—१०-१२५। (ख) देहरि लौं चलि जात, बहुरि फिर-फिर इतहीं कौं आवै—१०-१२६। (ग) देहरि चढ़त परत गिरि-गिरि, कर-पल्लव गहति जु मैया—१०-१३१।
नदी किनारे की निचली भूमि।
द्वार के चौखटे की नीची लकड़ी, देहली।
उ.— (क) बसुधा त्रिपद करत नहिं आलस, तिनहिं कठिन भयौ देहरी उलँघना—१०-२२३। (ख) सूरदास अब धाम-देहरी चढ़ि न सकत प्रभु खरे अजान—१०-२२७।
देहली का दीपक जो बाहर-भीतर, दोनों ओर प्रकाश करता है।
देहली दीपक न्याय— देहली दीपक के बाहर-भीतर फैले प्रकाश के समान दोनों ओर लगनेवाली बात।
वह जो शरीर धारण किये हो, प्राणी।
उ.—(क) अबधौं कैसी करिहैं दई—१-२६१। (ख) अबिगत-गति कछु समुझि परत नहिं जो कछु करत दई—१-२६६।
मुहा.- दई का घाला (मारा, मारयौ)- अभागा। अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन, दई को मारयौ। १-१०१। दई की घाली (मारी)- अभागी। उ.— जननि कहति दई की घाली, काहे को इतराति। दई दई— (१) हे दैव, रक्षा के लिए ईश्वर को पुकारवना। (२) अति विपत्ति में अपने दुर्भाग्य को कोसना।
भाग्य, प्रारब्ध, दैव, संयोग।
‘देना’ क्रिया के भूतकालिक रूप ‘दिया’ के बहुवचन ‘दिये’ का ग्राम्य प्रयोग।
उ.—प्रगट खंभ तैं दए दिखाई जद्यपि कुल कौ दानौं—१-११।
उत्तर दिशा के सामने की दिशा, दक्षिण दिशा।
जो शरीर से परे या स्वतंत्र हो।
जिसे शरीर का अभिमान न हो।
वह जो शरीर को ही आत्मा मानता हो।
देह को ही आत्मा मानने-समझने का भ्रम।
पीठि देहिं—मान-सम्मान नहीं देते, आदर-सत्कार नहीं करते। भजन-भाव नहीं करते, नहीं मानते।
उ.—भक्तबिरह-कातर करुनामय डोलत पाछैं लागे। सूरदास ऐसे स्वामी कौं देहिं पीठि सो अभागे—१-८।
फल देहिंगी—बदला देंगी, परिणाम भुगता देंगी।
उ.—लालन हमहिं करे जे हाल उहै फल देहिंगी हो—२४१६।
उ.— रूक्म कह्यौ सिसुपालहिं देहौं, नाहीं कृष्ण सौ काम—सारा. ६२८।
(क्रिया या व्यापार -सूचक) से।
उ.—पट कुचैल, दुरबल द्विज देखत, ताके तंदुल खाए (हो)। संपति दै ताकौ पतिनी कौं, मन अभिलाष पुराए (हो)—१-७।
उ.—हलधर कहउ, लाउ री मैया। मोकौ दै नहिं लेत कन्हैया—३९६।
उ.—भात पसारि रोहिनी ल्याई। घृत सुगंधि तुरतै दै ताई—३९६।
द तारी तार—ताली और ताल बजाकर।
उ.—मोहिं देखि सब हँसत परस्पर, दै दै तारी तार—१-१७५।
दै कान- कान देकर, ध्यान लगाकर।
उ.—और उपाय नहीं रे बौरे, सुनि तू यह दै कान—१-३०४।
दै लात—लात रखकर, खड़े होकर।
उ.—कैसै कहति लियौ छीकै तैं ग्वाल कंध दै लात।
लात मारकर, ठोकर देकर। आगैं दै—आगे करके।
उ.—आगे दै पुनि ल्यावत घर कौं—४२४।
उ.— देहीं लाइ तिलक केसरि कौ जोबन मद इतराति—१०-२९०।
देते हैं, प्रदान करते हैं।
उ.—नर-देही दीनी सुमिरन कौं मो पापी तैं कछु न सरी—१-११६।
उ.—भैया-बंधु-कुटुंब घनेरे, तिनतैं कछु न सरी। लै देही घर-बाहर जारी, सिर ठोंकी लकरी—१-७१।
उ.—मैं बर देहुँ तोहिं सो लेहि—१-२२९।
उ.— (क) सुख सोऊँ सुनि बचन तुम्हारे देहु कृपा करि बाँह—१-५१। (ख) तुम बिनु साँकरैं को काकौ। तुमहीं देहु बताइ देवमनि, नाम लेउँ धौं ताकौ—१-११३।
उ.—अंबर जहाँ बताऊँ तुमको। तौ तुम कहा देहुगी हमको—७९९।
उ.— (क) धन्य लियौ अंवतार, कोखि धनि, जहँ दैतारी—४३१। (ख) चरन पखारि लियौ चरनोदक धनि धनि कहि दैतारि—३०५०।
कश्यप के दिति नामक पत्नी से उत्पन्न पुत्र, दैत्य।
बहुत लंबे-चौड़े डील-डौल का मनुष्य।
किसी काम में अति या असाधारणता करनेवाला।
विष्णु या उनके राम कृष्ण आदि अवतार।
उ.—(क) चरन पखारि लियो चरनोदक धनि धनि कहि दैत्यारी—२५८७। (ख) त्राहि-त्राहि श्रीपति दैत्यारी—२१५९। (ग) भयौ पूरब फल सँपूरन लह्यौ सुत दैत्यारि—३०९१।
दैत्यों का एक रात-दिन जो मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है।
देनेवाली, प्रदान करनेवाली।
उ.— गंग-तरंग बिलोकत नैन।¨¨¨। परम पवित्र, मुक्ति की दाता, भागीरथहिं भब्य बर दैन —९-१२।
मुहा.- लैन न दैन— न लेन में न देने में, किसी तरह के संबंध में नहीं। उ.— ए गीधे नहिं टरत वहाँ ते मोसौं लेन न दैन— पृं ३१३-१८।
वह पुस्तिका जिसमें रोज के कार्य या विचार लिखें जायें, डायरी।
देनेवाली, प्रदान करनेवाली।
उ.— जय, जय, जय, जय माधव बेनी। जग हित प्रगट करी करूनामय, अगतिनि कौं गति दैनी—९-११।
[हिं. देना (समास-वत् प्रयोग)]
देनेवाला, प्रदान करनेवाला।
उ.—सूर-स्याम संतन-हित-कारन प्रगट भए सुख-दैनु—१०-५०२।
मुहा.- लैनु न दैनु— लेना न देना, काम काज, उद्देश्य-प्रयोग या संबंध न होना, व्यर्थ ही। उ.— चलत कहाँ मन और पुरी तन जहाँ कछु लैन न दैनु— ४९१।
देने या प्रदान करने की क्रिया या भाव।
उ.—तन दैबै तैं नाहिंन भजौं —६-५।
दूरि करि दैयत- दूर कर देते हैं।
उ.— दूजे करज दूरि करि दैयत, नैंकु न तामैं आवै—१-१४२।
उ.—(क) मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल देयत को—९-८४। (ख) दासी हुती असुर दैयत की अब कुल-बधू कहावै—३०८८।
मुहा.- दैया दैया— रक्षा के लिए ईश्वर की पुकार, हे दैव, हे दैव। उ.— ब्यानी गाइ बछुरूवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया। यहै देखि मोकौं बिजुकानी, भाजि चल्यौ कहिं दैया दैया— १०-३३५।
आश्चर्य, भय या दुख की अधिकता-सूचक, स्त्रियों के मुख से सहसा निकल पड़नेवाला एक शब्द, हे दैव, हे राम।
देवता के द्वारा होनेवाला।
मुहा.- दैव लगाना— बुरे दिन आना, ईश्वरीय कोप होना।
मुहा.- दैव बरसना— पानी बरसना।
देवी-देवताओं के विषय का ज्ञाता।
दक्षिण दिशा में, दक्षिण की ऒर।
दक्षिणी प्रदेश का निवासी।
एक प्रजापति जो देवताऒं के आदि पुरुष माने जाते हैं।
आठ प्रकार के विवाहों में एक जिसमें यज्ञ करनेवाला व्यक्ति ऋत्विज या पुरोहित को कन्यादान कर देता था।
श्राद्ध जो देवताओं के लिए हो।
सूर्य के पुत्र शनि और यम।
भाग्य के भरोसे रहकर परिश्रम न करनेवाला।
देवताओं का दिया या रचा हुआ।
अकस्मात या संयोग से होनेवाली।
दैव या ईश्वर-कृत बात या लीला।
जान दे दूँगा, मर जाऊँगा। तव सिर छत्र न दैहौं—तुझे राजा नहीं बना लूँगा। तुझे न पहना दूँगा।
उ.— तब लगि हौं बैकुंठ न जैंहौं। सुनि प्रहलाद प्रतिज्ञा मेरी जब लगि तव सिर छत्र न दैंहौं—७-५।
उ.— तंदुल माँगि दोंचि कलाई सो दीन्हों उपहार—सारा—८०९।
मुहा.- दो-एक— कुछ, थोड़े।
दो-चार— कुछ, थोड़ें।
दो-चार होना— मुलाकात होना।
दो दिन का बहुत ही थोड़े समय का।
दो दाने को फिरना (भटकना)— बहुत ही निर्धन दशा में भिक्षा मांगते घूमना।
दो-दो बातें करना— (१) थोड़ी बातचीत। (२) पूँछ ताँछ।
दो नावों पर पैर रखना— दो साथ न रहनेवाले आश्रयों या पक्षों का सहारा लेना।
किसके दो सिर हैं— किसमें इतना साहस या बल है जो मरने से नहीं डरता।
उ.—पहिरावन जो पाइहैं सो तुमहूँ दैहैं—२५७६।
उ.—अजहुँ उठाइ राखि री मैया, माँगे तैं कह दैहै री। आवत ही लै जैहै राधा, पुनि पाछैं पछितैहै री—७११।
जान दैहौं जाने दूँगा, भेजने की व्यवस्था कर दूँगा।
उ.— सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब प्रात जान मैं दैहौं—४२०।
उ.—घर बन कुछ न सुहाइ रौनि-दिन मनहुँ मृगी दो दाहै—२८०१।
दो नदियों के बीच की भूमि जो उपजाऊ होती है।
उ.—दोई लख धेनु दई तेहि अवसर बहुतहिं दान दिवायो—सारा. ३९२।
उ.—कुरपति कह्यो अंध हम दोइ। बन मैं भजन कौन बिधि होइ—१-२८४।
उ.—(क) ऊँच नीच हरि गनत न दोइ—१-२३६। (ख) हरि हरि-भक्त एक, नहिं दोइ—-१-२९०। (ग) सत्रु-मित्र हरि गनत न दोइ—२-५।
उ.—(क) उन दोउनि सौं भई लराई—१-२८९। (ख) माया-मोह न छाँड़ै तृष्णा, ये दोऊ दुख-थाती—१-११८।
उ.— मनहिं यह परतीति आई दूरि हरिहौ दोच।
उ.— ऐसी गति मेरी तुम आगे करत कहा जिय दोचन—१५१७।
जिसका ध्यान दो कामों या बातों में बँटा हो, जो एकाग्र न हो।
दो नदियों के बीच की भूमि।
जो माता के वास्तविक पति से न पैदा हुआ हो, जारज।
जिसके माता-पिता भिन्न जाति के हों।
ध्यान का दो कामों या बातों में बँटा रहना।
दोनों तरफ का, दोनों ओर से संबंधित।
दो खंड का, जिसमें दो खंड या मंजिल हों।
कही हुई बात से मुकरना या इनकार करना।
जिसका चित्त या ध्यान दो कामों या बातों में बँटा हो, दोचित्ता।
सती जो शिव को ब्याही थी और पिता के यज्ञ में बिना बुलाये जाकर अपमानित होने पर भस्म हो गयी थी।
कवि जो पुरस्कार के लोभ से कविता लिखे।
दो पहाड़ों की बिचली भीमि।
दो नदियों के बीच की भूमि।
दो वस्तुओं की संधि या मेल।
पत्तों को मोड़कर बना हुआ गहरे कटोरे के आकार का पात्र।
उ.—दधि-ओदन दोना भरि दैहौं, अरू भाइनि मैं थपिहौं—९-१६४।
उ.— बेसन के दस-बीसक दोना—३९७।
मुहा.- दोना चढ़ाना— समाधि पर फूल-मिठाई चढ़ाना।
दोना खाना (चाटना) बाजार की चाट-मिठाई खाना।
(हिं. दोना का स्त्री. अल्पा.)
उ.—डारत, खात, लेत अपनैं कर, रूचि मानत दधि दोनियाँ—१०-२३८।
उ.— दधि ओदन भरि दोनों दैहौं अरू अंचल की पाग—२९४८।
मुहा.- दोनों की चाट पड़ना— बाजारू चाट या मिठाई खाने का चस्का पड़ जाना।
[हिं. दो + पल्ला + ई(प्रत्य.)]
एक तरह की हल्की महीन टोपी।
दोहरी चाल चलने या बात करनेवाला।
उ.— दोय खंभ बिश्वकर्मा बनाए काम-कुंद चढ़ाई—२२७९।
दोहरी चाल चलने या दावँ करनेवाला, दोनों पक्षों में लगा रहनेवाला।
मुहा.- दोपइर ढलना— दोपहर बीत जाना
उ.— (क) दोबल कहा देति मोहिं सजनी तू तो बड़ी सुजान। अपनी सी मैं बहुतै कीन्हीं रहति न तेरी आन। (ख) दोबल देति सबै मोही को उन पठयो मैं आयो—११६६।
दो भिन्न भिन्न भाषाओं के जानकारों का मध्यस्थ जो एक को दूसरे का आशय समझा दे।
[हिं. दो + रंग + ई(प्रत्य.)]
दोनों ओर चलने या लगने का भाव।
[हिं. दो + रंग + ई(प्रत्य.)]
वह स्थान जहाँ से दो मार्ग भिन्न दिशाओं में जाते हों।
दोनों ओर समान रूप-रंग का।
दोनों ओर भिन्न रूप-रंग का।
उ.—सूरदास बिनती कह बिनवै दोषनि देह भरी—१-१३१।
मुहा.- दोष लगाना— बुराई बताना, बुराइ का पता लगाना या बताना।
अभियोग, लांछन, कलंक। दोष देना (लगाना) — कलंक लगाना।
दोषारोपण— दोष लेना या लागाना।
उ.—मन-कृत-दोष अथाह तरंगिनि, तरि नहिं सक्यौ, समायौ—१-६७।
साहित्य में वे पाँच बातें जिनसे काव्य के गुण में कमी हो जाती है पद, पदांश, वाक्य, अर्थ और रस-दोष।
कुफल, बुरा परिणाम, अमंगल।
उ.— (क) छींक सुनत कुसगुन कह्यौ कहा भयौ यह पाप। अजिर चली पछितात छींक कौ दोष निवारन—५८९। (ख) आइ अजिर निकसी नंदरानी बहुरी दोष मिटाइ —५४०।
युद्ध कभी जिसमें एक पक्ष की जीत हो, कभी दूसरे की, ओर निर्णय न हो सके।
वह तलवार जो लोहे के दो टुकड़ों को जोड़कर बनायी जाय।
फागुन की पूर्णमा को वैष्णवों द्वारा ठाकुर जी को फलों के हिंडोले पर झुलाये जाने का उत्सव।
उ.— महरि तुमहिं कछु दोषन नाहीं।
वह कागज जिस पर किसी के दोषों या अपराधों का विवरण लिखा हो।
जिसमें दोष हों, दोषपूर्ण।
जिसमें दोष हों, दोषपूर्ण।
जिसमें अवगुण या बुराई हो।
विंध्य प्रदेश से दक्षिण वह प्रदेश जहाँ से दक्षिण भारत को मार्ग मिलता है।
कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा की ओर सूर्य की गति।
छः महीने का वह समय (२ जून से २२ दिसंबर तक) जब सूर्य कर्क रेखा सें दक्षिण मकर रेखा की ओर बढ़ता है।
[सं. दक्षिण+हिं. ई (प्रत्य.) ]
[सं. दक्षिण+हिं. ई (प्रत्य.) ]
[सं. दक्षिण+हिं. ई (प्रत्य.) ]
उ.— सूर स्याम दरसन बिन पाये नयन देत मोहिं दोसों—१२२१।
मित्रता, मित्रता का व्यवहार।
वह स्त्री जिसको, पति के मरने पर दूसरे पुरूष ने रख लिया हो, उपपत्नी।
दोनों हाथों से मारा गया थप्पड़।
जो दोनों हाथों से ही या किया जाय।
एक प्रचीन कवि-श्रुति जिसके अनुसार सुंदर स्त्री के चरणाघात से अशोक, दृष्टिपात से तिलक, आलिंगन से कुर्वक, फूँक मारने से चंपा आदि वृक्ष फूलते हैं।
उ. धनुष सौं टारि पर्बत किए एक दिसि, पृथी सम करि प्रजा सब बसाई। सुर-रिषिनि नृपति पुनि पृथी दोहन करी, आपनी जीविका सबनि पाई—४-११।
दूध दुहने की हाँड़ी, मिट्टी अथवा धातु का वह पात्र जिसमें दूध दुहते हैं।
उ.— (क) मैं दुहिहौं मोहिं दुहन सिखावहु। कैसे गहत दोहनी घुटुवनि, कैसैं बछरा थन लै लावहु—४०१।
दो परतों का या दोहरा किया जाना।
दो परतों में या दोहरा करना।
दोहराने की क्रिया, भाव या पारिश्रमिक।
किसी बात को बार-बार कहना।
किसी कपड़े, कागज आदि की दो तहें करना।
उ.— किसलै कुसुम नव नूत दसहुँ दिसि मधुकर मदन दोहाई—२७८४।
मुहा.- फिरत दोहाई— घोषणा फिर रही है। उ.— बोलत बग निकेत गरजै अति मानो फिरत दोहाई— २८३६।
रक्षा, बचाव या सहायता के लिए पुकार।
उ.— आपु गई जसुमतिहिं सुनावन दै गई स्यामहिं नंद दुहाई—७५७।
(सं. दुर्भाग्य, हिं. दोहाग)
अभाग्य, दुर्भाग्य, भाग्यहीनता।
उ.— सूरदास नँद लेहु दोहिनी, दुहहु लाल की नाटी—१०-२५९।
मादा पशु जो दुही जाती है, स्त्री जिसके दूध होता है।
उ.— बल मोहन रथ बैठे सुफलकसुत चढ़न चहत यह सुनि चकित भई बिरह दौं लगाई—२५२५।
किसी न किसी प्रकार दबाव डालकर लेना।
लेने के लिए अड़कर या दबाव डालकर।
उ.—तंदुल माँगि दौंचि कै लाई सो दीनो उपहार— सारा.।
रस्सी में बँधे बैलों की जोड़ी।
उ.—(क) पुनि जुरि दौ दीनी पुर लाइ। जरन लगे पुर लोग लुगाइ—४-१२। (ख) मेरे हियरे दौ लागति है जारत तनु को चीर—२६८६।
मुहा.- दौड़ पड़ना— तेजी स चलने लगना।
दौड़ कर आना जाना— जल्दी आना- जाना।
उद्योग में इधर-उधर फिरना, प्रयत्न।
उद्योग या प्रयत्न की सीमा या पहुँच।
किसी काम के लिए इधर-उधर दौड़ने की क्रिया या भाव, प्रयत्न, उद्योग, परिश्रम।
मुहा.- चढ़ दौड़ना— धावा या चढ़ाई करना।
सहसा प्रवृत्त हो जाना, जुट पड़ना।
प्रयत्न में इधर-उधर फिरना।
बहुत से लोगों का एक साथ दौड़ना।
दौड़ने में प्रवृत्त करना।
बार-बार आने-जाने को विवश करना।
जो टिका या स्थित हो, ठहरा या बैठा हुआ।
उ.— द्वै पिक बिंब बतीस बज्रकन एक जलज पर थात—१६८२।
उ.—पलित केस, कफ कैठ विरूध्यौ, कल न परति दिन-राती। माया-मोह न छाँड़ै तृष्ना, ये दोऊ दुंख-थाती—१-११८।
दूसरे के पास रखी गयी ऐसी वस्तु या संपत्ति जो माँगने पर मिल जाय, धरोहर।
उ. —थाती प्रान तुम्हारी मोपै, जनमत ही जौ दीन्ही। सो मैं बाँटि दई पाँचनि कौं, देह जमानति कीन्ही—१-१९६।
कुसमय के लिए संचित वस्तु।
उ.-(क) उहाँई प्रेम भक्ति को थान—२८०६।
रहने या ठहरने का स्थान, डेरा, निवासस्थान।
उ. — (क) कहियौ बच्छ, सँदेसै इतनौ जब हम वै इक थान। सोवत काग छुयौ तन मेरौ, बरहहिं कीनौ बान—९-८३। (ख) बिपुल विभूति लई चतुरानन एक कमल करि थान—२३४०।
किसी देवी-देवता के रहने का स्थान।
मुहा.- थान का टर्रा— वह जो अपने घर या स्थान में ही बढ़-बढ़ कर बोले, बाहर कुछ न कर सके।
थान में आना— (१) चौपाये का धूल में लोटकर प्रसन्न होना। (२) खुशी में आकर कुलाँचे मारना।
उत्तर दिशा के सामने की दिशा।
वह नायक जो सब प्रेमिकाऒं से समान प्रेम करे।
यज्ञादि धर्म-कर्म या विद्या प्राप्ति के बाद पुरस्कार या भेंट रूप में दिया जानेवाला धन या दान।
उ.—(क) गुरु दक्षिणा देन जब लागे गुरु पत्नी यह माँग्यौ—सारा. ५३६। (ख) गुरु सौं कह्यौ जोरि कर दोऊ दक्षिणा कहौ सो देउँ मँगाई—३००५।
वह नायिका जो नायक को अन्य स्त्रियों से प्रेम करते देखकर भी अपनी प्रीति पूर्ववत् बनाये रहे।
वैदिक मार्ग से मिलता-जुलता एक आचार-मार्ग।
दोने में रखा खाने का सामान।
उ.—बोलत नहीं रहत वह मौना। दधि लै छीनि खात रह्यौ दौना।
एक पर्वत जिस पर हनुमान जी लक्ष्मण जी के शक्ति लगने पर संजीवनी जड़ी लेने गये थे।
उ. — (क) दौनागिरि पर आहि सँजीवनि, बैद सुषेन बतायौ —९-१४९। (ख) दौनागिरि हनुमान सिधायौ—९-१५०।
परथौ अधिक करि दौर—प्राप्ति के लिए दौड़ पड़ा, दौड़कर उसे पा लिया या उसमें जा पड़ा।
उ.— माधौ जू मन माया बस कीन्हौ। लाभ-हानि कछु समुझत नाहीं ज्यौं पतंग तन दीन्हौ। गृह दीपक, धन तेल, तूल तिय, सुत ज्वाला अति जोर। मैं मतिहीन मरम नहिं जान्यौ, परयौ अधिक करि दौर—१-४६।
दौरदौरा— प्रधानता, प्रबलता, अधिकार।
दौड़ते हैं, दौड़ते (समय, में)
उ.— (क) दौरत कहा, चोट लगिहै कहुँ पुनि खेलिहौ सकारे—१०-२२६। (ख) कहति रोहिनी सोवन देहु न, खेलत-दौरत हारि गए री—१०-२४७। (ग) मोहन मुसकि गही दौरत मैं छूटि तनी छँद रहित घाँघरी—२२९६। (घ) एक अँधेरो हिये की फूटी दौरत पहिर खराऊँ—३४६६।
दौड़ना, दौड़ने में प्रवृत्त होना।
जाँच-पड़ताल के लिए घूमना।
ऐसी बात होना जो समय-समय पर होती हो।
ऐसा रोग जो समय - समय पर हो।
लगातार, बिना थके या विश्राम लिये।
दुरात्मा होने का भाव, दुष्टता।
उ.— (क) ज्यौं मृगा कस्तूरि भूलै, सु तौ ताकैं पास। भ्रमत हीं वह दौरि ढूँढै, जबहिं पावै बास—१-७०। (ख) तुम हरि साँकरे के साथी। सुनत पुकार, परम आतुर है, दौरि छुड़ायौ हाथी—१-१११२।
उ.— यह सुनत रिस भरयौ दौरिबे को परयौ सूडि झटकत पटकि कूक पारयौ—२४९२।
दौड़ता हुआ, भागता हुआ, द्रुत गति से चलता हुआ।
उ.— फिरि इत-उत जसुमति जो देखै, दृष्टि न परै कन्हाई। जान्यौ जात ग्वाल संग दौरयौ, टेरित जसुमति धाई—४१३।
उ.— सूर सुनत संभ्रम उठि दौरी प्रेम मगन तन दसा बिसारे—१-२४०।
उ.— सूर सुकुबरी चंदन लीन्हें मिली स्याम को दौरी—२५८६।
मुहा.- फिरौगी दौरी दौरी— परेशान और हैरान होकर मारी-मारी फिरोगी। उ.— सूर सुनहु लैहैं छँढ़ाइ सब अबहिं फिरौगी दौरी दौरी— १११४।
उ.—असी सहस किंकर-दल तेहिके दौरे मोहिं निहारि—९-१०४।
उ.— महासिंह निज भाग लेत ज्यों पाछे दौरे स्वान—सारा. ६३७।
उ.— हरि-सुत-बाहन-असन सनेही मानहु अनल देह दौलाई— सा. उ.—२१।
दिलाऊँ, (दूसरे को) देने के लिए प्रवृत्त करूँ।
उ.— मेरे संग राजा पै आउ। द्याऊँ तोहि राज-धन-गाउँ—४-९।
जिसमें दया-भाव अधिक हो, दयावान, दयालु।
उ.— दीन के द्याल गोपाल, करूना मयी मातु सो सुनि, तुरत सरन आयौ—४-१०।
गारी द्यावत - गाली दिलवाते हैं
उ.— सूर- स्याम सर्वग्य कहावत मात-पिता सौं द्यावत गारी—११३७।
दरस नहिं द्यावत.... दर्शन नहीं देते, दर्शन नहीं कराती।
उ.— सूरस्याम कैसे तुम देखति मोहिं दरस नहिं द्यावत री—१६३४।
आकाश में चलनेवाला (पक्षी)।
[सं. द्य ति + मा (प्रत्य.)]
किसी की सच्ची बात का भी अविश्वास करना।
विश्वकर्मा की पुत्री जो सूर्य को ब्याही थी।
(सं. द्यु मत्, हिं, द्यु मान् )
उ.— तक्षक धनंजय पुनि देवदत्त अरू पौणड संख द्युमान्-सारा. ९।
द्यो समझाये— समझाये देता हूँ।
उ.— जो कहै मोहिं काहे तुम्ह ल्याये। ताको उत्तर द्यों समुझाये — १०३-३२।
प्रकाश करने या जलाने का काम।
उ.— (क) नैंकु रहौ, माखन द्यौं तुमकौ —१०-१६७। (ख) सद दधि-माखन द्यौं आनी—१०-१८३।
द्यो डारी— दे डालो, प्रदान कर दो।
उ.—चोली हार तुम्हहिं कौं दीन्हों, चीर हमहिं द्यौ डारी—७८८।
उ.— (क) स्यार द्यौस, निसि बौलै काग—१-२८६। (ख) चलत चितवत द्यौस जागत सपन सोवत राति—३०७०।
उ.— सात दिवस गोबर्धन राख्यो इंन्द्र गयौ द्रप छोड़ि—२५०५।
पसीजती है, दयार्द्र होती है, दया करती है।
उ.— कुलिसहुँ तैं कठिन छतिया चितै री तेरी अजहुँ द्रवति जो न देखति दुखारि—३६२।
पुलकित, जो प्रेम से पसीज गया हो।
उ.—मनौ धेनु तृन छाडी बच्छ-हित, प्रेम द्रवित चित स्रवत पयोधर—१०-१२४।
जो पानी की तरह पतला या तरल हो गया हो।
उ.— कह दाता जो द्रवै न दीनहिं देखि दुखित तत्काल—१-१५६।
वह पदार्थ जो गुण अथवा गुण और क्रिया का आश्रय हो।
पिघलने-पसीजने की क्रिया या भाव।
दया करते हैं, पसीज जाते हैं।
उ.—कहियत परम उदार कृपानिधि अंत-र्यामी त्रिभुवन तात। द्रवत हैं आपु देत दास को रीझत हैं तुलसी के पात।
चित्त को द्रवित कर देनवाला।
उ.—अंचल ऐंचि ऐचि राखत हो जान अब देहु होत है दगरौ—१०३१।
(अ.दगल+अनु. फ़सल या हि. फँसना)
भेंट या साक्षात् करनेवाला।
स्थान जहाँ जल काफी गहरा हो, दह।
बहने-पसीजने या गलने-पिघलने की क्रिया।
पेड़ का, पेड़ से संबंधित।
मुहा.- द्राविड़ी प्राणायाम- सीधी तरह होनेवाले काम को बहुत घुमा-फिरा कर करना।
एक चंद्रवंशी राजा। द्रुपद की पुत्री द्रौपदी पाँडवों की ब्याही थी। उसके पुत्र शिखंडी को आगे करके अर्जुन ने भीष्म को मारा था। महाभारत के युद्ध में द्रुपद भी मारा गया था।
राजा द्रुपद की पुत्री, द्रौपदी।
राजा द्रुपद की पुत्री, द्रौपदी।
राजा द्रुपद की पुत्री, द्रौपदी जो पाँडवों को ब्याही थी।
उ.—बोलत मोर सैल द्रुम चढ़ि-चढ़ि बग जु उड़त तरू डारै—२८२०।
रूक्मिणी से उत्पन्न श्री कृष्ण के एक पुत्र का नाम।
एक पर्वत जहाँ से हनुमान जी लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी जड़ी लाये थे।
महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा जो कौरवों-पांडवों के गुरू थे।
द्रोण का पुत्र अश्वत्थामा।
दो पर्वतों की बिचली भूमि।
द्रोणाचार्य की स्त्री, कृपी।
महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा द्रोणाचार्य।
उ.— अब कैं राखि लेहु भगवान। हौं अनाथ बैठयौ द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान—१-९७।
ऊपर से साधु भीतर से दोषी।
द्रौणायन, द्रोणायनि , द्रौणि
द्रोणाचार्य का पुत्र, अश्वत्थामा।
राजा द्रुपद की कृष्णा नाम्नी कन्या जो अर्जुन को ब्याही थी, परंतु माता की आज्ञा से जिसे अन्य चारों पाँडवों ने भी स्वीकार किया था।
दो परस्पर विरोधी चीजों का जोड़ा।
किसी काम में हाथ डालना, हस्तक्षेप।
[हिं. दक्खिन+हा (प्रत्य.)]
दक्षिण का, दक्षिण दिशा से संबंध रखनेवाला।
दो परस्पर विरूद्ध चीजों का जोड़ा जैसे राग-द्वेष, सुखृ-दुख।
उ.— बोलि लीन्हों कदम के तर इहाँ आवहु नारि। प्रगट भए तहाँ सबनि को हरि काम द्वंद निवारि—।
उ.—भोर होत उरहन लै आवति ब्रज की बधू अनेक। फिरत जहाँ तहँ द्वंद मचावत घर न रहत छन एक।
उ.—काम-क्रोध लोभहिं परिहरै। द्वंद रहित उद्यम नहीं करै—३-१३।
सुख-दुख आदि द्वंद्वों से उत्पन्न (मनोवृत्ति)
[सं. द्वय + ता (प्रत्य.)]
[सं. द्वय + ता (प्रत्य.)]
विष्णु का एक मंत्र- ओं नमो भगवते वासुदेवाय।
उ.—द्वादस अच्छर मंत्र सुनायौ। और चतुरभुज रूप बतायौ —४-९।
किसी पक्ष की बारहवीं तिथि।
उ.—द्वादसि पोषै लै आहार। घटिका दोइ द्वादसी जान—९-५।
बारह युगों में तीसरा युग जो ८६४००० वर्ष का माना जाता है।
मुहा.- द्वार खुलना— मार्ग या उपाय निकलना।
द्वार-द्वार फिरना— (१) बहुतों के यहाँ जाना। (२) घर-घर भीख माँगना।
द्वार लगना— (१) दरवाजा बंद होना। (२) आस लगाये द्वार पर खड़े रहना। (३) छिपकर आहट लेने के लिए द्वार पर खड़े होना।
द्वारे लागे— आशा से द्वार पर खड़े रहे। उ.— यह जान्यौ जिय राधिका द्वारे हरि लागे। गर्व कियो जिय प्रेम को ऐसे अनुरागे।
द्वार लगाना— द्वार बंद करना।
आँख, कान आदि इंद्रियों के छेद।
एक पुरानी नगरी जो काठि-यावाड़, गुजरात में है और सात पुरियों में मानी गयी है। जरासंध के उपद्रवों से तंग आकर श्रीकृष्ण यहीं जाकर बसे थे।
विष्णु का एक मंत्र- ओं नमो भगवते वासुदेवाय।
किसी पक्ष की बारहवीं तिथि।
द्वारकाधीश, द्वारकानाथ, द्वारकेश
द्वारकाधीश, द्वारकानाथ, द्वारकेश
श्रीकृष्ण की मूर्ति जो द्वारका में हैं।
विवाह की एक रीति जो लड़कीवाले के यहाँ बारात पहुँचने पर की जाती है।
विवाह की एक रीति जिसमें वधू को साथ लेकर आते हुए वर का द्वार उसकी बहन रोकती है और कुछ नेग पाकर हट जाती है।
वह नेग जो इस रीति में बहन को दिया जाता है।
ड्योढ़ीदार, दरबान, प्रतिहार।
विवाह की एक रीति जिसमें कन्या पक्षवाले कलश आदि का पूजन करके वर का स्वागत करते हैं।
उ.—धेनु-रूप धरि पुहुमि पुकारी, सिव बिरंचि के द्वारा—१०-४।
गृह-द्वारा-घर-द्वार, घर-गृहस्थी।
उ.—गृह-द्वारा कहुँ है की नाहीं पिता-मातु-पति-बंधु न भाई—१०८६।
द्वारका जो काठियावाड़ गुजरात में स्थित है और जिसकी गणना चार धामों और सात पुरियों में है।
उ.—याकौं ह्याँ तैं देहु निकारि। बहुरि न आवै मेरे द्वारि —१-२८४।
काठियावाड़, गुजरात की एक प्राचीन नगरी जिसे श्रीकृष्ण ने, जरासंध के आक्रमणों से मथुरावासियों को बचाने के उद्देश्य से, अपनी राजधानीबनाया था।
द्वारकानाथ, श्रीकृष्णचन्द्र।
उ.— बन चलि भजौ द्वारिकाराय—१-२८४।
उ.— हा जदुनाथ द्वारिका बासी जुग जुग भक्त आपदा फेरी—१-२५१।
उ.—छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरयौ —१०-८।
उ.—सूरदास -प्रभु भक्त-बछल हरि, बलि-द्वारैं दरबान भयौ —१-२६।
उ.— ताहि अपनी करी चले आगे हरी गये जहाँ कुबलिया मल्ल द्वारयौ —२५८८।
(क्रिया) जिसके दो कर्म हों।
छंदशास्त्र में दो मात्राओं का समूह।
वह प्राणी जिसका जन्म दो बार हुआ हो।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जिनको यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार है।
उ.— रोर कै जोर तैं सोर घरनी कियौ चल्यौ द्विज द्वारिका-द्वार ठाढ़ौ—१-५।
उ.— (क) रखना द्विज दलि दुखित होत बहु तउ रिस कहा करै। छमि सब छोभ जु छाँड़ि, छवौ रस लै समीप सँचरै—१-११७। (ख) सुभग चिबुक द्विज-अधर नासिका—१०-१०४।
उ.— निकट बिटप मानौ द्विज-कुल कूजत बय बल बढ़ौ अनंग—१०६४।
चाँदी का पत्तर जिस पर लक्ष्मीनारायण का युगल चित्र खुदा रहता है और जो मृतक स्त्रियों के दशाह में ब्राह्मण को दान में दिया जाता है।
संस्कार या कर्महीन द्विज।
संस्कार या कर्महीन द्विज।
ब्राह्मण-वेशधारी निम्न वर्ग का मनुष्य।
दागने का काम करने की दूसरे को प्रेरणा देना।
जिसने किसी के शव का दाह-कर्म किया हो।
उ.—(क) सोवत कहा, चेत रे रावन, अब क्यौं खात दगा—६—११४। (ख) दै दै दगा, बुलाइ भवन मैं भुज भरि भेंटति उरज-कठोरी—१०-३०५। (ग) सूरदास याही ते जड़ भए इन पलकन ही दगा दई—२५३७। (घ) सुफलक-सुत लै गए दगा दै प्रानन ही के प्रीते—२८६३। (च) आई उघरि कनक कलई सी दै निज गए दगाई—२७१८।
छली, कपटी, धोखा देने वाला।
उ.—दगाबाज कुतवाल काम रिपु, सरबस लूटि लय़ौ—१-६४।
छली मनुष्य, धोखा देनेवाला मनुष्य।
(सं. द्विज + इन्द्र, + ईश)
(सं. द्विज + इन्द्र, + ईश)
(सं. द्विज + इन्द्र, + ईश)
द्विओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण।
उ.—प्रथम ज्ञान, बिज्ञानक द्वितिय मत, तृतीय भक्ति कौ भाव—२-३८।
उ.— (क) तब सिव-उमा गए ता ठौर, जहाँ नहीं द्वितिया कोउ और—१-२२६। (ख) कोउ कहै हरि-इच्छा दुख होइ। द्वितिया दुखदायक नहिं कोई—१-२९०।
जिसमें दो पंखुड़ियाँ हों।
वह अन्न जिसमें दो दल हों।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जिन्हें यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार है।
इधर की उधर लगानेवाला, चुगलखोर।
(सं. द्विज + इन्द्र, + ईश)
(दो माताओं से उत्पन्न) जरासंध।
(दो माताओं के गर्भ-से उत्पन्न होनेवाला) जरासंध।
उ.— द्विप दंत कर कलित, भेष नटवर ललित मल्ल उर सल्ल तल ताल बाजैं —३०७७।
स्थान जहाँ दो पक्ष मिलते हों।
जिसमें दो पद या शब्द हों।
मुहा.- कौन द्विशिर है— किसके दो सिर हैं ? किसको मरने का डर नहीं है ?
शत्रु, वैरी, विरोधी, द्वेषी।
वधू का पति के घर दूसरी बार आना, गौना, दोंगा।
दो बार या दूसरी बार कहा हुआ।
स्त्री जिसका एक बार एक पति से और दूसरी बार दूसरे से विवाह हो।
एक बंदर जो रामचंद्र की सेना का सेनापति था।
उ.— नल-नील-द्विविद, केसरि, गवच्छ। कपि कहे कछुक, हैं बहुत लच्छ—९१६६।
एक बंदर जो नरकासुर का मित्र था और बलदेव जी द्वारा मारा गया था।
उ.— रामदल मारि सो वृक्ष चुरकुट कियौ द्विविद सिर फट गयौ लगत ताके —१०३-४५।
उ.—द्विरद को दंत उपटाय तुम लेते हे वहै बल आजु काहे न सँभारौ।—२६०२।
थल का वह भाग जो चारों तरफ जल से घिरा हो।
पुराणानुसार पृथ्वी के सात बड़े विभाग।
उ.— सातौ द्वीप राज ध्रुव कियौ। सीतल भयौ मातु कौ हियौ —४-९।
जो दो स्वामियों या देवताओं के लिए हो।
उ.—साप दग्ध ह्यौ सुत कुबेर के आनि भए तरु जुगल सुहाये—३५६।
झ, भ, र, ष और ह जिनसे छंद का आरंभ नहीं होना चाहिए।
उ.—मिटि गए राग-द्वेष सब तिनके जिन हरि प्रीति लगाई—१-३१८।
द्वेष या वैरभाव रखने या करनेवला।
उ.—सलिल लौं सब रंग तजि कै, एक रंग मिलाइ। सूर जो द्वै रंग त्यागै, यहै भक्त सुभाइ—१-७०।
उ.— सूरदास -सरवरि को करिहै, प्रभु पारथ द्वौ नाहीं —१-२६९।
दो-एक, एक-आध, बहुत कम (संख्यावाचक)।
उ.—(क) जसुमति मन अभिलाष करै। कब मेरौ लाल घुटुरूवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै—१०-७६। (ख) पुनि क्रम-क्रम भुज टेकि कै, पग द्वैक चलावै—१०-११२। (ग) कबहुँ कान्ह कर छाँड़ि नंद, पग द्वैक रिंगावत—१०-१२२। (घ) यह कहियौ मेरी कही, कमल पठाए कोटि। कोटि द्वैक जलहीं धरे, यह बिनती इक छोरि—१०-५८९। (ङ) द्वैक पग धारि हरि-सँमुख आयौ—३०७६।
(सं. द्वितीय, प्रा. दुइय)
उ.— (क) सीपज-माल स्याम उर सौहै, बिच बघ-नहँ छबि पावै री। मनौ द्वौज ससि नखत सहित है, उपमा कहत न आवै री—१०-१३९। (ख) गनहु द्वैज दिन सोधि कै हरि होरी—२४५५।
एक वन जिसमें युधिष्ठिर कुछ समय तर रहे थे।
एक दार्शनिक सिद्धांत जिसमें आत्मा-परमात्मा या जीव ईश्वर को भिन्न माना जाता है।
एक दर्शनिक सिद्धांत जिसमें शरीर और आत्मा को भिन्न माना जाता है।
देवनागरी वर्णमाला का उन्नीसवाँ व्यंजन और तवर्ग का चौथा वर्ण जो दंतमूल से उच्चरित होता है।
काम-धंधे का झगड़ा, बखेड़ा या जंजाल।
जो हर समय काम के झगड़े में पृड़ा रहे।
उ.— ए षटपद वै द्वैपद चतुर्भुज काइ भाँति भेद नहिं भ्रातनि—३१७३।
वेदव्यास का नाम क्योंकि इनका जन्म जमुना नदी के एक द्वीप में हुआ था।
वह तालाब जिसमें यद्ध से भागकर दुर्योधन छिपा था।
उ.— कहियहु बेगि पठवहिं गृह गाइनि को द्वैहै—२७०६।
कार-बार, व्यवसाय, रोजगार।
गोरखपंथी साधुओं के पास रहनेवाला ‘गोरखधंधा’।
धँसने की क्रिया, ढंग या गति।
मुहा.- जी (मन) में धँसना— (१) मन पर प्रभाव डालना। (२) बराबर ध्यान पर चढ़ा रहना।
जगह बनाकर बढ़ना या पैठना।
धीरे-धीरे नीचे जाना या उतरना।
नीचे की ओर दब या बैठ जाना।
गड़ी चीज का खड़ी न रह कर बैठ या दब जाना।
घुसने-पैठने की क्रिया, रीति या चाल।
धँसा लिया, डुबा लिया, बूड़ गए।
उ.—हम सँग खेलत स्याम जाइ जल माँझ धैसायौ—५८६।
उ.—जो न सूर कान्ह आइहैं तौ जाइ जमुन धँसि लैहौं—२५५०।
मुहा.- मन महं धँसी— हृदय में अंकित हो गयी, चित्त से न हट सकी। उ.— मन महं धँसी मनोहर मूरति टरति नहीं वह टारे।
उ.—पति पहिचानि धँसी मंदिर मैं सूर तिया अभिराम।आवहु कंत लखहु हरि को हित पाँव धारिए धाम।
उ.— गयौ कूदि हनुमंत जब सिंधु-पारा। सेष के सीस लागे कमठ पीठि सौं, धँसे गिरिवर सबै तासु भारा—९-७६।
दिल धड़कने का शब्द या भाव।
मुहा.- जी धक-धक करना— भय आदि से जी धड़कना।
जी धक हो जाना— (१) डर से दहल जाना। (२) चौंक पड़ना।
जी धक (से) होना— (१) घबराहट होना। (२) भय होना।
भय या घबराहट से (हृदय) धड़कता है।
उ.— (क) टटके चिन्ह पाछिले न्यारे धकधकात उर डोलत है—२११०। (ख) धकधकात उर नयन स्त्रवत जल सुत अँग परसन लागे—२४७३। (ग) सकसकात तन धकधकात उर अक-बकात सब ठाढ़े—२९६९। (घ) धकधकात जिय बहुत सँभारै।
भय, घबराहट आदि से (हृदय का) जोर जोर धड़कना।
हृदय के धड़कने की क्रिया या भाव, धड़कन।
हृदय के धड़कने की क्रिया या भाव, धड़कन।
उ.— (क) आये हौ सुरति किए ठाठ करख लिए सकसकी धकधकी हिये—२६०९। (ख) आवत देख्यौ बिप्र जोरि कर रूक्मिनि धाई। कहा कहैगौ आनि हिए धकधकी लगाई—१०उ. ८।
गले और छाती के बीच का गढ़ा जिसमें धड़क मालूम होती है, धुकधकी।
मुहा.- धकधकी धड़कना— जी धकधक करना, खटका या आशंका होना।
डरते हुए या धड़कते जी से।
उ.— तुम तो लीला करत सुरन मन परो धकारो।
जिसे कष्ट या दुख पहुँचा हो, पीड़ित।
धड़कते हुए जी से, भयभीत होकर।
उपपति से प्रेम करनेवाली, व्यभिचारिणी।
उ.—जब राजा तेहि मारन लाग्यौ। देवी काली मन धगधाग्यौ।
धाँगर स्त्री जो बच्चों के जन्मने पर उनकी नाल काटती है।
पति की दुलारी या मुँह-लगी।
उ.— सूरदास कंचन अरू काँचहिं, एकहिं धगा पिरोयौ—१-४३।
(सं. ध्वज = चिन्ह, पताका)
(सं. ध्वज = चिन्ह, पताका)
(सं. ध्वज = चिन्ह, पताका)
(सं. ध्वज = चिन्ह, पताका)
(सं. ध्वज = चिन्ह, पताका)
(सं. ध्वज = चिन्ह, पताका)
[हिं. धज + ईला (प्रत्य.)]
धज्जीधारी, जो फटे कपड़े पहने हो।
भय, आशंका आदि से जी का धकधक करना।
लोहे-लकड़ी की कटी-फटी लंबी पट्टियाँ।
मुहा.- धज्जियाँ उड़ना— (१) टुकड़े-टुकड़े या खील-खील होना। (२) (किसी के) दोषों का खूब भंडाफोड़ होना या दुर्गति होना।
धज्जियाँ उड़ाना— (१) टुकड़े-टुकड़े या खील-खील करना। (२) (किसी के) दोषों का खूब भडाफोड़ करना या दुर्गति करना। (३) मार-मार या काट-काट कर टुकड़े करना।
धज्जियाँ लगना— कपड़ों का कटा-फटा होना, गरीबी आना।
धज्जियाँ लगाना— फटे पुराने कपड़े पहनना।
कपड़े कागज या लोहे-लकड़ी की कटी-फटी पट्टी।
बेधड़क—बिना किसी खटके या संकोच के
छाती का धकधक करना या काँपना।
मुहा.- छाती (जी, दिल) धड़कना— भय, खटके या आशंका से जी का दहलना या काँपना।
भारी चीज के गिरने का शब्द होना।
खेत का धोखा या नकली पुतला।
मुहा.- धडल्ले से— निडर, बेधड़क। (१) भीड़भाड़, धूमधाम। (२) बड़ी भीड़।
मुहा.- धड़ा करना (बाँधना)— तौलने के पहले तराजू के दोनों पलड़ों को तौल में बराबर कर लेना।
धड़ा बाँधना— कलंक या दोष लगाना।
मुहा.- धड़ाक (धड़ाके) से चटपट, बेखटके।
लगातार, जल्दी जल्दी, ताबड़तोड़।
दोनों पक्षों का अपने को समान सबल बनाना।
मुहा.- धड़ी भर (धड़ियों)— बहुत सा, ढेर का ढेर।
धड़ी भरना— तोलना।
धड़ी-धड़ी करके लुटना— सब कुछ लुट जाना।
धड़ी धड़ी करके लूटना— सब कुछ लूट लेना।
तिरस्कार या अपमान के साथ हटाना।
मुहा.- धता बताना— (१) चलता करना, हटाना। (२) धोखा देकर टाल देना, टालटूल करना।
उ.— (क) भई देह जो खेह करम-बस, जनु तट गंगा अनल दढ़ी। सूरदास प्रभु द्दष्टि सुधानिधि मानौ फेरि बनाइ गढ़ी—६-१७०। (ख) तन मन धन यौवन सुख संपति बिरहि-अनल दढ़ी—२७६४।
[हिं. दाँत+अवन (प्रत्य.)]
उ.—दतवनि लै दुहुँ करौ मुखारी, नैननि कौ आलस जु बिसारौ—४०७।
धूतू या नरसिंहा नामक बाजा, तुरही।
उ.—दसएँ मास मोहन भए मेरे आँगन बाजै धतूर।
(सं. धुस्तूर, हिं. धतूरा)
एक पौधा जिसके फल शिवजी पर चढ़ाये जाते हैं।
मुहा.- धतूरा खाये फिरना— पागल की तरह घूमना। उ.— सूरदास प्रभु दरसन कारन मानहुँ फिरत धतूरा खाये— ३३०३।
आग का दहकना या लपट के साथ जलना।
धन जीतने या प्राप्त करनेवाला।
शरीर की पाँच दायुश्रों में एक।
मुहा.- धन उड़ाना— धन को चटपट खर्च कर डालना।
अत्यंत प्रिय पात्र, जीवन-सर्वस्व।
उ.—सिव कौ धन, संतनि कौ सरबस महिमा वेद-पुरान बखानत—१-११४।
उ.— (क) गायौ गौध, अजामिल गनिका, गायौ पारथ-धन रे—१-६६। (ख) सूरदास सोभा क्यौं पावै पिय विहीन धन मटके—१-२९२। (ग) एकटक सिव धरे नैनन लागत स्याम सुता-सुत-धन आई—सा.-उ. ३०।
धान कूटने की ओखली या मूसल।
मुहा.- धनकुट्टी करना— बहुत मारना-पीटना।
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी जब रात में लक्ष्मी जी की पूजा होती है।
देवताओं के वैद्य जो समुद्र से निकले चौदह रत्नों में माने जाते हैं।
उ.—धनहर-हित-रिपु सुत-सुख पूरत नैनन मद्व लगावै—सा. ८९।
उ.—रामदूत दीपत नछत्र में पुरी धनद रूचि रूचि तम हारी—सा. ९८।
ब्रज के अंतर्गत एक तीर्थ।
आश्विन कृष्ण एकादशी का नाम।
उ.— सुमना-सुत लै कमलसुमंजित धनपति धाम को नाम खँवारे—सा. उ. १०।
उ.— धन-मद मूढ़नि अभिमानिनि मिलि लोभ लिए दुर्बचन सहै—१-५३।
उ.—आपुन रंक भई हरि-धन को हमहिं कहति धनवंत—१३२४।
उ.— सूर-स्याम देखि सबै भूलीं गोप-धनियाँ—१०-२३८।
एक छोटा पौधा जिसके छोटे छोटे फल सुखाकर मसाले के काम में आते हैं।
उ.— कहा कमी जाके राम धनी—१-३९।
एक रागिनी जिसका प्रयोग वीर रस में विशेष होता है और जो दिन के दूसरे या तीसरे पहर में गायी जाती है।
उ.— सूरदास सोभा क्यौं पावै, पिय-बिहीन धनि मटकै—१-२९२।
पुण्यवान, सुकृती, प्रशंसनीय, कृतार्थ।
उ.— (क) धनि मम गृह, धनि भाग हमारे, जौ तुम चरन कृपानिधि धारे—१-३४३। (ख) सूरदास धनि-धनि वह प्रानी जो रहि को व्रत लै निबट्यौ—२-८। (ग) गरूड़ त्रास तैं जौ हथाँ आयौ।¨¨¨¨। धनि रि, साप दियौ खगपति कौं हथाँ तब रह्यौ छपाई—५७३।
उ.—(क) निरखि निरखि मुख कहति लाल सौं मो निधनी के धनियाँ—१०-८१। (ख) नैंकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ—१०-१४५।
उ.— मिस्त्री, दधि, माखन मिस्त्रित करि, मुख नावत छबिधनियाँ—१०-१४५।
उ.— (क) करतल-सोभित बान धनुहियाँ—९-१९। (ख) जैसे बधिक गँवहिते खेलत अंत धनुहिया तानै—३३६६।
उ.— धनुहीं-बान लए कर डोलत—९-२०।
एक प्रजापति जिनसे देवता उत्पन्न हुए थे।
सती जो शिव जी को ब्याही थी।
सती जो शिव जी को ब्याही थी।
उ.—(क) लेहु मातु, साहिदानि मुद्रिका, दई प्रीति करि नाथ। सावधान हे सोक निवारहु. ऒड़हु दच्छिन हाथ—६—५३। (ख) बाम भुजहिं सखा अँस दीन्हे दच्छिन कर द्रुम-दरियाँ—४७०।
उ.—दच्छिन राज करन सो पठाये—६-२।
छह महीने का वह समय जिसमें सूर्य कर्क रेखा से चलकर बराबर दक्षिण की ओर बढ़ता रहता है।
उ.—खेलत रह्यो घोष कैं बाहर, कोउ आयौ सिसु-रूप रच्यौ री। गगन उड़ाइ गयौ लै स्यामहिं, आनि धरनि पर आप दच्यौ री—६०६।
एक प्रजापति जिनसे देवताओं की उत्पत्ति हुई थी। सती इन्हीं की पुत्री थीं। इनको शिवजी के गणों ने मारा था।
उ.—दछ सिर काटि कुंड मैं डारि—४-५।
उ.—बहुरि जब रिषिनि भुज दछिन कीन्ही मथन, लच्छमी सहित पृथु दरस दीन्हौ—४-११।
उ.—(क) देखहु हरि जैसे पति आगम सजति सिंगार धनी—२४६१। (ख) बहुरीं सब अति आनंद, निज गृह गोप-धनी—१०-२४।
उ.— मनु मदन धनु-सर सँधाने देखि धनृकोदंड—१-३०७।
एक नाप जो चार हाथ की होती है।
एक यज्ञ जिसमें धनुष की पूजा और धनुर्विद्या की परीक्षा होती है।
एक शास्त्र जिसमें धनुष चलाने की विद्या का वर्णन है।
‘टन’ का शब्द जो धनुष की डोरी को खींचकर छोड़ देने से होता है।
वह स्थान जहाँ परीक्षा या यज्ञ का धनुष रखा हो।
उ.— धनुषशाला चले नंदलाला—२५८४।
भारी और मुलायम चीज के गिरने का शब्द।
उ.— सीला नाम ग्वालिनी तेहि गहे कृष्न धपि धाइ हो—२४४९।
पुण्यवान्, प्रशंसा करने या साधुवाद देने के योग्य।
उ.— (क) धन्य भाग्य, तुम दरसन पाए—१-३४१। (ख) धन्य-धनि कह्यौ पुनि लक्ष्छमी सौ सबनि—८-८।
उपकार के प्रत्युत्तर में कहा जानेवाला कृतज्ञता-सूचक शब्द।
बड़ाई या प्रशंसा के योग्य।
देव-वैद्य जो चौदह रत्नों के साथ समुद्र से निकले थे।
उ.— बहुरि धन्वंत्रि आयौ समुद्र सौं निकसि सुरा अरू अमृत निज संग लायौ—८-८।
धनुष की तरह गोलाई के साथ झुका हुआ।
भारी चीज के चलने-लुढ़कने से होनेवाला शब्द।
भारी शब्द का हृदय पर आघात, दहल।
मुहा.- आ धमकना— जोर-शोर से आना।
जा धमकना— जोर-शोर से जा पहुँचना।
रह रह कर दर्द करना, व्यथित होना।
उ.— धमकि मार्यौ घाउ गमकि हृदय रह्यौ झमकि गहि केस लै चले ऐसे —२६२१।
भारी और मुलायम चीज के गिरने का शब्द।
मोटे-फफ्फस आदमी के पैर रखने का शब्द।
मुहा.- नाम में धब्बा लगना— कलंक लगना।
नाम में धब्बा लगाना— कलंक या दोष लगाना।
मुहा.- धमकी में आना— डरकर कोई काम करना।
होली में गाने का एक तरह का गीत।
उ.— (क) एक गावत है धमारि एक एकनि देति गारि गारी—२४२९। (ख) जुगल किसोर चरन रज माँगौं गाऊँ सास धमार—२४४७।
धारण करने या सँभालनेवाला।
उ.— (क) रवि दो धर रिपु प्रथम बिकासो।¨¨¨। पतनी लै सारँगधर सजनी सारँगधर मन खैंचो— सा. ४८। (ख) गिरिधर, बजधर, मुरलीधर, धरनीधर, माधौ पीताम्बरधर—५७२।
दतुअन, दतुवन, दतुवनि, दतौन, दतौनी
[हिं. दाँत+अवन (प्रत्य.)]
उ.— (क) प्रातहिं तैं मैं दियौ जगाइ। दतुवनि करि जु गए दोउ भाइ—५४७। (ख) माता दुहुँनि दतौनी कर दै, जलझारी भरि ल्याइ—६०६।
उ.—(क) ताकैं भयौ दत्त अवतार—४-२। (ख) भृगु कै दुर्बासा तुम होहु। कपिल कै दत्त, कहौ तुम मोहु—५-४।
एक प्रसिध्द ऋषि जो विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक माने जाते हैं। इन्होंने चौबीस पदाथों को गुरु माना था।
तोप-बन्दूक या पटाखे का शब्द।
उ.—(क) सूर तुरत मधुबन पग धारे धरणी के हितकारि —२५३३। (ख) धरणि उमंगि न माति धर मैं यती योग बिसारि—पृ. ३४७ (५४)।
कच्छप जो धरा को धारण किये है।
उ.— (क) राहु सिर, केतु धर कौ भयौ तबहिं तैं, सूर-ससि कौं सदा दःखदाई—८-८। (ख) राहु-सिर, केतु धर भयौ यह तबहिं सूर-ससि दियौ ताकौं बताई—८-९।
धर-पकड़— बंदी बनाने की क्रिया, गिरफ्तारी।
उ.— (क) माधौ जू, यह मेरी इक गाइ।¨¨¨। ब्योम, धर, नद, सैल, कानन इते चरि न अघाइ—१-५५। (ख) धर बिधंसि नल करत किरषि हल बारि बीज बिथरै—१-११७। (ग) उबर् यौ स्याम महरि बढ़-भागी। बहुत दूरि तै आइ पर् यौ धर धौं कहुँ चोट न लागी—१०-७९। (घ) लोटत धर पर ग्यान गर्ब गयौ—३४०९।
उ.—सुचही-पति पितु प्रिया पाइ पर धर सिर आप मनावो—सा. ९।
मुहा.- धर दबाना (दबोचना)— बलपूर्वक पकड़ कर अपने अधिकार में कर लेना। (२) तर्क या विवाद में हराना।
धर-पकड़ करे— जबरदस्ती।
मुहा.- नहिं चित्त धइई— ध्यान नहीं रखता है। उ.— बीज बोइये जोइ अंत लोनिये सोइ समुजि यह बात नहिं चित्त धरई— १०।
गर्वै जिय धरई- मन में बहुत अभिमान रखता है। उ.— गगन सिखर उतर चढै गर्वे जिय धरई— २८६८।
छतियाँ धरकि रही—आवेग आदि के कारण छाती धड़क रही है।
उ.— सेज रचि पचि साज्यौ सघन कुंज निकुंज चित चरनन लाग्यौ छतियाँ धरकि रही— २२३६।
उ. — कछु रिस कछु नागर जिय धरकी—पृ. ३१७ (६८)।
भय से धड़कने या स्पंदन करने लगे।
उ.—सूरदास प्रभ आइ गोकुल प्रगट भए, संतनि हरष, दुष्ट-जन-मन धरके—२०-३०।
उ.—माखन खान जात पर घर कौ। बाँधत तोहिं नैंकु नहिं धरकौ—९३१।
रखने, थामने, धारण करने आदि की क्रिया।
आरोपित करती हैं, अंगीकार करती हैं।
धारण करती है , स्थापित करती हैं।
उ.—मन ही मन अभिलाष करतिं सब हृदय धरतिं यह ध्यान—१०-२८२।
धरति न धीर—धीरज नहीं रखती, धैर्य न रख सकी।
उ.—पुत्र-कबंध अंक भरि लीन्हौ, धरति न इक छिन धीर—१-२९।
स्थित या स्थापित करती है।
उ.— कमल पर बजू धरति उर लाइ—२५५५।
पकड़ने का प्रयत्न करती हुई।
उ.—रोस कै कर दाँवरी लै फिरति घर घर धरति—२६६९।
स्थावर संपत्ति, गाँव-गिराँव, धाम।
उ.—जौबन-रूप-राज-धन-धरती जानि जलद की छाहीं—२-२३।
उ.—अबिहित बाद-बिबाद सकल मत इन लगि भेष धरत—१-५५।
उ.—बान भीर सुजान निकसत धरत धरनी पाइ—सा. १८।
कर्ता-धरता— सब कुछ करने धरनेवाला।
आरोपित करते, अवलंबन करते, अंगीकार करते।
उ.— सूर-स्याम तौ घोष कहातौ जो तुम इती निठुराई धरते—२७३८।
उ.—जौ प्रभु नर-देही नहीं धरते। देवै गर्भ नहीं अवतरते—११८६।
मुहा.- पग धरतौ— चलता, आगे बढ़ता। उ.— मुख मृदु-बचन जानि मति जानहु, सुद्व पंथ पग धरतौ— १-२०३।
पकड़ता, हथियाता, ग्रहण करता।
उ.—जौ तू राम-नाम-धन धरतौ। अबकौ जन्म, आगिलौ तेरौ, दोऊ जन्म सुधरतौ—१-२९७।
उ.—बाजत सब्द नीर को धरधर—१०५७।
उ.— पग न इत उत धरन पावत, उरझि मोह-सिवार—१-९९।
देह धरन—अवतार धारण करने की क्रिया या भाव, अवतार धारण करनेवाला।
उ.—भक्त हते देह धरन पुहुमी कौ भार हरन जनम-जनम मुक्तावन—१०-१५१।
धारण करने या उठानेवाला उसकी क्रिया या भाव।
उ.—(क) बूड़तहिं ब्रज राखि लीन्हौं, नरहिं गिरिवर धरन—१-२०२। (ख) परसि गंगा भई पावन, तिहूँ पुर धर-धरन—।¨¨¨जासु महिमा प्रगट केवट, धोइ पग सिर धरन—१-३०८।
रखने या स्थित करने की क्रिया या भाव।
उ.—मुरली अधर धरन सीखत हैं बनमाला पीताम्बर काछे—५०७।
लकड़ी-लोहे की कड़ी, धरनी।
गर्भाशय को जकड़नेवाली नस।
पकड़ना, थामना, ग्रहण करना।
रखना, स्थित या स्थापित करना।
आरोपित करना, अवलंबन करना।
आश्रय ग्रहण करना, सहायता के लिए घेरना।
किसी स्त्री को रखेली की तरह रखना।
कोई बात पूरी कराने के लिए अड़कर या हठ करके बैठना।
उ.—(क) धरनि पत्ता गिरि परे तैं फिर न लागै डार—१-८८। (ख) कागद धरनि, करै द्रुम लेखनि जल-सायर मसि घोरै—१-१२५। (ग) चलत पद-प्रतिबिंब मनि आँगन घुटरूवनि करनि। जलज-संपुट सुभग छबि भरि लेति उर जनु धरनि—१०-१०९।
उ.— (क) एक अधार साधु संगति कौ रचि-पचि मति सँचरी। याहू सौंज संचि नहिं राखी अपनी धरनि धरी—१-१३०। (ख) सूर जबहिं आवतिं हम तेरैं तब तब ऐसी धरनि धरी री—। (ग) ज्यों चातक स्वातिहिं रट लावै तैसिय धरनि धरी-पृ.। (घ) ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि धरी —।
उ.— आँखिनि अंध, स्त्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन समेत— १-२९६।
उ.— मेरे साँवरे जब मुरली अधर धरी।¨¨। चर थाके, अचल टरे—६२३।
उ.— सूर गारूड़ी गुन करि थके, मंत्र न लागत थर तैं—७४४।
उ.—धरनि जीव जल-थल के मोहे नभ-मंडल सुर थाके—१७५५।
थक जाय, क्लांत या श्रांत हो जाय।
उ. — अचला चलै, चलत पुनि थाकै, चिरंजीवि सो मरई—६-७८।
उ.— हा करूनामय कुंजर टेग्यौ, रह्यौ नहीं बल, थाकौ—१-११३।
उ. —थाके हस्त, चरनगति थाकी, अरू थाक्यौ पुरूषारथ—१-२८७।
उ. —रथ थाक्यो मानो मृग मोहे नाहिंन कहूँ चंद को टरिबो—२८६०।
उ. —सुंदर बदन री सुख सदन स्याम को निरखि नैन मन थाक्यौ—२५४६।
उ.—देखत यह बिनोद धरनीधर, मात पिता बलभद्र ददा रे—१०-१६०।
ददिऔर, ददिऔरा, ददियाल, ददिहाल
ददिऔर, ददिऔरा, ददियाल, ददिहाल
अपराधी या शत्रु वर्ग के व्यक्ति को पकड़ने की क्रिया या भाव।
उ.— (क) जीव, जल-थल जिते, वेष धरि धरि तिते अटत दुरगम अगम अचल भारे। मुसल मुदगर हनत, त्रिविध करमनि गनत, मोहि दंडत धरम-दूत हारे—१-१२०। (ख) आज रन कोपो भीम कुमार। कहत सबै समुझाय सुनो सुत-धरम आदि चित धार— सा. ७४।
धर्मात्मा, धर्म की गति समझनेवाला।
उ.—रही न पैज प्रबल पारथ की, जब तैं धरमसुत धरनी हारी—१-२४८।
[हिं. धर्म + आई (प्रत्य.)]
धर्माचरण करनेवाला, धर्मात्मा।
किसी धर्म में विश्वास रखनेवाला।
उ.—रूद्रपति, छुद्रपति, लोकपति, वोकपति धरनिपति गगनपति, अगमबानी—१५२२।
उ.—बान भरि सुजान निकसत धरत धरनी पाइ— सा. ३८।
उ.— मेरी कैंती बिनती करनी। पहिलैं करि प्रनाम पाइनि परि, मनि रघुनाथ हाथ धरनी—९-१०१।
उ.—गिरिधर, बज्रधर, मुरलीधर, धरनीधर, माधौ, पीतांबरधर—५७२।
[हिं. धरना + एत, ऐत (प्रत्य.)]
धराया, रखाया, अंगीकार कराया, अवलंबन दिया—।
उ.— माता कौं परमोधि, दुहुँनि धीरज धरवायौ—५८९।
[हिं. धरना + हर (प्रत्य.)=धरहर]
[हिं. धरना + हर (प्रत्य.)=धरहर]
बीच-बचाव, लड़ने-वालों को रोकने का काम।
[हिं. धरना + हर (प्रत्य.)=धरहर]
उ.— (क) भीषम, द्रोन, करन, अस्थामा, सकुनि सहित काहू न सरी। महापुरूष सब बैठे देखत, केस गहत धरहरि न करी—१-२४९। (ख) कहा भीम के गदा धरैं कर, कहा धनुष धरैं पारथ। काहु न धरहरि करी हमारी, कोउ न आयौ स्वारथ—१-२५९। (ग) जब जमजाल पसार परैगौ हरि बिनु कौन करैगौ धरहरि —१-३१२।
उ.—उर ते सखी दूरि करू हारहिं कंकन धरहु उतारि—२६८२।
उ.— काँपन लागी धरा, पाप तैं ताढ़ित लखि जदुराई—१-२०७।
उ.—रंक चलै सिर छत्र धराइ—१-१।
उ.— मेरे कहैं बिप्रनि बुलाइ, एक सुभ घरी धराइ, बागे चीरे बनाइ, भूषन पहिरावौ—१०-९५।
उ.— सुरपति पूजा मेटि धराई—१०१७।
स्थित करानेवाला, रखानेवाला, देनेवाला।
उ.—भागि चलौ, कहि गयौ उहाँ तैं काटि खाइ रे हाऊ। हौं डरपौं, काँपौं अरू रोवौं, कोउ नहिं धीर धराऊ—४८१।
(हिं. धरना + आऊ (प्रत्य.)]
मामूली से बहुत अच्छा, बहुमूल्य।
उ.— मेरी देह छुटत जम पठए, जितक दूत घर मौं। लै लै ते हथियार आपने, सान धराए त्यौं —१-१५१।
शेषनाग जो पृथ्वी को धारण करता है।
उ.—उछरत सिंधु, धराधर काँपत, कमठ पीठ अकुलाइ—१०-६४।
उ.—मंगल कलश धराये द्वारे बंदनबार बँधाई—सारा.—२९९।
धराया, रखाया, निर्धारित कराया।
उ.—(क) बहुरौ एक पुत्र तिन जायौ। नाम पुररुवा ताहि धरायौ—९-२। (ख) पहिलो पुत्र पुक्मिनी जायौ, प्रद्युम्न धरायौ-सारा. ६८९।
उ.—गरुड़-त्रास तैं जौ ह्याँ आयौ। तौ प्रभु-चरन-कमल फन-फन प्रति अपनैं सीस धरायौ—५७३।
रखाते है, निर्धारित कराते है।
उ.—जो परि कृष्ण कूबरिहिं रीझे तो सोइ किन नाम धरावत—२२९३।
धराने या रखाने की क्रिया या भाव।
देह धरावन— अवतार लेनेवाले।
उ.—दीन-बन्धु असरन के सरन, सुखनि जसुमति के कारन देह धरावन—१०-२५१।
विष्णु या उनके श्रीकृष्ण आदि अवतार।
उ.—सूर स्याम गिरिधर धराधर हलधर यह छवि सदा थिर रहौ मेरैं जियतौ—३७३।
(सं. धरा (=पृथ्वी) + धरन (=धारण करनेवाला, शेषनाग) + धर (शेषनाग को धारण करनेवाला, शिवजी) + रिपु (शिवजी का शत्रु काम )
उ.—धराधरनधर-रिपु तन लीनो कहो उदधि-सुत बात—सा. ८।
जमीन पर गिरा या पड़ा हुआ।
उ.—यह लालसा अधिक मेरै जिय जो जगदीस कराहिं। मो देखत कान्हर इहिं आँगन, पग द्वै धरनि धराहिं—१०-७५।
आरोपित करें, अवलंबन करें।
उ.—अबला सार ज्ञान कहा जानै कैसैं ध्यान धराहीं—३३१२।
धारण करके, (रुप) धर कर, रख कर।
उ.—(क) भक्तबछल बपु धरि नरकेहरि, दनुज दह्यौ, उर दरि, सुर- साँईं—१-६। (ख) रहि न सके नरसिंह रुप धरि, गहि कर असुर पछारयौ—१-१०९।
उ.— भऐं अस्पर्स देव-तन धरिहै—८-२।
धरोगे, स्थापित करोगे, रखोगे।
उ.— या बिधि जौ हरि-पद उर धरिहौ। निस्संदेह सूर तौ तरिहौ—१-३४२।
उ.— (क) ऐसी को करी अरू भक्त काजैं। जैसी जगदीस जिय धरी लाजैं—१-५। (ख) सदा सहाइ करी दासनि की जो उर धरी सोइ प्रति-पारी—१-१६०।
उ.— मनसा-बाचा कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी—१-११५।
उ.— तब रिषि कृपा ताहि पर धरी—९-३।
आनि धरी—पकड़ लाया, आकर पकड़ा।
उ.—सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी—१-१६।
मौन धरी—चुप्पी साधी, विरोध नहीं किया।
उ.—अर्जुन भीम महाबल जोधा इनहूँ मौन धरी—१-२५४।
मन धरी—विचार किया, निश्चय किया, इच्छा की।
उ.—कृपा तुम करी मैं भेंट कौं मन धरी नहीं कछु बस्तु ऐसी हमारैं—४११।
देह धरी—अवतार लिया। शरीर बढ़ाया।
उ.—तब वह देह धरी जोजन लौं—१०-५३।
(सं. दधि+हिं. काँदौ=कीचड़)
जन्माष्टमी के समय का एक उत्सव जिसमें लोग परस्पर हल्दी मिला हुआ दही छिड़कते हैं।
उ.—जसुमति भाग-सुहागिनी (जिनि) जायौ हरि सौ पूत। करहु ललन की आरती (री) आरु दधिकाँदौ सूत—१०-४०।
(सं. दधि+हिं. काँदौ=कीचड़)
उ.—सींके छोरि, मारि लरिकनि कौं, माखन-दधि सब खाई। भवन मच्यौ दधिकाँदौ, लरिकनि रोवत पाए जाइ—१०-३२८।
फटे हुए दूध का सार भाग जो पानी निकलने पर बचता है, छेना।
उ.—देखौ माई दधिसुत् में दधिजात १०-१७२।
उ.— जिन लोगनि सौं नेह करत है, तेई देख घिनै-हैं। घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होहि धरि खैहै—१-८६। (ख) बालक-बच्छ लै गयौ धरि—४८५।
स्थपित करके, जमाकर, ठहराकर।
उ.— सतगुरू कौ उपदेस हृदय धरि जिन भ्रम सकल निवार्यौ—१-३३६।
टेक, आश्रय, सहारा, रक्षा का उपाय।
उ.— अब मोकौं धरि रही न कोऊ तातैं जाति मरी—१-२५४।
अंगीकार कीजिए, अवलंबन कीजिए।
उ.— सरन आए की प्रभु, लाज धरिऐ—१-११०।
लेने या रखने की क्रिया या भाव।
उ.— दूरि न करहि बीन धरिबो—२८६०।
उ.— नवल किसोर नवल नागरिया। अपनी भुजा स्याम-भुज ऊपर, स्याम-भुजा अपनैं उर धरिया—६८८।
स्त्री को रखेली की भाँति रखेंगे।
उ.— राधा को तजिहैं मनमोहन कहा कंस दासी धरिहैं—२६७७।
उ.— कनक-दंड आपुन कर धरिहैं—११६१।
अंगीकार करे, सुने, स्वीकार करे, माने।
उ.—भए अपमान उहां तू मरिहै। जौ मम बचन हृदय नहिं धरिहै—४-५।
धारण किये हुए, रखे हुए, पकड़े हुए।
उ.— चक्र धरे बैकुंठ तैं धाए, वाकी पैज सरै—१-८२। (ख) खड़ग धरे आवै तुम देखत, अपनैं कर छिन माहँ पछारै—१०-१०।
उ.— वह देवता कंस मारैगौ केस धरे धरनी घिसियाइ—५३१।
मन धरे—ध्यान लगाये, चित्त रमाये।
उ.—(क) बिषयी भजे, बिरक्त न सेए, मन धन-धाम धरे—१-१९८। (ख) सूरदास स्वामी मनमोहन, तामै मन न धरे—४८३।
वेष धरे—वेश बनाये, सजे-सजाये।
उ.—सुन्दर बेष धरे गोपाल—४७४।
उ.—सूरदास गथ खोटो काहे पारखि दोष धरे—पृ. ३३१ (५)।
उ.—देह धरे को यह फल प्यारी—१२२९।
वह प्रेमी जिसे बिना विवाह के ही पति-रूप में ग्रहण कर लिया गया हो।
धरने से, पकड़ने या ग्रहण करने से।
उ.— कहा भीम के गदा धरैं कर, कहा धनुष धरैं पारथ—१-२५९।
उ.— इक दधि गोरोचन-दूब सबकैं सीस धरैं—१०-२४।
उ.—कौन बिभीषन रंक-निसाचर, हरि हँसि छत्र धरै—१-३५।
धारण करता है, आरोपित करता है, अंगीकर करता है।
उ.—(क) ब्रज-जन राखि नंद कौ लाला, गिरिधर बिरद धरै—१-३७।
उ.— जो घट अंदर हरि सुमिरै। ताकौ काल रूठि का करिहै, जो चित चरन धरै—१०-८२।
धरेगा, रखेगा, धारण करेगा।
उ.—जौ हरि-ब्रत निज उर न धरैगौ। तौं को अस त्राता जु अपन करि, कर कुठावँ पकरैगौ—१-७५।
उ.—भक्ति-हेत जसुदा के आगैं, धरनी चरन धरैया—१०-१३१।
मुहा.- नाम धरैहौ— बदनामी कराओगी। उ.— तुम हौ बड़े महर की बेटी कुल जनि नाम धरैहौ— १४९८।
बिना विवाह के स्त्री रख लेने की चाल या रीति।
कोई काम या दायित्व अपने ऊपर लेनेवाला।
वह जो धारण किया जाय, प्रकृति, स्वभाव।
पारलौकिक सुख के लिए किया गया शुभ कर्म।
उचित व्यवहार या कर्म, कर्तव्य।
सुकृत, सदाचार, सत्कर्म, पुण्य।
मुहा.- धर्म खाना— धर्म की शपथ खाना। धर्म के विरूद्ध व्यवहार करना। स्त्री का सतीत्व नष्ट करना।
धर्म लगती (से) कहना— सत्य-सत्य बात कहना।
ईश्वर, परलोक आदि के संबंध में विशेष रूप का विश्वास और आराधना की प्रणाली-विशेष, मत, संप्रदाय, पंथ।
उ.— धर्म-कर्म अधिकारिनि सौं कछु नाहिंन तुम्हरौ काज—१-२१५।
धरता हूँ, रखता हूँ, रखूँ।
उ.— छहौं रस जौ धरौं आगै, तऊ न गंध सुहाइ—१-५६।
भरि धरौं अँकवारि—छाती से लगाकर रखूँ, पकड़कर छाती से लगा लूँ।
उ.—कोउ कहति, मैं देखि पाऊँ, भरि धरौं अँकवारि—१०-२७३।
उ.— भरत पंथ पर देख्यौ खरौ। वाकै बदले ताकौं धरौ—५-४।
उ.—(क) हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ—१-२२०।
उ.—हरि-चरनारबिंद उर धरौ—१-२२४।
मेरी इच्छा धरौ—मेरी चाहना रखते हो, मुझे पाना चाहते हो।
उ.—जौ तुम मेरी इच्छा धरौ। गंधर्बनि कैं हित तप करौ—९-२।
स्त्री को बिना विवाह के पत्नी की तरह रख लो।
उ.— ब्याहौ बीस धरौ दस कुबजा अंतहु स्याम हमारे—३३४२।
गौतम बुद्ध की धर्म-शिक्षा।
धर्मपत्नी से उत्पन्न प्रथम पुत्र।
धर्मराज के पुत्र युधिष्ठिर।
नीति, न्याय व्ववस्था, कानून।
उचित-अनुचित का विभेद करनेवाली न्यायबुद्धि, विवेक, ईमान।
उ. कहयौ तुम बाँटि पर हमैं बिस्वास है, देहु बाँटि जो धर्म होई —८-८।
उ.— धर्म कहैं, सर-सयन गंग-सुत तेतिक नाहिं सँतोष—१-२१५।
वह गुण या वृत्ति जो उपमेय और उपमान में समान हो (अलंकारशास्त्र)।
धर्म रूपी अँखुआ या कल्ला।
उ.—अदभुत राम नाम के अंक। धर्म-अँकुर के पावन द्वै दल, मुक्ति-बधू-ताटंक—१-९०।
वह कर्म जिसका करना आवश्यक कहा गया हो।
वह पुस्तक जिसमें आचार-व्यवहार और पूजा-उपासना आदि विषयों की शिक्षा या चर्चा हो।
धर्म कर्म कराकर जीविका अर्जित करनेवाला ब्राह्मण।
धर्म का ध्यान रखत्ते हुए।
शुद्ध धर्मबुद्धि से निस्वार्थ दिया जानेवाला दान।
धर्म के लिए सहा गया कष्ट।
धार्मिकों-सा वेश बनाकर ठगने वाला, पाखंडी।
धर्म में श्रद्धा रखनेवाला।
धर्म में श्रद्धा या आस्था।
एक धर्म के पश्चात् दूसरे निश्चित धर्म की प्राप्ति।
धर्म का मुख्य स्थान जहाँ धर्म की व्यवस्था मिल सके।
वह यद्ध जिसमें किसी तरह का अन्याय या नियम-भंग न हो।
धर्म की रक्षा के लिए किया जानेवाला युद्ध।
उ.—बिदुर सु धर्मराइ अवतार—३-५।
वह उपमा जिसमें उप-मेय-उपमान के समान गुण का कथन न हो।
[सं. उदधि (=समुद्र) + स्त्री (समुद्र की स्त्री)]
दधि-सुत में दधि-तिय दीपति सी मृदु मुख तें मुसकात—सा. ६२।
एक बंदर जो सुग्रीव का मामा और मधुवन का रक्षक था।
उ.—देखौ माई दधिसुत् में दधिजात १०-१७२।
उ.—दधिसुत जामें नेद-दुवार १०-१७३।
ड—(क) मानिनि अजहूँ छाड़ो मान। तीन बिवि दधिसुत उतारत रामदल जुत सान-सा. ८१। (ख) दधि-सुत में दधि-तिय दीपति सी मृदु-मुख ते मुसकात-सा. ६२। (ग) राधा दधिसुत क्यों न दुरावति—सा. उ. ३६।
राजा पांडु की पत्नी कुंती के गर्भ से उत्पन्न धर्मदेव के पुत्र युधिष्ठिर।
उ.—धर्मपुत्र, तू देखि विचार—१-२६१।
वह पुत्र जिसे धर्मानुसार ग्रहण किया गया हो।
धर्म को प्राण से भी प्रिय समझनेवाला, बहुत धर्मात्मा।
वह जिसने केवल धर्म-पालन के लिए भिक्षा लेना आरंभ किया हो।
वह जो धर्म करने में साहसी हो।
वह मकान जो यात्रियों के निःशुल्क रहने के लिए बनवाया गया हो।
वह ग्रंथ जिसमें मानव-समाज-विशेष के आचार-व्यवहारों का उल्लेख हो।
धर्मानुसार कर्म करनेवाला।
ऐसी स्थिति जिसमें हर तरह से कुछ न कुछ हानि या संकट हो।
दान का प्रबंधक या अध्यक्ष।
वह सभा जिसमें धर्मसंबंधी विचार हो।
उ.— राजा इक पंडित पौरि तुम्हारी।¨¨¨¨। हूँठ पैंड दै बसुधा हमकौ तहां रचौं धर्मसारी (ध्रमसारी)—८-१४।
धर्मराज के पुत्र युधिष्ठिर।
धर्म रूपी संपत्ति या निधि।
उ.— पाप उजीर कह्यो सोइ मान्यौ, धर्म-सुधन लुटयौ—१-६४।
धर्मराज के पुत्र युधिष्ठिर।
उ.—सूरस्याम मिलि धर्मसुवन-रिपु ता अवतारहिं सलिल बहावै—सा. उ. २१।
सेतु की तरह धर्म को धारण— धर्म का निर्वाह— करनेवाला।
उ.— धर्मसेतु ह्वै धर्म बढ़ायौ भुवि को धारण कीन्हो—सारा. ३४६।
जो धर्म के नाम पर उचित अनुचित सभी कार्य करने को तत्पर हो।
उ.— यज्ञ करत बैरौचन कौ सुत, वेद-बिहित-बिधि-कर्मा। सो छलि बाँधि पताल पठायौ, कौन कृपानिधि धर्मा—१-१०४।
निर्धारित या निश्चित किया।
उ.—बिप्र बुलाइ नाम लै बूझयौं रासि सोधि इक सुदिन धरयौ—१०-८८।
उ.— आगै हरि पाछैं श्रीदामा, धरयौ स्याम हँकारि—१०-२१३।
उ.—मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ वैसेहि धरयौ रहि जैहै—२७११।
धरयौ रहि जैहै—रखा रह जायेगा, पड़ा रह जायेगा।
उ.—यह व्यापार तुम्हारौ ऊधौ ऐसेहिं धरयौ रहि जैहै—३००५।
धर्म में श्रद्धा रखनेवाला।
उ.— मधुबन के सब कृतज्ञ धर्मीले —३०५५।
जो धर्म के नाम पर उचित-अनुचित, सभी कुछ कर सके।
उ.— ग्वालनि हेत धर्यौ गोबर्धन, प्रगट इंद्र कौ गर्ब प्रहारयौ—१-१४।
उ.— (क) पतित-पावन हरि बिरद तुम्हारौ कौनैं नाम धरयौ—१-३३। (ख) नाम सुद्युम्न ताहि रिषि धरयौ—९-२। (ग) गोपिन नावँ धरयौ नवरंगी—२६७५।
उ.—दच्छ-सीस जो कुंड मैं जरयौ। ताके बदलैं अज-सिर धरयौ—४-५।
अपमान या तिरस्कार करनेवाला।
उ.—कब-हुँक लै लै नाउ मनोहर धवरी धेनु बुलावते—२७३५।
उ.—धवल बसन मिल रहे अंग में सूर न जानो जात—सा. ७६।
उ.—नहिं बिभूति दधि-सुत न कंठ दइ मृगमद चदंन चरचित तन।
उ.—गिरि गिरि परत बदन तैं उर पर हैं दधि-सुत के बिंदु। मानहुँ सुभग सुधाकन बरसत प्रिय-जन आगम इंदु—१०-२५३।
[सं उदधि (=समुद्र) + सुत (समुद्र का पुत्र, चंद्रमा) + अरि (=चंद्रमा का शत्रु राहु) + भष (=राहु का भक्षण, सुर्य) +सुत (=सूर्य का पुत्र, कर्ण) + सुभाव (=कर्ण का स्वभाव 'दानी' होना ; उर्दू में 'दानी' का अर्थ होता है सखी)]
उ.—दधिसुत-अरि-भष-सुत-सुभाव चल तहाँ उताइल आई—सा. ५७।
[सं. दधि (उदधि=समुद्र) + सुत (=समुद्र का सुत, अमृत) + गृह (=अमृत का घर अर्थात् ऒठ]
उ.—बिप्र बिचित्र रेख दधि-सुत गृइ रेसम छद घन ऊपर आज—सा. ६६।
[सं. दधि (उदधि=समुद्र) + सुत (=समुद्र का पुत्र, चंद्रमा) + धर (=चंद्रमा को धारण करनेवाला, महादेव) + रिपु (=महादेव का शत्रु, कामदेव)]
उ.—(क) रजनिचरगुन जानि दधि-सुत-धरन रिपु हित चाव—सा. १। (ख) दधिसुत धर-रिपु सहे सिलीमुष सुख सब अंग नसायौ—सा. ४६।
[सं. दधि (उदधि=समुद्र) + सुत (समुद्र का पुत्र, चंद्रमा) + धर (=चंद्रमा को धारण करनेवाला, महादेव) + रिपु=महादेव का शत्रु, कामदेव) +पिता (=कामदेव के पिता श्रीकृष्ण के पत्र थे)]
उ.—दधि सुत-धर-रिपु-पिता जानि मन पाछे आयो मोरे—सा. १००।
[सं. दधि (=उदधि=समुद्र) + सुत (समुद्र का पुत्र, चंद्रमा) + बाहन (=चंद्रमा का बाहन=मृग)]
उ.—दधि-सुत-बाहन मेखला लेके बैठि अनईस गनोरी—सा. उ. ५२।
[सं. दधि (=उदधि=समुद्र) + सुत (=समुद्र या जल का पुत्र, कमल) + सुत (=कमल का पुत्र, ब्रह्मा)]
उ.—आजु चरित नँद-नंदन सजनी देख। कीनो दधि-सुत-सुत से सजनी सुन्दर स्याम सुभेष—सा. ७५।
[सं. दधि (=उदधि=समुद्र) + सुत (समुद्र या जल का पुत्र। कमल) + सुत (कमल से उत्पन्न ब्रह्मा) + पत्नी (ब्रह्मा की पत्नी सरस्वती=गिरा=वाणी)]
उ.—लखि बृजचंद्र चंद्र मुख राधे। दधि-सुत-सुत-पतनी न निकासत दिन-पति-सुत-पतिनी प्रिय बाधे- सा. ६।
उ.— तिनके काज अहीर पठाए। बिलम करहु जिनि तुरत धवाए—१०-२१।
उजालना, उज्जवल करना, चमकाना, निखारना।
हिमालय की एक प्रसिद्ध चोटी।
उ.— (क) पाइ पियादे धाइ ग्राह सौं लीन्हौ राखि करी—१-१६। (ख) जोग को अभिमान करिहै ब्रजहिं जैहै धाइ—२९१४।
उ.— इतनी सुनत कुंति उठि धाई, बरषत लोचन नीर—१-२९।
उ.—पहुँचे आइ निकट रघुबर कैं, सुग्रीव आयौ धाई—९-१०२।
धँसने की क्रिया, भाव या ढंग।
उ.— मथि समुद्र सुर असुरनि कैं हित मंदर जलधि धसाऊ—१०-२२१।
उ.—कै दहिए दारुन दावानल जाइ जमुन धसि लीजै—२८६४।
बंद करना, उड़काना, भेड़ना।
मिर्च, तंबाक् आदि की गंध।
उ.—सूर प्रभु सुनि हँसत प्रीति उर मैं बसत इन्द्र कौ कसत हरि जगत धाता—९५५।
मुहा.- धाड़ पड़ना— बहुत जल्दी होना।
उ.—सीतल चंदन कटाउ, धरि खराद रंग लाउ, बिबिध चौकी बनाउ, धाउ रे बनैया—१०-४१।
दौड़ूँ, चलूँ, भागूँ, घूमूँ।
उ.—(क) हय-गयंद उतरि कहा गर्दभ चढ़ि धाऊँ।¨¨¨¨। अंब सुफल छाँड़ि, कहा सेमर कौं धाऊँ—१-१६६। (ख) जहँ जहँ भीर परै भक्तनि कौं, तहाँ तहाँ उठि धाऊँ—१-२४।
उ.—स्यंदन खंडि महाराथि खंडौं, कपिध्वज सहित गिराऊँ। पांडव-दल-सन्मुख ह्वै धाऊँ, सरिता-रुधिर बहाऊँ—१-२८०
उ.—सिव-बिरंचि मारन कौं धाए यह गति काहू देव न पाई—१-३।
उ.—(क) अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ तहँ फेनि पिराक। सूरदास प्रभु खात ग्वाल सँग, ब्रह्मलोक यह धाक—४६४। (ख) अमर जय ध्वनि भई धाक त्रिभुवन गई कंस मारयौ निदरि देवरायौ—२६१५।
(शब्द का ) धातु से ज्ञात अर्थ।
उ.—सूरज प्रभु लख धीर रूप कर चरन कमल पर धाधे— सा. ६।
उ.—करुपति कह्यौ. धान मम खाइ। पांडु सुतनि की करत सहाइ—१-२८४।
धनुष चलानेवाला, कमनैत, धनुर्द्धारी।
[सं दधि (=उदधि=समुद्र) + सुत (=समुद्र या जल से उत्पन्न कमल) + सुत (=कमल से उत्पन्न ब्रह्मा) + बाहन (=ब्रह्मा का बाहन, हंस)]
उ.—ठढी जलजा-सुत कर लीने। दधि-सुत-सुत बाहन हित सजनी भष बिचार चित दीने—सा.७२।
दधि-सुत-सुत-सुत-सुत-अरि-भष-मुख
[सं. दधि (=उदाधि=समुद्र) +सुत (समुद्र या जल का पुत्र, कमल) + सुत (कमल से उत्पन्न ब्रह्मा) +सुत (=ब्रह्मा का पुत्र, कश्यप) +सुत (=कश्यप का पुत्र, सूर्य) +अरि (=सूर्य का शत्रु, राहु) +भष (=राहु का भक्ष्य, चंद्रमा=चंद्र) +मुख (=चंद्रमुख)]
उ.—दुरद मूल के आदि राधिका बैठी करत सिंगार। दधि-सुत-सुत-सुत-सुत-अरि-भष-मुख करे बिमुख दुख भार—सा. ३५।
[सं. दधि (=उदधि=समुद्र) +सुत (समुद्र या जल से उत्पन्न, कमल) +सुत (=कमल से उत्पन्न, ब्रह्मा) +सुत (=ब्रह्मा का पुत्र, वशिष्ट) + हितकारी (=वशिष्ट का सहायक, अग्नि)]
उ.—दधि-सुत-सुत-सुत के हितकारी सज-सज सेज बिछावै—सा.६५।
उ.—दधि-सुता सुत अवलि ऊपर इंद्र आयुध जानि।
एक वैदिक ऋषि। इनके पिता का नाम किसी ने अथर्व लिखा है और किसी ने शुक्राचार्य। इन्होने देवताऒं की रक्षा के लिए वज्र बनाने के उद्देश्य से अपनी हड्डियाँ दान दे दी थीं।
गेरू, खड़िया आदि पदार्थ जो प्रायः उपरस कहलाते हैं। पूर्वकाल में इनका चित्रकारी में भी उपयोग किया जाता था।
उ.—(क) बनमाला तुमकौं पहिरावहिं, धातु-चित्र तनु-रेखहिं—४२६। (ख) मुकुट उतारि धरयौ लै मंदिर, पोछति है अंग धातु—५११।
शरीर को धारण करनेवाला द्रव्य।
उ.—जाके उदित नचत नाना बिधि गति अपनी-अपनी। सूरदास सब प्रकृति धातुमय अति बिचित्र सजनी।
धातु से निकले इँगुर आदि रंग।
विवाह की एक रीति जिसमें वर-पक्ष की ओर से कन्या के घर धान, हल्दी आदि भेजी जाती है।
दूसरे के चलाये अस्त्र को रोकने की एक क्रिया।
धनुर्द्धारी, धनुर्धर, कमनैत।
वह जिसमें कोईं चीज या वस्तु रखी जाय।
धान की पत्ती-सा हलके हरे रंग का।
उ.—अति संभ्रम अंचल चंचल गति धामन ध्वजा बिराजत—२५६१।
तोप-बंदूक पटाखा आदि छटने का शब्द।
उ.—सुनत सब्द तुरतहिं उठि धाया—४९९।
उ.—द्रुमन चढ़े सब सखा पुकारत मधुर सुनावहु बैन। जनि धापहु बलि चरन मनोहर कठिन काँट मग ऐन।
संतृष्ट या तृप्त हुई, अघा-कर।
उ.—(क) भच्छि अभच्छ, अपान पान करि, कबहुँ न मनसा धापी—१-१४०। (ख) दूतन कह्यौ बड़ौ यह पापी। इन तौ पाप किए हैं धापी—६-४।
उ.—(क) धाम धुआँ के कहौ कौन पै बैठी कहाँ अथाई। (ख) अरध बीच दै गये धाम को हरि अहार चलि जात— सा.२३।
उ.—तौ लगि यह संसार सगौ है जौ लगि लेहि न नाम। इतनी जउ जानत मन मूरख, मानत याहीं धाम—१-७६।
उ.—बैकुंठनाथ सकल सुखदाता, सूरदास सुखधाम—१-९२।
उ.—छाँड़ि सुखधाम अरु गरुड़ तजि साँवरौ पवन के गवन तैं अधिक धायौ—१५।
उ.—छलबल करि जित-तित हरि पर-धन धायौ सब दिन रात—१-२१६।
उ.—टेढ़ी चाल, पाग सिर टेढ़ी टेढ़ै टेढ़ै धायौ—१-३०१।
उ.— सलिल अखंड धार धर टूटत कियौ इंद्र भंन सादर—९४९।
वर्षा का इकट्ठा किया हुआ जल।
(जल आदि) द्रव पदार्थ के गिरने या बहने का तार।
उ.— (क) रुधिर-धार रिषि आँखिन ढरी—९-३। (ख) बिबिध सस्त्र छूटत पिचकारी चलत रुधिर की धार— सारा. २६। (ग) मनहुँ सुरसरी धार सरस्वति-जमुना मध्य बिराजै सारा. १७३। (घ) एक धार दोहनि पहुँचावत एक धार जहँ प्यारी ठाढ़ी। (ङ) माया-लोभ-मोह हैं चाँड़े काल-नदी की धार—१-८४।
मुहा.- धार चढ़ाना— किसी देवी-देवता, नदी, वृक्ष आदि पर दूध, जल आदि चढ़ाना।
पय धार चढ़ावो— दूध चढ़ाओ। उ.— सुर-समुह पय धार परम हित आषत अमल चढ़ावो— सा।
धार टूटना— धार का प्रवाह खंडित हो जाना।
धार देना— (१) दूध देना। (२) उपयोगी काम करना।
धार निकालना— दूध दुहना।
धार बँधना धार— बँधकर गिरना।
उ.—निकट आयुध बधिक धारे, करत तीच्छन धार। अजानायक मगन क्रीड़त चरत बारंबार—१-३२१।
मुहा.- धार बँधना— मंत्र आदि के बल से हथियार की धार का बेकार हो जाना।
धार बाँधना— मंत्र आदि के बल से हथियार की धार को बेकार कर देना।
उ.—(क)बिबिध खिलौना भाँति के (बहु) गज-मुक्ता चहुँ धार—१०४२-। (ख) महर पैठत सदन भीतर छींक बाईं धार—५२४।
उ.— दरसन को तरसत हरि लोचन तू सोभा की धार—२२१२।
उ.—(क) कहौं, सुनौ सो अब चित धार—१-२३०। (ख) राजा, सुनौ ताहि चितधार—४-५।
दक्ष की एक कन्या जो कश्यप को ब्याही थी और जिसके चालीस पुत्र हुए जो 'दानव' कहलाये।
दक्ष की कन्या दनु से उत्पन्न असुर, राक्षस।
उ.—भक्त बछल बपु धरि नर केहरि दनुज दह्यौ, उर दरि, सुरसाँइ—१-६।
[सं. दनुज (=दैत्य) +पति (=राक्षसों का स्वामी, रावण) +दनुज (रावण का छोटा भाई, कुंभकरण) +प्यारी (कुंभकर्ण की प्रिय वस्तु, निद्रा)]
उ.—दनुजपति की अनुज प्यारी गई निपट बिसार —सा. २४।
उ.—दत्तात्रेयऽरु पृथु बहुरि, जज्ञपुरुष बपु धार—२-३६।
किसी पदार्थ को अपने ऊपर लेने, रखने या थामने की क्रिया या भाव।
सेवन करने की क्रिया या भाव।
ग्रहण या अंगीकार करने की क्रिया या भाव।
ऋण लेने की क्रिया या भाव।
धारण करने की क्रिया या भाव।
योग का एक अंग जिसमें मन में केवल ब्रह्म का ही ध्यान रहता है।
धारण करने की क्रिया, ग्रहण, अपने ऊपर लेना।
उ.—तब गंगा जू दरसन दियौ। कह्यौ, मनोरथ तेरौ करौं। पै मैं जब अकास तै परौं। मोकौं कौन धारना करै ? नृप कह्यौ, संकर तुमकौं धरै—९-१०।
उ.—(क)राजति रोम राजी रेख। नील घन मनु धूम-धारा, रही सूच्छम सेष—६३५। (ख) रोमावली-रेख अति राजति। सूच्छँम बेष धूम की धारा नव घन ऊपर भ्राजति—६३८।
उ.—उर-कलिंद तै धँसि जल-धारा, उदर-धरनि परबाह—६३८।
पग धारत—पैर रखते है, जाते हैं।
उ.—कौन जाति अरु पाँति बिदुर की, ताही कै पग धारत—१-१२।
ध्यान धारत—ध्यान लगाते हैं।
उ.—सनक संकर ध्यान धारत निगम आगम बरन—१-३०८
धारण करती है, रखती है, अपनाती है।
उ.—(क) बार-बार कुलदेव मनावति, दोउ कर जोरि सिरहिं लै धारति—१०-२००। (ख) कर अपनैं उर धारतिं, आपुन ही चोली धरि फारि—१०-३०४।
उ.—संभु-पतनी-पिता धारन बक बिदारन बीर— सा. ९३।
धारणा योग, के आठ अंगों मे से एक, मन की वह स्थिति जिसमें केवल ब्रह्म का चिंतन रहता है।
उ.—(क) प्रत्याहार-धारना-ध्यान। करै जु छाँड़ि वासना आन—२-२१। (ख) जोग धारना करि तनु त्याग्यौ। सिव-पद-कमल हृदय अनु-राग्यौ—४-५। (ग) तन दैबै तै नाहिंन भजौ। जोग धारना करि इहिं तजौं—६-५। (घ) आसन बैसन ध्यान धारना मन आरोहण कीजै—२४६१।
धारा के समान बराबर बढ़नेवाला।
उ.—गिरि कर धारि इंद्र-मद मद्यौं, दासनि सुख उपजाए—१-२७।
उ.—जीरन पट कुपीन तन धारि। चल्यौ सुरसरी सीस उघारि—१-३४१।
देह (बपु) धारि—शरीर धारण करके, जन्म लेकर।
उ.—(क) नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं, जम की मार सो खेहै—१-८६। (ख) कहत प्रहलाद के धारि नरसिंह बपु निकसि आये तुरत खंभ फारी—७-६। (ग) सूरदास प्रभु भक्त-हेत ही देह धारि कै आयौ—३४६।
चित धारि—चित्त में सोंचकर, ठह-राकर।
उ.—परयौ भव-जलधि मैं, हाथ धरि काढ़ि मम दोष जनि धारि चित काम-कामी—१-२१४।
प्रमुख देवताओं की स्त्रियाँ।
उ.— चारि भुजा मम आयुध धारा—१० उ. ४४।
जो धारा की तरह बराबर चलता रहे।
उ.—(क) निकट आयुध बधिक धारे करत तीच्छन धार—१-३२१। (ख) ते सब ठाढ़े सस्त्रनि धारे—४-१२।
उ.—(क) गरुड़ छाँड़ि प्रभु पायँ पियादे गज-कारन पग धारे—१-२५। (ख) ध्रुव निज पुर कौं पुनि पग धारे—४-९। (ग) सूर तुरत मधुबन पग धारे धरनी के हितकारि—२५३३।
बपु धारे—शरीर धारण किये, जन्म लिये।
उ. - जब जब प्रगट भयौ जल थल मै, तब तब बहुबपू धरे-१ -२७
उ.—व्याध, गीध, गौतम की नारी, कहौ कौन ब्रत धारे—१-१५८।
उ.—सुमिरि सुमिरि गर्जत जल छाँड़त अस्त्रु सलिल के धारे—२७६१।
ग्रहण करें, लावें, अपनावें।
उ.—(क) हरि हरि नाम सदा उच्चारैं। बिद्या और न मन मैं धारैं—७-२। (ख) बिनु अपराध पुरुष हम मारैं। माया-मोह न मन मैं धारैं—९-२।
उ.—अबरन, बरन सुरति नहिं धारै। गोपिनि के सो बदन निहरै—१०-३।
थन से निकला ताजा दूध जो कुछ देर तक गरम रहता है।
उ.—राज-छत्र नाहीं सिर धारौं—१-२६१।
उ.—सूर सुमारग फेरि चलैगौ बेद बचन उर धारौ—१-१९२।
उ.—उन यह बचन हृदय नहिं धारौ—३-६।
उ.—भक्त बछल प्रभु नाम तुम्हारौ। जल संकट तैं राखि लियौ गज ग्वालनि हित गोबर्धन धारौ—१-१७२।
उ.—चौदह वर्ष रहैं बन राधव, छत्र भरत सिर धारौ—९-३०।
उ. --राख्यौ गोकुल बहुत बिघन तै, कर-नख पर गोबर्धन धारी-१-२२|
निश्चित की, सोची, विचारी।
उ.—महा-राज दसरथ मन धारी। अवधपुरी कौ राज राम दै, लीजै ब्रत बनचारी—९-३०।
दियौ धारी—रख दिया, धारण करा दिया।
उ.—भयौ हलाहल प्रगट प्रथम ही मथत जब रुद्र कै कंठ दियौ ताहि धारी—८-८।
उ.—महा सुभट रनजीत पवनसुत, निडर बज्र-बपु-धारी—९-११५।
ग्रंथ का तात्पर्य समझनेवाला।
उ.—दनुज-सुता पहिले संहारी पयपीवत दिन सात—२४६३।
उ.—कागासुर सकटासुर मारथौ पय पीवत दनु-नारी ६८६।
उ.—अब के चलते जानि सूर प्रभु सब पहिले उठि धावहिंगे—२७८९।
उ.—बाल बिलख मुख गौ न चरति तृन बछ पय पियन न धावहिं—३५२७।
दौड़ो, भागो, तेजी से जाओ।
उ.—अस्व देखि कहथौ, धावहु, धावहु। भागि जाहि मति, बिलँब न लावहु—९-९।
किसी काम के लिए जल्दी से जाना।
मुहा.धावा मारना जल्दी-जल्दी घूम आना।
उ.—औरनि कौं जम कैं अनुसासन, किंकर कोटिक धावैं। सुनि मेरी अपराध अधमई, कोऊ निकट न आवैं—१-१९७।
उ.—(क) रुप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु निरालंब कित धावै—१-२।
दौड़ता है, मारा मारा फिरता है।
उ.—कहूँ ठौर नहि चरन-कमल बिनु, भृंगी ज्यौं दसहूँ दिसि धावै—१-२३३।
चोर से चिल्लाकर रोना, धाड़।
उ.—देखे नंद चले घर आवत। पैठत पौरि छींक भई बाएँ, दहिनैं धाह सुनावत—५४१।
उ.—कोमल कर गोबर्धन धारथौ जब हुते नंद-दुलारे—१-२५।
जन्म धारथौ—जन्म लिया, शरीर धारण किया।
उ.—जिहिं-जिहिं जोनि जन्म धारथौ, बहु जोरथौ अघ कौ भार—१-६८।
उ.—जहाँ मल्ल तहँ को पग धारथौ—२६४३।
उ.—(क)मन चातक जल तज्यौ स्वाति-हित, एक रुप ब्रत धारथौ—१-२१०। (ख) मरन भूलि, जीवन थिर जान्यौ, बहु उद्यम जिय धारथौ—१-३३६।
उ.—(क) संकट परैं तुरत उठि धावत, परम सुभट निज पन कौं—१-९। (ख) धावत कनक-मृगा कैं पाछैं राजिवलोचन परम उदारी—१०-१९८।
धाती है, दौड़ती है, भागती है।
उ.—(क) सखि री, काहैं गहरु लगावति। सब कोऊ ऐसौ सुख सुनिकै क्यौं नाहिंन उठि धावति—१०-२३। (ख) निठुर भए सुत आजु, तात की छोह न आवति। यह कहि कहि अकुलाइ, बहुरि जल भीतर धावति—५८९।
बहुत शीघ्र जाने की क्रिया, दौड़कर जाना।
उ.—गजहित धावन, जन-मुकरावन, बेद बिमल जस गावत—८-४।
उ.—(क) दससिर बोलि निकट बैठायौ, कहि धावन सति भाउ। उद्यम कहा होत लंका कौं, कौंनैं कियौ उपाउ—९-१२१। (ख) द्विविद करि कोप हरि पुरी आयौ। नृप सुदक्षिण जरथौ जरी वारानसी धाय धावन जबहि यह सुनांयौ—१०३-४५।
वह चीज जिससे गंदी वस्तु को साफ किया जाय।
जल्दी चलने की क्रिया, दौड़।
उ.—वापट पीत की फहरानि। कर धरि चक्र, चरन की धावनि, नहिं बिसरत वह बानि—१-२७९।
उ.—जानि बूझि इन करी धिंगाई। मेरी बलि पर्वतहिं चढ़ाई।
दुष्ट या निर्लज्ज (स्त्री)।
उ.—(क) धिग धिग मेरी बुद्धि, कृष्न सौं बैर बढ़ायौ—४९२। (ख) धिग धिग मोहि तोहि सुन सजनी धिग जेहि हेति बोलाई—सा. ४७।
धृणा या तिरस्कार सूचक शब्द।
उ.—सूर नंद बलरामहिं धिरयौ तब मन हरष कन्हैया—१०-२१७।
उ.—मुख झगरति आनँद उर धिरवति है घर जाहु—१०२६।
उ.—जाति-पाँति सों कहा अचगरी यह कहिं सुतहिं धिरावति।
उ.—(क) प्रभु जू, बिपदा भली बिचारी। धिक यह राज बिमुख चरननि दैं, कहति पाँडु की नारी—१-२८२। (ख) धिक तुम, धिक या कहिबे ऊपर। जीवित रहिहौ कौ लौं भू पर—१-२८४।
तिरस्कार या धृणा सूचक शब्द, लानत, फटकार।
उ.—भ्राता मारन मोहिं धिरावै देखे मोहें न भावत।
उ.—धींग तुम्हारौ पूत धींगरी हमकौ कीन्हीं—१८७०।
उ.—धींगरी धींग चाचरि करै मोहिं बुलावत साखि।
दुष्टा, उपद्रव करने वाली।
उ.—धींग तुम्हरौ पूत धींगरी हमकौ कीनी—१०७०।
जबरदस्ती लड़ना या हाथाबाँही करना।
आँख, कान आदि इंद्रियाँ जिनसे किसी बात का ज्ञान प्राप्त किया जाय।
उ.—पुर कौं देखि परम सुख लह्यौ। रानी सौ मिलाप तहँ भयौ।तिन पूछ यौ तू काकी धी है ? उन कह्यौ नहिं सुमिरन मम ही है—४-१२।
जिसकी पूजा-आराधना की जाय।
उ.—सात दिवस गोबर्धन राख्यौ इन्द्र गयौ दपु छोड़ि।
उ.—इत भगदत्त, द्रोन, भूरिश्रव चुम सेनापति धीर—१-२६९।
उ.—राज-खनि गाई व्याकुल ह्णै, दै दै तिनकौं धीरक। मागध हति राजा सब छोरे, ऐसे प्रभु पर-पीरक—१-११२।
धैर्य, धीरता, चित्त की स्थिरता।
उ.—(क) सूर पतित जब सुन्यौ बिरद यह, तब धीरज मन आयौ—१-१२५। (ख) जननि कैसे धरथौ धीरज कहति सब पुर बाम—२५६५।
जो तीव्र या उग्र न हो, हलका।
उतावाली न होने का भाव, सब्र, संतोष।
उ.—इतनेहि धीरज दियौ सबन कौ अवधि गए दै आस—२५३४ .।
चित्त की दृढ़ता या स्थिरता, धैर्य।
वह नायक जो सदा सजा-सजाया और प्रसन्न रहे।
वह नायक जो शील, दया, गुण और पुण्यवान हो।
वह नायिका जो नायक के शरीर पर पर-स्त्री-रमण के चिह्न देखकर ताने से अपना क्रोध प्रकट करे।
वह नायिका जो नायक के शरीर पर पर-स्त्री-रमण के चिह्न देखकर कुछ गुप्त और कुछ प्रकट रुप से अपना क्रोध जता दे।
चुपके से जिससे किसी को पता न चले।
वह नायक जिसमें दया, क्षमा, वीरता, धीरता आदि सद्गुण हों।
वीर-रस-प्रधान नाटक का नायक।
वह प्रबल शक्तिवाला नायक जो दूसरे का गर्व न सहकर अपने ही गुणों का बखान किया करे।
उ.— बार-बार श्रीपति कहैं, धीवर नहिं मानै—९-४२।
उ.—छाँछ छबीली धरी धुँगारी। झहरैं उठत जार की न्यारी।
उ.—सूरदास प्रभु तुम्हरै दरस को मग जोवत अँखियाँ भइ धुंजैं—२७२१।
इस धूल से होनेवाला अँधेरा।
धूल के उड़ने से होनेवाला अंधेरा।
उ.—तृनाबर्त बिपरीत महाखल सो नृपराय पठायौ। चक्रवात ह्वै सकल घोष मैं रज धुंधर ह्वै छायौ— सारा. ४२८।
[हिं. धुंध + आना (प्रत्य.)]
[हिं. धुंध + आना (प्रत्य.)]
(हिं. धुआँधार=धुआँ + धार)
उ.—अति अगिनि-झार, भंभार धुंधार करि, उचटि अंगार झंझार छायौ—५९६।
उ.—धुरवा धुंधि बढ़ी दसहूँ दिसि गर्जि निसान बजायौ—२८१९।
एक राक्षस जो कुवलयाश्व द्वारा मारा गया था।
गर्द-गुबार धूल या आँधी के कारण होनेवाला अंधकार।
धुँधली या मंद दृष्टिवाला।
दृष्टि मंद होने या कम दिखायी देने का रोग।
उ. —उड़त धूरि धुँरवा धुर दीसत सूल सकल जलधार—१० उ. २।
उ.—धाम धुआँ के कहो कवन कै कवनै धाम उठाई—३३४३।
मुहा.- धुआँ देना- (१) धुआँ निकालना। ((२) धुआँ पहुँचाना।
धुआँ काढ़ना (निकालना)- बढ़बढ़कर बातें करना, शेखी हाँकना।
धुआँ रमना- धुएँ का छाया रहना।
मुँह धुआँ होना- चेहरा फीका पड़ जाना।
(किसी चीज का) धुँआ होना- उस चीज का काला पड़ जाना।
धुआँ घर से बाहर निकालने का छेद।
बड़े जोर का, प्रचंड, घोर, बहुत प्रभावशाली।
मुहा.- रफा-दफा करना— जगड़ा निबटाना।
धुएँ की गंध आ जाने से स्वाद बिगड़ जाना।
उरद का आटा जिससे पापड़ या कचौड़ी बनती है।
उ.—हरि स्त्रम-जल अंतर तनु भीजे ता लालच न धुआवत सारी—३४२५।
उ.—मनहुँ धुई निर्धूम अग्नि पर तप बैठे त्रिपुरारि—१६८६।
धुआँ का विभक्ति के संयोग के उपयुक्त रुप।
मुहा.- धुएँ का धौरहर— थोड़े समय में नष्ट हो जानेवाली चीज।
धुएँ के बादल उड़ाना— गढ़-गढ़ कर बाते बनाना, गप हाँकना।
धुएँ उड़ाना (बिखेरना)— टुकड़े-टुकड़े करना, नाश करना।
झुकता है, नीचे की ओर ढलता है, नवता है।
उ.— डगमगात गिरि परत पानि पर, भुज भ्राजत नँदलाल। जनु सिर पर ससि जानि अधोमुख, धुकत नलिनि नमि नाल—१०-१४४।
पेट और छाती के बीच का भाग।
उ.— (क) बिधि बिहँसत, हरि हँसत हेरि हेरि, जसुमति की धुकधकी सु उर की—१०-१८०। (ख) तनु अति कँपति बिरह अति ब्याकुल उर धुकधुकी स्वेद कीन्ही—३४४९।
छाती का एक गहना, पदिक, जुगनू।
चक्कर खाकर गिरता है, गिरकर।
उ.— (क) लेति उसास नयन जल भरि भरि, धुकि सो परै धरि धरनी—९-७३। (ख) रूंड पर रूंड धुकि परे धरि धरणी पर गिरत ज्यों संग कर बज्र मारे—१० उ. २१।
घृणा या तिरस्कार-सूचक शब्द।
घृणा या तिरस्कार से हटाने का शब्द।
घृणा या तिरस्कार से हटाना।
वंचकता, चालबाजी, ठगपना, चालाकी।
उ.— तोसौं कहा धुताई करिहौं। जहाँ करी तहँ देखी नाहीं, कह तोसौं मैं लरिहौं—५३७।
उ.— हुमासन धुज जात उन्नत बहयौ हर दिसि बाउ— सा. उ. ४०।
उ.—(क) धर्म-धुजा अंतर कछु नाहीं, लोक दिखावत फिरतौ—१-२०३। (ख) गरजत रहत मत्त गज चहुँ दिसि छत्र-धुजा चहुँ दीस—९-७५।
काँपने की क्रिया या भाव, कंपन।
यौ.— धुन का पक्का— सच्ची लगनवाला जो किसी काम को शुरू करके किसी भी दशा में अधूरा न छोड़े।
रूई साफ करने का धनुष की तरह का एक औजार, पिंजा, फटका।
मुहा.- सिर धुनति— शोक या पश्चाताप की अधिकता से सिर पीटती है। उ.— बारबार सिर धुनति बिसूरति बिरह ग्राह जनु भखियाँ— २७६६।
मुहा.- सिर धुनना- शोक या पश्चाताप की अधिकता से सिर पीटकर रोना या विलाप करना।
धुनने का काम दूसरे से कराना।
मुहा.- माथौ (सिर) धुनि— शोक या पश्चात्ताप से माथा या सिर पीटकर, पछताकर। उ.— (क) पटकि पूँछ माथौ लौटै लखी न राघव नारि— ९-७५। (ख) हरि बिन को पुरवै मो स्वारथ ? मीड़त हाथ, सीस धुनि ढोरत, रूदन करत नृप, पारथ— २८७। (ग) इतनौ बचन सुनत सिर धुनि कै बोली सिया रिसाइ— ९-७७। (घ) सभा माँज असुरनि के आगै सिर धुनि धुनि पछितायौ— १०-६०। (ङ) रोहिनि चितै रही जसुमति तन सिर धुनि धुनि पछितानी— ३९५।
मुहा.- सिर धुनियत— शोक या पश्चात्ताप से सिर पीटते हैं। उ.— ह्हाँऊ जाई अकाज करैगे गुन गुनि गुनि सिर धुनियत— पृ. ३२६ (५८)।
उ.—ग्रह-लगन-नषत-पल सोधि, कीन्ही बेद-धुनी—१०-२४।
मुहा.- सीस धुनै— शोक या पश्चात्ताप से सिर धुनता है। उ.— नगन न होति चकित भयौ राजा सीस धुनै कर मारै— १-२५७।
(हिं. धूप =एक सुगंधित पदार्थ)
धूप के धुएँ से सुगंधित करना।
धप दिखाकर सुखाना या तपाना।
‘धूप’ नामक सुगंधित पदार्थ सुलगाने का पात्र, धूपदानी।
[सं. धूम्र + ई (प्रत्य.)]
धुएँ की तरह लाली लिये हल्के काले रंग का।
[हिं. धूमिल + आई (प्रत्य.)]
[हिं. धूमिल + आई (प्रत्य.)]
भार या बोझ के नीचे पड़ना।
बात या विषय का अधिक फैल न सकना।
दूसरे के अधिकार में होना।
उ.— धुर ही ते खोटो खायौ है लिए फिरत सिर भारी—३३४०।
मुहा.- धुर सिरे से— बिलकुल नये सिरे से।
बिलकुल सीधा, न इधर का न उधर का।
बहुत दूर, एकदम छोर या सीमा पर।
उ.— उड़त धूरि धुरवा धुर दीसत सूल सकल जलधार—३४९५।
उ.—ध्रुवा छंद धुरपद जस हरि को हरि ही गाय सुनावत—१०८२।
उ.— (क) उड़त धूरि धुरवा धुर दीसत सूल सकल जलधार—३४९५। (ख) धुरवा धुन्धि बढ़ी दसहूँ दिसि गर्जि निसान बजायौ—२८१९। (ग) कारी घटा देखि धुरवा जनु बिरह लयौ करता जनु—२८७२।
पहिये, गाड़ी आदि के बीचोंबीच का डंड़ा, अक्ष।
जिस गाने के साथ बाजे की जरूरत न हो।
मुहा.- धुरें उड़ाना (उड़ा देना)— (१) नष्ट-भ्रष्ट कर डालना। (२) बहुत अधिक मारन-पीटना।
धोने का काम दुसरे से कराना।
धोने का काम, भाव या मजदूरी।
होली जलने के दूसरे दिन मनाया जानेवाला एक त्योहार जिस दिन खूब रंग चलता है।
होली जलने के दूसरे दिन मनाया जानेवाला एक त्योहार।
उ.— पहुँचे जाइ राजगिरि द्वारे धुरे निसान सुदेस—१० उ. ४८।
पशुओं के कंधे पर रखा जानेवाला जुआ।
चलाने, कँपाने या हिलानेवाला।
उरद का आटा जिससे पापड़ या कचौड़ी बनती है।
उ.—कनक-थार मैं हाथ धुवाए—३९६।
धूलभरी आँधी के कारण होनेवाला अँधेरा।
उ.— धूम धुंध छाई धर अंबर चमकत बिच बिच ज्वाल—६१५।
इस धूल के कारण होनेवाला अँधेरा।
उ.— (क) लंपट, धूत, पूत दमरी कौ, बिषय-जाप कौ जापी—१-१४०। (ख) ऐसेई जन धूत कहावत। (ग) सूरस्याम दीन्हैं ही बनिहै बहुत कहावत धूत—५३६। (घ) धूत धौल लंपट जैसे हरि तैसे और न जानैं—३३६६।
उ.—भए पांडवनि के हरि दूत। गए जहाँ कौरवपति धूत—१-२३७।
जिसके पाप दूर हो गये हों।
काशी की एक प्राचीन नदी जो अब सूख गयी है।
धूर्तता करके, धोखा देकर, ठगकर।
उ.— हौं तव संग जरौंगी, यौं कहि, तिया धूति धन खायौ—२-३०।
उ.— तुमसौं धूत्यौ कहा करौं, धूत्यौ नहिं देख्यौ—५८९।
किसी सुगंधित द्रव्य या साधारण वस्तु को जलाकर उठाया हुआ धुआं।
मुहा.- धूनी देना— जलाकर धुआँ उठाना और उससे सेंकना।
वह आग जिस तापने या शरीर को तपाने के लिए साधु चारों ओर जलाये रहते हैं।
मुहा.- धूनी जगना (लगना)- (साधुओं के तापने की) आग जलना।
धूनी जगाना (लगाना)— (१) साधुओं का अपने सामने आग जलाना। (२) शरीर तपाना। (३) साधु या विरक्त होना।
धूनी रमाना— (१) आग से शरीर को तपाना। (२) साधु या विरक्त होना।
सुगंधित पदार्थों का धुआँ।
उ.—प्रति-प्रति गृह तोरन ध्वजा धूप। सजे सजल कलस अरु कदलि यूप—९-१६६।
वह द्रव्य जिसका धुआँ सुगंधित हो।
चौपायों के बाँधने का स्थान।
बाँस का समूह या उसकी कोठी।
स्थान का स्वामी या अधिकारी।
दिशाओं का स्वामी या रक्षक, दिक्पाल।
मुहा.- दबकी मारना— छिप जाना।
सूर्य का प्रकाश और ताप, घाम।
मुहा.- धूप खाना— धूप में खड़े होना, धूप में तरना।
धूप खिलाना— धूप में तपाना।
धूप चढ़ना— (१) धूप फैलना। (२) ज्यादा समय दीतना।
धूप दिखाना— धूप में रखना या तपाना।
धूप में बाल सफेद करना— बूढ़ा होना, पर जीवन का अनुभव न होना।
धूप लेना— धूप में खड़े होना।
धूप में छाया से समय जानने का यंत्र।
एक कपड़ा जिसमें एक स्थान पर कभी एक रंग जान पड़ता है, कभी दूसरा।
‘धूप’ नामक सुगंधित द्रव रखने या जलाने का पात्र।
‘धूप’ नामक सुगंधित द्रव्य रखने या जलाने का छोटा पात्र।
सुगंधित द्रव्य जलने से धुआँ उठना।
गंध-द्रव्य जलाकर उसके धुएँ से वातावरण को सुगंधित करना।
गंध-द्रव्य लगी सींक या बत्ती जिसको जलाने से वातावरण सुगन्धित हो जाता है।
स्नान के पीछे सुगंधित धुएँ में कुछ काल तक रहकर शरीर को बसाने की प्राचीन प्रथा।
धूप या सुगंधित धुएँ से बसाया हुआ।
हैरान या थका हुआ, श्रांत।
उ.—बादर-छाहँ, धूम-धौराहर, जैसै थिर न रहाहीं—१-३१९।
मुहा.- धूम के हाथी— तुरंत नष्ट हो जाने या किसी उपयाग में न आनेवाली वस्तु। उ.— देखत भले काज को जैसे होत धूम के हाथी— ३३२०।
विशेष पदार्थो का धुआँ जो रोगियों के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
घोड़ा जिसकी पूँछ में भँवरी हो।
रावण की सेना का एक राक्षस।
ठाट-बाट, साज-बाज और तैयारी, समारोह।
दिशा जिसमें सूर्य जाने को हो।
उ.—मुख अरबिंद धार मिलि सोभित धूमिल नील अगाध। मनहुँ बाल-रवि रस समीर संकित तिमिर कूट ह्वै आध।
ललाई लिए काला रंग, धुएँ का रंग।
धुएँ के रंग की, लालिमा युक्त काले रंग की।
उ.—(क) अपनी अपनी गाइ ग्वाल सब आनि करौ इकठौरी। धौरी धूमरि, राती, रौंछी, बोल बुलाइ चिन्हौरी। (ख) आपुस मैं सब करत कुलाहल, धौरी, धूमरि, धेनु बुलाए—४४७।
धुँधले रंग का, जो चटक न हो।
मलिन कांतिवाला, जिसकी कांति फीकी पड़ गयी हो।
एक नरक जहाँ सदा धुआँ भरा रहता है।
उ.—धौरी धूमर काजर कारी कहि कहि नाम बुलावै—१-७९।
एक प्रकार का शठ नायक (साहित्य)।
मुहा.- धूरा देना— अपने अनुकूल करना।
उ.—(क) ससि सन्मुख जो धूरि उड़ावै उलटि ताहि कैं मुख परै—१-२३४। (ख) हरि की माया कोउ न जानै, आँखि धूरि सी दीन्हीं—६९४।
मुहा.- धूरि बठीरत— व्यर्थ का काम करना, देमतलब का काम करना। उ.— कबहूँ मग-मग धूरि बटोरत, भोजन कौ बिलखात— २-२२।
श्रीराम की सेना का एक भालू।
जिसकी आँखें धुँधले रंग की हों।
दबाने का काम दूसरे से कराना।
प्रभाव या दबाव से कुछ करने को विवश करना।
तुलना में एक चीज को मात कर देना।
किसी बात को फैलने न देना।
जो धूल से मटमैला हो गया हो।
धूसरे, धूसरो, धूसल,धूसला, धूसलो
धूसरे, धूसरो, धूसल,धूसला, धूसलो
(सं. धिक्, पुं. हिं. धृक)
उ.—धृग तव जन्म, जियन धृग तेरौ, कही कपट-मुख बाता—९-४९। (ख) तुमहिं बिना मन धृक अरु धृक घर। तुमहिं बिना धृक धृक माता पितु धृक धृक कुल की कान लाज डर—१२९६। (ग) धृग मोको धृग मेरी करनी तब हीं क्यों न मरथौ—२५५२। (घ) मार-मार कहि गारि दै धृग गाइ चरैया—२५७५। (ङ) मारि डारै कहा बंदि को जीवन धृग मीच हमको नहीं मनन भूल्यौ—२६२४।
स्थिर य़ा निश्चित किया हुआ।
दुर्योधन के पिता जो विचित्रवीर्य के पुत्र थे।
धूल से सना हुआ, धूल से भरा ङुआ, जिसके धूल लगी हो।
उ.—(क) हौं बलि जाउँ छबीले लाल की। धूसर धूरि धुटुरुवनि रेंगनि, बोलनि बचन रसाल की—१०-१०५। (ख) सखि री, नंदनंदन देखु। धूरि धूसर जटा जुटली, हरि किए हरभेषु—१०१७०। (ग) बिहरत बिबिध बालक संग। डगनि डगमग पगनि डोलत, धूरि-धूसर अंग—१०-१८४।
धूल-धौसर—धूल से सना या भरा हुआ।
धूल के रंग का, मटमैला, मटीला।
जिसमे धूल लगी हो, धूल से भरा हुआ।
मुहा.- (कहीं) धूल उड़ना— (१) तबाही आना। (२) चहल पहल न रहना।
(किसी की) धूल उड़ना— (१) बुराइयों का प्रकट किया जाना। (२) उपहास होना।
(किसी की) धूल उड़ाना— (१) दोषों को प्रकट करना। (२) हँसी उड़ाना।
धूल उड़ाते फिरना— (१) मारे-मारे धूमना। (२) दीन दशा में परेशान धूमना।
धूल की लस्सी बटना— बेकार का परिश्रम करना।
धूल चाटना— (१) बहुत बिनती करना। (२) बहुत नम्रता दिखाना।
धूल छानना— मारे-मारे धूमना।
धूल झड़ना— मार पड़ना, पिटना।
धूल झाड़ना— (१) मारना-पीटना। (२) खुशामद करना।
धूल डालना— (१) (किसी बात को) दबाना या फैलने न देना। (२) ध्यान देना।
धूल फाँकना— (१) मारे-मारे फिरना। (२) सरासर झुठ बोलना।
धूल बरसना— चहल-पहल, रौनक न रहना।
धूल में मिलना— नष्ट हो जाना।
धूल में मिलाना— नष्ट करना।
(कहीं की) धूल ले डालना— (कहीं पर) बहुत बार पहुँचना।
पैर की धूल— बहुत तुच्छ चीज।
धूल सिर पर डालना— बहुत पछताना।
मुहा.- धूल समझना— कुछ न गिनना।
हाल की बच्चाजनी गाय, सवत्सा गाय।
उ.— कदली कंटक, साधु असाधुहिं, केहरि कैं सँग धेनु बँधाने। यह बिपरीत जानि तुम जन की, अंतर दै विच रहे लुकाने—१-२१७।
एक राक्षस जिसे बलदेव जी ने मारा था।
उ.— धेनुक असुर तहाँ रखवारी।¨¨¨¨। पकरि पाइँ बलभद्र फिरायौ। मारि ताहि तरू माहिं गिरायौ—४९९।
स्थिर रहने की क्रिया या भाव।
अनुचित साहस करनेवाला, ढीठ, उद्वत।
राजा द्रुपद का पुत्र जो पांडवों की सेना का नायक था।
उ.— चहुँ ओर चतुरंग लच्छमी, कोटिक दुहियत धेन री—१०-१३६।
मुहा.- मिट्टी का लोंदा— (१) मूर्ख। (२) निकम्मा।
दूर करो, हटाओ, मिटाओ, मिटा दो।
मुहा.- धो बहाओ— मिटा दो, न रहने दो।
उ.— चरन धोइ चरनोदक लीन्हौं—१-२३९।
उ.— मेघ परस्पर यहै कहत हैं धोइ करहु गिरि खादर—९४९।
धोइ डारै—दूर कर दिये, हटाये, मिटा दिये।
उ.—पतित अजामिल, दासी कुब्जा, तिनके कलिमल डारे धोइ—१९५।
धोइ डारौ—मिटा दूँ, बहा दूँ।
उ.—जल बरषि ब्रज धोइ डारौं लोग देउँ बहाइ—९४३।
उ.— लाल उठौ मुख धोइऐ, लागी बदन उघारन—४३९।
उ.— सेत, हरौ, रातौ अरू पियरौ रंग लेत है धोई। कारौ अपनौ रंग न छाँड़ौ, अनरँग कबहुँ न होई—१-६३।
उ.— बार-बार हरि कहत मनहिं मन, अबहिं रहे सँग चारत धेनु—५०१।
धाने या दौड़ने की क्रिया।
उ.—कैसे हार तोरि मेरो डारयौ बिसरत नाहीं रिसकर धैबो—१०५२।
धाय, दाई, दूध पिलाकर पालनेवाली।
उ.— धन्य जसोमति त्रिभुवनपति धैया—२६३१।
धीरज, धीरता, चित्त की स्थिरता।
उतावली या हड़बड़ी न करने का भाव, संतोष।
चित्त में आवेश या उद्वेग न उत्पन्न होने का भाव।
धाऊँगा, दौड़ूँगा, तेजी से जाऊँगा।
उ.—(क) करिहौं, नहिं बिलंब कछू अब, उठि रावन सन्मुख ह्यौ धैहौं —९-१५७। (ख) देखि स्वरूप रहि न सकिहौं रथ तैं धैहों धर धाइ—२४८५।
उ.—पहिले की चढ़ि रह्यौ स्याम रँग छूटत नहिं देख्यौ धोई—३१४८।
जो धो डाली गयी हो, स्वचछ।
धोकर छिलका उतारी हुई (दाल)।
धुली हुई उरद या मूँग की दाल।
उ.—तेल लगाइ कियौ रूचि-मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए—१-५२।
मुहा.- हाथ धोकर पीछे पड़ना— सब काम छोड़-छाड़कर पीछे लग जाना, पूरी शक्ति से या सब ओर से निश्चिंत होकर परेशान करने में प्रवृत्त होना।
अनुचित रूप से अधिकार कर लेना।
किसी चीज को कस कर पकड़ना।
उ.—डारि न दियो कमल-कर तें गिरि दबि मरते ब्रजवासी—१६५०।
गुहा—दबी आवाज—१. बहुत मंद आवाज। २. बिना जोर दिये कही हुई बात। दबी जबान ले कहना— (१) भय आदि के कारण अस्पष्ट रूप से कुछ कहना। (२) बिना जोर दिये कहना।
मुहा.- दबे-दबाये रहना— चुपचाप रहना, अधीन रहना। दबे पाँव (पैर) चलना— ऐसे चलना कि आवाज न हो।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
उ.— आजु सखी अरूनोदय मेरे नैनन धोख भयौ। की हरि आजु पंथ यहि गौने कीधौं स्याम जलद उनयौ—१६६६।
मुहा.- धोखा खाना— ठगा जाना।
धोखा देना— (१) भ्रम या भुलावे में डालना, छलना। (२) विश्वासघात करना। (३) वियोग, मृत्यु द्वारा दुख देना।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
भ्रम, भ्रांति, भूल, मिथ्या प्रतीति।
मुहा.- धोखा खाना— कुछ का कुछ समझना।
धोखा पड़ना— भूल-चूक या भ्रम होना।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
भ्रम में डालने की असत् या मायामय वस्तु।
मुहा.- धोखा खड़ा करना (रचना)— भ्रम में डालने या भुलावा देने के लिए माया का आडंबर खड़ा करना।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
हानि या अनिष्ट की संभावना।
मुहा.- धोखा उठाना— भ्रम या असावधानी से हानि उठाना या कष्ट सहना।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
संशय, कुछ का कुछ होने की आशंका।
मुहा.- धोखा पड़ना— सोचा कुछ हो, पर होना कुछ और।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
मुहा.- धोखा लगना— कमी या कसर होना।
धोखा लगाना— कमी या कसर करना।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
खेत में पक्षियों को डराने-भगाने के लिए खड़ा किया जानेवाला पुतला।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
फलवाले पेड़ों पर रस्सी से बाँधी गयी लकड़ी जिससे ‘खटखट’ शब्द करके चिड़ियों को भगाया जाता है, खटखटा।
(सं. धूकत = धूर्त्तता, हिं. धोखा)
‘धोखा’ का विभक्ति संयोग के उपयुक्त रुप।
मुहा.- धोखे की टट्टी— (१) वह परदा या ओट जिसके पीछे छिपकर शिकार खेला जाता है। (२) भ्रम में डालनेवाली चीज। (३) निरर्थक या सारहीन वस्तु। (४) भ्रम, भ्रांति। असत धारणा। उ.— आसंन देइ बहुत करि बिनती सुत धोखे तव बुद्धि हेराई— १० उ. ११३। (२)जानकारी के अभाव या अज्ञान में।
उ.—नील पाट पिरोइ मनि गन फनिग धोखै जाइ—१०-१७०।
अज्ञान या जानकारी के अभाव में।
मुहा.- धोखैं ही धोखैं— अज्ञानता की स्थिति में, भ्रम या असावधानी की दशा में। उ.— धोखै ही धोखैं डहकायौ। समुझि न परी, बिषय-रस गीध्यौ, हरि-हीरा घर माँज गँवायौ— १-३२६।
उ.—लियौ न नाम कबहुँ धोखै हूँ सूरदास पछितायौ—२-३०।
एक वस्त्र जो पुरुष कमर के नीचे का अंग और स्त्रियाँ सारा शरीर ढकने के लिए पहनती हैं।
मुहा.- धोती बाँधना— (१) धोती पहनना। (२) कमर कसकर तैयार होना।
धोती ढीली करना— डरकर भागना।
धोती ढीली होना— भयभीत होना।
योग की एक क्रिया जिसमें कपड़े की एक लंबी धज्जी मुँह से निगलते है।
पानी से साफ करना, पखारना।
मुहा.- (किसी चीज से) हाथ धोना— (उस चीज को) गँवा बैठना।
धोना-धाना—धोकर सफाई करने की क्रिया।
मुहा.- धोब पड़ना— धोया जाना।
बड़ा, श्रेष्ठ या महान व्यक्ति।
उ.—अपराधी मतिहीन नाथ हौं चूक परी नीज धोरैं।
धोता है, (पानी से) स्वच्छ करता है, पखारता है।
उ.—(क) त्रियाचरित मतिमंत न समुझत, उठि प्रक्षालि मुख धोवत—९-३१। (ख) नृपति रजक अंबर नृप धोवत—२५७४।
वह घाट जहाँ धोबी कपड़े धोते हों।
मुहा.- धोबी का कुत्ता— निकम्मा या व्यर्थ का व्यक्ति, व्यर्थ इधर-उधर धूमनेवाला व्यक्ति।
धोबी का छैला— (१) मँगनी की या पराईं चीज लेनेवाला। (२) मँगनी की या पराई चीज पर घमंड करने या इतरानेवाला।
उ.—सूरदास हरि कृपा-बारि सौं कलिमल धोय बहावै।
उ.—साधन मंत्र जंत्र उद्यम बल यह ,सब डारौ धोय। जोकछु लिखि राखि नँदनंदन मेटि सकै नहिं कोय।
उ.—धोयौ चाहत कीच भरौ पट, जल सौं रुचि नहिं मानौं—१-१९४।
वह पानी जिससे कोई चीज धोयी गयी हो।
धोता है, पखारता है, प्रक्षालन करता है।
उ.— इतनक मुख माखन लपटान्यौ, डरनि आँसुवनि धोवै—३४७।
(सं. अथवा, हिं. दँव, दहुँ)
संशयात्मक प्रश्नों के साथ प्रायः प्रयुक्त एक अव्यय, न जाने, कौन जाने, कह नहीं सकते।
उ.— (क) कलानिधान सकल गुन सागर गुरू धौं कहा पढ़ाए हो ? —१-७। (ख) काकी तिनकौं उपमा दीजै, देह धरे धौं कोइ—९-४५।
(सं. अथवा, हिं. दँव, दहुँ)
उ.— गुनत सुदमा जात मनहिं मन चीन्हैंगे धौं नाहीं।
(सं. अथवा, हिं. दँव, दहुँ)
उ.— (क) भुवन चोदह खुरनि खूँदति. सु धौं कहाँ समाइ —१-५६। (ख) यह गति भई सूर की ऐसी स्याम मिलैं धौं कैसे—१-२९३। (ग) कहत बनाइ दीप की बतियाँ कैसैं धौं हम नासत—२-२५।
(सं. अथवा, हिं. दँव, दहुँ)
(सं. अथवा, हिं. दँव, दहुँ)
उ.— (क) को करि सकै बराबरि मेरी सो धौं मोहिं बताउ—१-१४५। (ख) अब धौं कहो, कौन दर जाऊँ—१-१६५। (ग) कहि धौं सुक, कहा अब कीजै, आपुन भए भिखारि—८-१४।
आग सुलगाने के लिए भाथी से निकाला गया हवा का झोंक्रा।
आग बढ़ाने के लिए भाथी से हवा का झोंका पहुँचाना।
आग फूँकने की नली या भाथी।
मुहा.- धौंकनी लगना— साँस फूलना।
धबराहट, हैरानी, व्याकुलता।
मुहा.- धौंसपट्टी में आना— भुलावे में आना।
मुहा.- धौंसा देना (बजाना)। चढ़ाई का डंका बजाना या घोषणा करना।
धमकी या घुड़की देने के लिए, डराने-धमकाने के लिए।
उ.—राजा बड़े, बात यह समझी, तुमको हम पै धौंसि पठायौ।
झाँसापट्टी या धोका देनेवाला।
सना हुआ, भरा हुआ, नहाया हुआ।
उ.—(क) धूरि धौत तन, अंजन नैननि, चलत लटपटी चाल—१०-११४। (ख) धूसरि धूरि धौत तनु मंडित मानि जसोदा लेत उछंगना।
[हिं. दबना + एला (प्रत्य.)]
[हिं. दबना + ऐल (प्रत्य.)]
तुलना या लड़ाई में अपने सामने न ठहरने देना।
योग में शरीर को भीतर बाहर से शुद्ध करने की क्रिया।
एक तरह का पंडुक नामक पक्षी।
भवन का खंभेसा ऊँचा भाग जिस पर भीतरी सीढ़ियों द्वारा चढ़ते है, ऊँची अटारी, धरहरा, बुर्ज, मीनार।
उ.— जीवन जन्म अल्प सपनौ सौ, समुझि देखि मन माहीं। बादर-छाँह, धूम-धौराहर, जैसे थिर न रहाहीं—१-३१९।
उ.— (क) बाँह उठाइ काजरी-धौरी गैयनि टेरि बुलावत—१०-११७। (ख) बाँह उचाइ काल्हि की नाइ धौरी धेनु बुलावहु—१०-१७९।
रथ या गाड़ी खीचनेवाला बैल।
उ.— धौलागिरि मानौ धातु चली बहि—२४१९।
उ.— जातैं ये परगट भए आइ। ताकौं तू मन मैं निज ध्याइ—४-५।
उ.—द्रुपद-सुता समेत सब भाई। उत्तर दिसा गए हरि ध्याई—१-२८८।
ध्यान करूँ, स्मरण करूँ, कामना करूँ, ध्यान में लाऊँ।
उ.—स्याम-बल-राम बिनु दूसरे देव कौं, स्वप्न हूँ माहिं नहिं हृदय ल्याऊँ। यहै जप, यहै तप, यहै मम नेम-ब्रत, यहै मम प्रेम, फल यहै ध्याऊँ—१-१६७।
उ.—जब गज गह्यौ ग्राह जल-भीतर, तब हरि कौं उर ध्याए (हो)—१-७।
ध्यान किया या विचारा हुआ।
मुहा.- धौल धूत— पक्का धूर्त्त या काँइयाँ। उ.— धूत धौल लंपट जैसे हरि तैसे और न जानै— ३४६६।
धौलधक्कड़, धौल-धक्का, धौल-धप्पड़, धौल-धप्पा
धौलधक्कड़, धौल-धक्का, धौल-धप्पड़, धौल-धप्पा
अंतःकरण में किसी वस्तु या व्यक्ति को उपस्थित करने की क्रिया या भाव।
मुहा.- ध्यान में डूबना (मग्न होना)— इतनी एकाग्रता से ध्यान करना कि अन्य विषयों का बोधन रहे।
ध्यान धरना— रूप आदि का स्मरण करना।
ध्यान में लगना— स्मरण करके मग्न हो जाना।
मुहा.- ध्यान आंना— विचार उत्पन्न होना।
ध्यान जमना— विचार स्थिर होना।
ध्यान बँधना— विचार का बहुत देर तक बना रहना।
ध्यान रखना— न भूलना।
ध्यान लगाना— बराबर ख्याल बना रहना।
मुहा.- ध्यान में न लाना— (१) चिंता या पर-बाह न करना। (२) सोच-विचार न करना।
मुहा.- ध्यान जमना— चित्त का एकाग्र होना।
ध्यान जाना— बोध होना।
ध्यान दिलाना— दिखाना, जताना या सुझाना।
ध्यान देना— ख्याल करना, गौर करना।
ध्यान पर चढ़ना- चित्त से न हटना।
ध्यान बँटना— चित्त का एकाग्र न रहना।
ध्यान बँटाना— चित्त को एकाग्र न रहने देना।
ध्यान बँधना— चित्त एकाग्र होना।
ध्यान लगना— चित्त एकाग्र होना।
ध्यान लगाना— चित्त एकाग्र करना।
मुहा.— ध्यान पर चढ़ना (में आना)— समझ म आना।
ध्यान में जमना— विश्वास के रूप में मन में स्थिर होना।
मुहा.- ध्यान आना— याद होना।
ध्यान दिलाना— याद दिलाना।
ध्यान पर चढ़ना— याद होना।
ध्यान रखना— याद रखना।
ध्यान रहना— याद रहना।
ध्यान से उतरना— याद न रहना, भूल जाना।
चित्त को एकाग्र करके किसी ओर लगाना।
मुहा.- ध्यान छूटना— चित्त की एकाग्रता न रहना। उ.— देखन लग्यौ सुत मृतक जान। रूदन करत छूटयौ रिषि ध्यान।
ध्यान धरना— चित्त को एकाग्र करके आराध्य की ओर लगाना।
योग जिसका प्रधान-अंग ध्यान हो।
उ.—दर्वा रंभा कृष्णा ध्याना मैना नैना रूप—५८ ०।
जिसकी प्राप्ति ध्यान से हो।
उ.— सूर प्रभु-चरन चित चेति चेतन करत, ब्रह्म-शिव-सेस-सुक-सनक ध्यायौ—१-११९। (ख) मैं तो एक पुरूष कौं ध्यायौ। अरू एकहिं सौं चित्त लगायौ—४-३। (ग) तैं गोविन्द चरन नहिं ध्यायौ—४-९।
उ.— हरिहिं मित्र-बिंदा चित ध्यायौ। हरि तहँ जाइ बिलंब न लायौ।
उ.— (क) नारदादि सनकादि महामुनि, सुमिरत मन-बच ध्यावत—९-११३। (ख) सनक संकर जाहि ध्यावत निगम अबरन बरन।
उ.—कमल-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव कौ ध्यावै—१-१६८।
उ.—एक निरंतर ध्यावै ज्ञानी। पुरूष पुरातन सो निर्बानी—१०-३।
जिसका ध्यान या स्मरण किया जाय।
उ.— तीन पैग बसुधा दै मोकौं, तहाँ रचौं ध्रमसारी—८-१४।
एक ही स्थान पर अचल या स्थिर रहनेवाला।
सदा एक ही अवस्था में रहनेवाला।
राजा उत्तानपाद का सुनीति के गर्भ से उत्पन्न पुत्र जो छोटी ही अवस्था में विमाता सुरूचि द्वारा तिरस्कृत होकर तप करने चला गया था। बालक की इस दृढ़ता से भगवान शीघ्र ही प्रसन्न हुए और उन्होंने वर दिया— सब लोकों ओर नक्षत्रों से ऊपर तुम सदा अचल भाव से स्थित रहोगे।
उ.—ध्रुवहिं अभै पद दियौ मुरारी—१-२७।
पृथ्वी के वे दोनों सिरे जिनसे अक्षरेखा जाती मानी गयी है।
नाश करने की क्रिया या भाव।
एक तारा जो सदा ध्रुव अर्थात् मेरू के ऊपर रहता है।
विवाह की एक प्रथा जिसमें वर-वधू के संबंध की दीर्घता की कामना से ध्रुवतारा दिखाया जाता है।
वह लोक जिसमें ध्रुव स्थित है।
इंद्रियों को वश में रखना, इंद्रिय-दमन।
उ.—गो.कह्यौ हरि बैकुंठ सिधारे। सम-दम उनहीं संग पधारे—१—१-२९०।
मुहा.- दम अटकना (उखड़ना, खिंचना)— (मरते समय) साँस रुकना।
दम उलटना— (१) जी घब-राना। (२) साँस न लिया जा सकना।
दम खाना (लेना)— सुस्ताना।
दम खींचना— (१) चुप रहना। (२) साँस खींचना।
दम घुटना— हवा की कमी से साँस न ले सकना।
दम घोटना— (१) साँस न लेने देना। (२) बहुत कष्ट देना।
दम घोटकर मारना— (१) गला दबाकर मारना। (२) बहुत कष्ट देना।
दम चढ़ना (फूलना)— (१) दौड़-धूप या मेंहनत से हाँफना। (२) दमे का दौरा होना।
दम चुराना— जान बूज कर साँस रोकना।
दम टूटना— (१) प्राण निकलना। (२) इतना हाँफने लगना कि दौड़-धूप के काम ज्यादा न कर सकना।
दम तोड़ना— प्राण निकलना।
दम पचना- अधिक परिक्षम करने पर भी न हाँफना।
दम भरना— (१) किसी के प्रति अधिक प्रेम या मित्रता रखने की साभिमान चर्चा करना। (२) मेंहनत या दौड़-धूप से थक जाना।
दम मारना— (१) विश्राम करना। (२) बोलना। (३) बीच में दखल देना।
दम साधना— (१) साँस रोकने का अभ्यास करना। (२) मौन रहना।
साँस के साथ नशीली चीज का धुआँ खींचना।
मुहा.- दम मारना (लगाना)— नशीली चीज का धुआँ साँस के साथ खींचना।
दम लगना— नशीली चीज का धुआँ खींचा जाना।
साँस खींचकर जोर से बाहर फूँकना।
मुहा.- दम मारना— झाड़-फूँक करना।
समय जो एक बार साँस लेने में लगे, पल।
मुहा.- दम के दम— क्षण भर।
दम पर दम— हरदम, बराबर।
मुहा.- दम उलजना— जी घबराना।
दम खाना— परेशान करना।
दम खुश्क होना (फना होना, सूखना)— बहुत भयभीत होना।
दम चुराना— बहाने से जान बचाना।
नाक में दम आना— बहुत परेशान होना।
नाक में दम करना— बहुत तंग करना।
दम निकलना— मृत्यु होना।
दम पर आ बनना— आफत या हैरान होना।
दम फड़क उठना (जाना)— रूप, रंग या गुण को देखकर चित्त बहुत प्रसन्न होना।
दम फड़कना— बेचैनी होना।
दम में दम आना— भय या घबराहट होना।
दम में दम रहना (होना)— (१) शरीर में प्राण रहना। (२) हिम्मत बँधी होना।
मुहा.- (किसी का) दम गनीमत होना— (किसी के) जीवित रहने तक ही भले काम होना।
संगीत में किसी स्वर का देर तक उच्चारण होना।
उ.— (क) द्रुपदकुमार होइ रथ आगै धनुष गहौ तुम बान। ध्वजा बैठि हनुमत गल गाजै प्रभु हाँकै रथ यान—१-२७५। (ख) प्रति-प्रति गृह तोरन ध्वजा धूप—९-१६६। (ग) उड़त ध्वजा तनु सुरति बिसारे अंचल नहीं सँभारति—२५६२।
उ.—(क) किंकिनि सब्द चलत ध्वनि रूनझुन ठुमुक-ठुमुक गृह आवै—२५४९। (ख) गाये जु गीत पुनीत बहु बिधि बेद रवि सुंदर ध्वनी—१७०३।
वह काव्य जिसमें व्यंग्यार्थ की प्रधानता हो।
काव्य जिसमें व्यंग्य की प्रधानता हो।
वह अर्थ जिसका बोध शब्द की अभिधा शक्ति से न होकर व्यंजना से हो।
देवनागरी वर्णमाला का बीसवाँ और तवर्ग का पाँचवाँ व्यंजन वर्ण जिसका उच्चारण स्थान दंत है।
जिसके शरीर पर वस्त्र न हो।
जो ढका हुआ न हो, खुला हुआ।
कपड़े खुलवाकर ली जानेवाली तलाशी।
[हिं. नंगा + बुंगा (अनु.)]
[हिं. नंगा + बुंगा (अनु.)]
सब कुछ ले लेने की क्रिया।
उ.— पारथ-तिय कुरूराज सभा मैं बोलि करन चहै नंगी। स्त्रवन सुनत करूना-सरिता भए, बाढ़यौ बसन उमंगी—१-२१।
वसुदेव का मदिरा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र।
गोकुल में बसनेवाल गोपों के नायक जिनके यहाँ श्रीकृष्ण का बाल्यकाल बीता था। यशोदा इनकी स्त्री थी। बालक कृष्ण को ये पुत्रवत् मानते थे और स्वभावतः उनके प्रति इनके हृदय में अगाध वात्सल्य था।
राजा नंद जिन्होंने श्रीकृष्ण का पालन किया था।
नंद जी के पुत्र, श्रीकृष्ण।
वृंदावन के निकट एक गाँव जहाँ नदं आदि गोप रहते थे।
उ.—हिलिमिलि चले सकल ब्रजवासी नंदगांव फिरि आयो—सारा. ५३३।
अयोध्या के निकट एक गाँव जहाँ चित्रकूट से लौटकर भरत चौदह वर्ष रहे थे।
नंद के प्यारे नंदजी के प्यारे-दुलारे पुत्र, नंदजी के यहाँ रहते समय का श्रीकृष्ण का बाल-रूप।
उ.— कोमल कर गोबर्धन धारयौ जब हुते नंददुलारे—१-२५।
नंदनँद, नंदनंद, नंद-नंदन, नदनंदन
नंदजी द्वारा पुत्र के समान पाले जानेवाले बालक श्रीकृष्ण।
उ.—पारथ-सीस सोधि अष्टाकुल, तब जदुनंदन ल्याए—१-२९।
कामाख्या देश का एक पर्वत।
नंदन वन के स्वामी, इंद्र।
एक तरह की माला जो श्रीकृष्ण को विशेष प्रिय थी।
उ.—साँचैहिं सुत भयौ नँदनायक कै हौं नाहीं बौरावति—१०-२३।
उ.—देखि नृप तमकि हरि चमकि तहाँई गये दमकि लीन्हों गिरहबाज जैसे—२६१५।
[हिं. दाम +ड़ा (प्रत्य.)]
पैसे का चौथा या आठवाँ भाग।
मुहा.- दमड़ी का तीन— इतना सस्ता कि कोई न खरीदे, इतना अधिक कि कोई न पूछ़े।
जो जीवनी-शक्ति से पूर्ण हो।
जो (वस्तु या व्यक्ति) अधिक समय तक हवा या साँस रोक सके।
उ.—मित्र-बिंदा यक नृपति नंदनी ताकौ माधव ब्याये—सारा. ६५५।
उ.— नंद जू के बारे कान्ह छाँड़ि, दै मथनियाँ। बार बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ—१०-१४५।
उ.—(क) देखत प्रगट धरयौ गोबर्धन चकित भए नँदरैया—९६५। (ख) लकुटनि टेकि सबन मिलि राख्यौ अरू बाबा नँदरैया—१०७१।
उ.— आँगन खेलै नद के नंदा—१०-११७।
प्रतिपदा, षष्ठी या एकादशी तिथि।
उ. कहि राधा किन हार चोरायौ।¨ ¨ ¨ ¨ ¨। सुखमा सीला अवधा नंदा बृंदा जमुना सारि—१५८०।
हेमकूट पर्वत का एक तीर्थ।
प्रतिपदा, षष्ठी या एकादशी तिथि।
अयोध्या के निकट एक गाँव जहाँ श्रीराम के वनवास की अवधि भर भरत जी तप करते रहे।
अर्जुन का रथ जो उन्हें अग्निदेव से मिला था।
वसिष्ठ की कामधेनु जिसकी राजा दिलीप ने सेवा की थी।
शिव के एक प्रकार के गण। इनके तीन वर्ग हैं—कनकनंदी, गिरिनंदी और शिवनंदी।
उ. दच्छ देखि अतिसय दुख तए।¨¨¨। जज्ञ भाग याकौं नहिं दीजै।¨¨¨। नंदी-हृदय भयौ सुनि ताप। दियौ ब्राह्मननि कौं तिन साप—४-५।
उ. — (क) इहि राजस को को न बिगोयौ—१-५४। (ख) पवन न भई पताका अंबर भई न रथ के अंग—२५४०।
कि नहीं, या नहीं (प्रश्नवाचक वाक्य-प्रयोग)।
उ.— ताको पूजि बहुरि सिर नइयो अरू कीजो परनाम—सारा. ५५३।
उ.— (क) मातु-पिता भैया मिले नई रूचि नई पहिचानि—१-३२५। (ख) सूर के प्रभू की नित्य लीला नई सकै कहि कौन यह कछुक गाई—८-१६।
उ.—नई न करन कहत प्रभु तुम हौ सदा गरीब-निवाज—१-१०८।
उ.— दियौ तुरत नउआ (नौआ) को घुरकी—७-१८०।
उ.— (क) इहाँ अपसगुन होत नित नए—१-२८६। (ख) सिर दधि-माखन के माट गावत गीत नए—१०-२४। (ग) चाड़ सरै पहिचानत नाहीं प्रीतम करत नए—२९९३। (घ) इहाँ अटक अति प्रेम पुरातन वहाँ अति नेह नए—३१४१।
उ.— ह्यै आधीन पंच ते न्यारे कुल लज्जा न नए री— पृ. ३३५ (४३)।
वह नायिका जो लज्जा या भय से नायक के पास न जाना चाहती हो।
जिसकी दुर्दशा या अप्रतिष्ठा हुई हो।
जिसकी दुर्दशा या अप्रतिष्ठा हुई हो।
जमीन पर नाक रगड़ने की क्रिया।
जिसकी अप्रतिष्ठा या दुर्दशा हुई हो।
उ.— कच खुबि आँधारे काजर नकटी पहिरै बेसरि—३०२६।
मुहा.- दम देना— झाँसा देना। दम खाना— धोखा खाना।
दम झाँसा-छल-कपट। दम दिलासा (पट्टी) झूठी-आशा। छल-कपट। दमबाज-धोखा देने या फुसलाने वाला।
उ.—मिटि गइ चमक-दमक अँग अँग की, मति अरु ट्टष्टि हिरानी—१-३०५।
उ.—(क) दमकति दूध-दँतुलिया बिहँ-सत, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर—१०-९३। (ख) दमकति दूध-दँतुरियाँ रूरी—१०-११९। (ग) दमकति दोउ दूध की दतियाँ, जगमग-जगमग होति री—१०-१३६।
चमकने-दमकने का भाव या क्रिया।
उ.—दामिनि की दमकनि बूँदनि की झमकनि सेज की तलफ कैसे जीजियत माई है—२८२७।
उ.—प्रगटति हँसत दँतुलि, मनु सीपज दमकि दुरे दल ऒलै री—१०-१३७।
नाक में पहनने का फूल या कील नामक गहना।
दीवार में चोरी के उद्देश्य से लगाई गयी सेंध।
नाक में दम, हैरानी, परेशानी।
उ.— उतै देखि धावै, इत आवै, अचरज पावै, सूर सुरलोक ब्रजलोक एक ह्वै रह्यौ। बिवस ह्वै हार मानी, आपु आयौ नकबानी, देखि गोप-मंडली कमंडली चितै रह्यौ—४८४।
नाक में पहनने की बेसर या छोटी नथ।
नाक में पहनने का लटकना या मोती।
असली के अनुरूप वस्तु बनाने की क्रिया।
मुहा.- नकतोड़े उठाना— नखरे सहना।
नकतोड़े तोड़ना— बहुत ज्यादा नखरे दिखाना या अनखना कर काम करना।
(रूपया-पैसा) जो तैयार हो और तुरंत काम में लाया जा सके।
तुरंत रूपया-पैसा देकर या लेकर।
लाँघना, फाँदना, उल्लंघन करना।
हास्यास्पद, धजा या आकृति।
हास्यपूर्ण बातचीत या चुटकुला।
लेख आदि की नकल करके जीविका कमानेवाला।
उ.—मानुष-जनम पोत नकली ज्यौं, मानत भजन-बिना बिस्तार —१-४१।
(हिं. नाक + सं. क्षीर=जल)
नाक में दम करना, बहुत परेशान करना।
चेहरा छिपाने का कपड़ा या जाली।
‘न’ या ‘नहीं’ का बोधक शब्द या वाक्य।
अस्वीकृति-सूचक (उत्तर या कथन)
नाक से बोलना या उच्चारण करना।
दुखी, परेशान या तंग करना।
बादशाही दरबारी चारण जो किसी को उपाधि या पद मिलने या किसी के आने की घोषणा करते हैं।
उ.— आसा कैं सिंहासन बैठ्यौ, -छत्रदंभ सिर तान्यौ। अपजस अति नकीब कहि टेर्यौ, सब सिर आयसु मान्यौ—१-१४१।
कड़खा गानेवाला पुरूष, कड़खैत।
(सं. नक्र + पुट, प्रा. नक्कुउड़)
(सं. नक्र + पुट, प्रा. नक्कुउड़)
राजा पांडु के चौथे पुत्र जो उनकी पत्नी माद्री के गर्भ से अश्वनीकुमारों द्वारा उत्पन्न हुए थे। इनका नाम तंत्रिपाल भी था। ये बहुत सुंदर थे। पशु-चिकित्सा का इन्हें अच्छा ज्ञान था। इनका विवार चेदिराज की कन्या करेणमती से हुआ था जिससे इनके निरमित्र नामक पुत्र था। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इन्होंने पश्चिम प्रदेशों पर विजय पायी थी।
[हिं. नाक + उवा (प्रत्य.)]
[हिं. नाक + उवा (प्रत्य.)]
भालू या ऊँट की नाक में बँधी रस्सी या लगाम।
मुहा.- किसी की नकेल हाथ में होना— किसी की कोर दबी होने या स्वार्थ अटका रहने के कारण वश या अधिकार में होना।
मुहा.- नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है— (१) बहुत शोरगुल या भीड़-भाड़ में कही हुई बात कौन सुनता है ? (२) बड़े लोगों के बीच में छोटों की बात कौन सुनता है ?
मुहा.- नक्कारा बजाते फिरना— (किसी बात को) चारों ओर कहते फिरना।
नक्कारा बजाकर— खुल्लम-खुल्ला, डंके की चोट पर।
नक्कारा हो जाना— बहुत फूल जाना, फूलकर नागाड़ा हो जाना।
धातु, पत्थर आदि पर बेल-बूटे बनाना।
जिस पर बेलबूटे का या कारीगरी का काम किया गया हो।
अपनी प्रतिष्ठा का बहुत अधिक ध्यान करनेवाला।
सबसे अलग और उलटा काम करनेवाला।
जिसे रात में दिखायी न दे।
उ.— नीरहू तै न्यारै कीनौ चक्र नक्र सीस दीनौ, देवकी के प्यारे लाल ऐंचि लाए थल मैं—८-५।
मुहा.- मन में नक्श करना— किसी बात का निश्चय करना।
मन में नक्श कराना— कोई बात मन में बैठाना।
नक्श होना— पूरा पूरा निश्चय हो जाना।
कलम-कूची आदि से बनाया गया बेल-बूटे, फूल पत्ती आदि का काम।
एक ऋषि जिनके यहाँ दमयंती जन्मी थी।
वस्तु या पदार्थ का स्वरूप।
तारा या तारों का समूह जो चंद्रमा के पथ में पड़ता हो। इनकी संख्या हमारे यहाँ सत्ताइस मानी गयी है; यथा—अश्वनी, भरणी। कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराघा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तरासाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद, रेवती। इनके अतिरिक्त एक ‘अभिजित’ नक्षत्र और था जो अब ‘पूर्वाषाढ़ा’ के ही अंतर्गत माना जाता है।
भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में अलग-अलग पदार्थों का दान।
नक्षत्रों के चलने का मार्ग।
नक्षत्रों का स्वामी, चंद्रमा।
चंद्रलोक से ऊपर का लोक जिसमें नक्षत्र हैं।
भाग्यशाली, जो अच्छे नक्षत्र में जन्मा हो।
नाखून गड़ने से बन जानेवाला चिन्ह।
स्त्री के शरीर पर का चिन्ह जो पुरूष के नाखून से बन जाय।
उ.—नखत उत्तरा आप बिचारेउ कालकंस को आयउ—सारा. ५२५।
उ.— कर कपोल भुज धरि जंघा पर लेखनि भाई नखन की रेखनि—२७२२।
उ.—नरहरि रूप धरयौ करूनाकर, छिनक माहिं उर नखनि बिदारयौ—१-१४।
नाखून की छटा, सुंदरता या ज्योति।
उ.— सूर स्याम-पद-नख-प्रकास बिनु, क्यौं करि तिमिर नसावै —१-४८।
कश्यप की एक पत्नी जो बादलों की माता थी।
नखरा करने की क्रिया या भाव।
नाखून की खरोट, नाखून गड़ने का चिन्ह।
नाखूनों पर मेहदी या महावर से बनाया जानेवाला गोल या चंद्राकार चिन्ह।
जिसके नाखूनों में विष हो।
पैर के नख से सिर तक शरीर के सारे अंग।
मुहा.- नखशिर से— (१) सिर से पैर तक। (२) बहुत बुरी तरह से, फूल-फूटकर, रोम-रोम से। उ.— (क) मनसिज मन हरन हँसि साँवरो सुकुमार रासि नखसिख अंग-अंग निरखि सोभा की सींव नखीरी— २४६२। (ख) संकर कौ मन हरयौ कामिनी, सेज छाँड़ि भू सोयौ। चारू मोहिनी आइ आँध कियौ, तब नख-शिख तैं रोयो— १-४३।
[सं. नख + हिं. (प्रत्य.)]
उ.— बूड़तहिं ब्रज राखि लीन्हौ, नखहिं गिरिवर धरन—१-२०२।
नखों से शरीर फाड़े डालनेवाले हिंसक पशु।
नाखून से चीरने-फाड़नेवाला।
नाखून से नोचना या खरोचना।
उ.—कान्ह बलि जाऊँ, ऐसी आरि न कीजै।¨ ¨ ¨ ¨। धरत धरनि पर लोटे, माता को चीर नखोटै—१०-१८३।
उ.— सुंदर आखर नग पै नगपति धन कहि लजत न गात—सा. ६२।
पत्थर या शीशे का रंगीन टुकड़ा, नगीना।
उ.— इते मान यह सूर महा सठ, हरि-नग बदलि, बिषय-बिष आनत—१-११४।
पर्वत से उत्पन्न होनेवाली।
पिंगल शास्त्र का एक ‘गण’ जिसमें तीनों अक्षर लघु होते हैं, जैसे ‘कमल’।
(गोवर्द्धन) पर्वत को उठानेवाले श्रीकृष्ण।
उ.— दुस्सा-सन गहि केस द्रौपदी, नगन करन कौ ल्यायौ—१-१०९।
उ.— रवि तनया कह्यौ मोहि बिबाहि। कच कह्यौ तू गुरू नगनी आहि।
उ.— चतुरानन बल सँभारि मेघनाद आयौ। मानौ घन पावस मैं नगपति है छायौ—९-९६।
उ.— सुंदर आखर नग पै नगपति घन कहि लजत न गात— सा. ६२।
(पर्वतों के पंख काटनेवाले) इंद्र।
जो पर्वत से उत्पन्न हुआ हो।
उ.— (क) जनम साहिबी करत गयौ। काया-नगर बड़ी गुंजाइस नाहिन कछु बढ़यौ—१-६४। (ख) नगर नीक औ काम बीच ते गोग्रह अंत भरे— सा. ८०।
[हिं. नगर + आई (प्रत्य.)]
नागरिकता, नागरिकों की शिष्टता-विशिष्टता।
[हिं. नगर + आई (प्रत्य.)]
उ.— चारौं नैन भए इक ठाहर, मन हीं मन दुहुँ रूचि उपजाई। सूरदास स्वामी रति-नागर, नागरि देखि गई नगराई—७२०।
उ.—इमि दमि दुष्ट देव-द्विज मोचन, लंक बिभीषन, तुमकौं दैहौं—९-१५७।
दम लगाने या कश लगानेवाला।
उ.— मथुरा नगरी कृष्न राजा, सूर मनहिं बधावना—५७७।
इन्द्र जिन्होंने पर्वतों के पंख काट डाले थे।
[सं. नग = पर्वत + ई (प्रत्य.)]
[सं. नग = पर्वत + ई (प्रत्य.)]
[सं. नग = पर्वत + ई (प्रत्य.)]
मुहा.- नगीना सा— बहुत छोटा और सुन्दर।
जिसके शरीर पर वस्त्र न हो।
नीचता, निर्लज्जता, दुष्टता।
उ.— प्रेम सहित पग बाँधि घूँघरू, सक्यौ न अंग नचाइ—१-१५५।
नाचने को प्रवृत्त किया, दूसरे को नचाया।
उ.—सो मूरति तैं अपनैं आँगन, चुटकी दै जु नचाई—३६३।
दूसरे को नाचने में प्रवृत्त करना।
किसी से बार-बार उठने बैठने या इधर-उधर जाने का काम कराना।
मुहा.- नाच नचाना— (१) बार-बार उठने-बैठने का काम कराना। (२) उठा-बैठा कर या दौड़ा-घुमाकर परेशान करना।
मुहा.- आँखें (नयन नेत्र) नचाना— चंचलता के साथ इधर उधर बार-बार देखना।
इधर-उधर दौड़ा-फिराकर हैरान करना।
नचाती है, नाचने को प्रेरित करती है।
उ.—जसुमति सुतहिं नचावई छबि देखति जिय तैं—१०-१३४।
उ.— चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात —१०-२१५।
उ. — हाथ नचावत आवति ग्वारिनि जीम करै किन थोरी—१०-२९३।
नाँघने में, आरपार जाने में, लाँधते हैं।
उ.— घर-आँगन अति चलत सुगम भए, देहरि अँटकावत। गिरि गिरि परत, जात नहिं उलँघी, अति स्त्रम होत नघावत—१०-१२५।
उ.— नचत हैं सारंग सुंदर करत सब्द अनेक—सा. ९४।
घुमाते हैं, चक्कर खिलाते हैं, दौड़ाते फिराते हैं।
उ.— कबहूँ सधे अस्व चढ़ि आपुन नाना भाँति नचावत—सारा. १९०।
नचाती हैं, नाचने को प्रेरित करती है।
उ.— चुटकी देतिं नचावहीं सुत जानि नन्हैया—१०-११६।
मुहा.- नाच नचावहुगे— हैरान परेशान करोगे। उ.— तब चरित्र हमहीं देखैगी जैसे नाच नचावहुगे— १९७८।
मुहा.- नाच नचावै— हैरान-परेशान करनेवाले काम करावे। उ.— माया नटी लकुटि कर लीन्हे कोटिक नाच नचावै— १-४२।
वाजश्रवा ऋषि का पुत्र जिसने मृत्यु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त क्रिया था।
उ.— सूरदास प्रभु हरि-सुमिरन बिनु जोगी-कपि ज्यौं नचिबौ—१-५९।
[हिं. नाचना + औहाँ (प्रत्य.)]
[हिं. नाचना + औहाँ (प्रत्य.)]
कुदृष्टि जो किसी सुंदर वस्तु या प्राणी पर पड़कर उसको हानि पहुँचा सके।
मुहा.- नजर उतारना- टोना-टुटका करके कुदृष्टि का कुप्रभाव दूर करना।
नजर खाना (खा जाना)— कुदृष्टि का कुफल भुगतना।
नजर जलाना (जुड़ना)— कुदृष्टि का कुप्रभाव दूर करना।
नजर लगाना— कुदृष्टि डालकर हानि पहुँचाना।
अधीनस्थ कर्मचारी या प्रजावर्ग की ओर से भेंट में दिया जानेवाला धन आदि।
[अ. नजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
[अ. नजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
[अ. नजर + हिं. ना (प्रत्य.)]
जिस पर कड़ी निगरानी रखी जाय।
उघरि नच्यौ चाहत हौं—नंगे नाचना चाहता हूँ, निर्लज्जता का व्यवहार करना चाहता हूँ।
उ.—हौं तौ पतित सात पीढ़िनि कौ, पतितै ह्यै निस्तरिहौं। अब हौं उघरि नच्य़ौ चाहत हौं, तुम्हैं बिरद बिन करिहौं—१-१३४।
स्थिर न रहा, चंचलता दिखायी।
उ.— तिहारे आगै बहुत नच्यौ। निसि दिन दीनदयाल, देवमनि, बहु विधि रूप रच्यौ—१-१७४।
चन्द्रमा के पथ में पड़नेवाले तारे जिनके विभिन्न नाम रखे गये हैं।
उ.—रामदूत दीपत नछत्र में पुरी धनद रूचि रूचि तम हारी—सा. ९८।
[सं. नक्षत्र + ई (प्रत्य.)]
जिसका जन्म अच्छे नक्षत्र में हुआ हो, भाग्यवान।
मुहा.- नजर आना— दिखायी देना।
नजर करना— देखना।
नजर पर चढ़ना— अच्छा लगना, भा जाना।
नजर पढ़ना— दिखायी पड़ना।
नजर फेंकना— (१) दूर तक देखना। (२) सरसरी तौर से देखना।
नजर बाँधना— जादू-टोने से कुछ का कुछ दिखाना।
मुहा.- नजर रखना— दया दृष्टि बनाये रखना।
जो ऐसे स्थान पर निगरानी में रखा जाय जहाँ कोई आ-जा न सके।
जादू-टोने से दृष्टि बाँधकर किया जानेवाला खेल।
किसी पर कड़ी निगरानी रखने का भाव।
[हिं. नजर + आनना (प्रत्य.)]
[हिं. नजर + आनना (प्रत्य.)]
नजर लगाना, कुदृष्टि डालना।
नजर लग जाना, कुदृष्टि के कुप्रभाव में आ जाना।
उ.— मरन अवस्था जब नजिकाई।
[हिं. नजदीक + आना (प्रत्य.)]
एक जाति जिसका काम गाना-बजाना है।
भेंट या उपहार-स्वरूप दी जानेवाली वस्तु।
कुदृष्टि जो किसी सुंदर वस्तु या प्राणी को हानि पहुँचा सके।
विदर्भ देश के राजा भीमसेन की पुत्री जो नल को ब्याही थी।
गवैये के साथ स्वर साधनेवाला उसका सहायक।
उ.— नटगागर पट पै तब ही ते लटक रह्यौ मन मेरौ—सा. ४२।
एक नीच जाति जो रस्सी और बाँस पर खेल-तमाशे और कसरत करके पेट पालती है।
उ.— मन मेरैं नट के नायक ज्यौं नितहीं नाच नचायौ—१-२०५।
उ.—लज्जित मनमथ निरखि बिमल छबि, रसिक रंग भौंहनि की मटकनि। मोहनलाल, छबीलौ गिरिधर, सूरदास बलि नागर नटकनि—६१८।
मुकरने की क्रिया या भाव, अस्वीकृति।
उ.— त्यों नटनी कर लिए लकुटिया कपि ज्यौं नाच नचावै—३०८८।
अभिनय करती है, स्वाँग भरती है।
उ.—एक ग्वालि नटवति बहु लीला एक कर्म गुन गावति।
बहुत छोटी फाँस जो निकल न सके।
उ.—माया नटी लकुटि कर लीन्हे कोटिक नाच नचावै—१-४२।
नाट्य-कला में बहुत दक्ष व्यक्ति।
उ.— कटि तट पट पियरो नटवर बपु साधे सुख रूख जीके—सा. १००।
श्रीकृष्ण जो नाट्य कला के आचार्य विख्यात है।
उ.— सूरदास प्रभु मुरलि बजावत, ब्रज आवत नटवर गोपाल—४८२।
उ.—बेष धरि-धरि हरयौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ। जैसैं नटवा लोभ-कारन करत स्वाँग बनाइ—१-४५।
वह स्थान जहाँ नाटक का अभिनय हो।
चुभे हुए काँटे का वह भाग जो टूटकर शरीर में ही रह गया हो।
वाण की गाँसी जो टूटकर शरीर में रह जाय।
नाक में पहनने की छोटी नथ।
उ.—(क) मोतिनि सहित नासिका नथुनी कंठ-कमल-दल-माल की—१०-१०५। (ख) सारँग-सुत-छबि बिन नथुनी रस-बिंदु बिना अधिकात—सा. ५२।
पुल्लिंगवाची नामवाली नदी।
पशुओं का रँभाना या बँवाना।
नत होने की क्रिया या भाव।
प्रणाम करनेवाले का पालक, प्रणतपाल, शरणपाल।
(लज्जा, संकोच,विनय आदि से) जिसका मस्तक झुका हुआ हो।
(लज्जा, संकोच,विनय आदि से) जिसका मस्तक झुका हुआ हो।
उ.— तजि अभिमान, राम कहि बौरै, नतरूक ज्वाला तचिबौ—१-५९।
नथ नामक गहना जो नाक में पहना जाता है और हिंदुओं में सौभाग्य का चिन्ह समझा जाता है।
उ.—(क) नासा नथ मुकुता की सोभा रह्यौ अधर तट जाइ—१०७९। (ख) भाल तिलक अंजन चख नासा बेसरि नथ में फूली—३२२१।
मुहा.- नथना फुलाना— क्रोध करना।
नथना फूलना— क्रोध आना।
नाथा जाना, एक सूत्र में बँधना।
मंजूर न करना, इनकार करना।
उ.— (क) ननदी तौ न दियै बिनु गारी नैंकहु रहति—१४९२। (ख) जिय परी ग्रंथ कौन छोरै निकट ननँद न सास— पृ. ३४५ (५७)।
[हिं. ननद + ओई (प्रत्य.)]
उ.—असुरनि बिस्वरूप सौं कह्यौ। भली भई तू सुर गुरू भयौ। तुव ननसाल माहिं हम आहिं। आहुति हमैं देत क्यौं नाहिं—६-५।
मुहा.- नन्हा सा— बहुत छोटा।
पूरे हाथ या पंजे का आघात, थप्पड़।
उ.— बारि बाँधे वीर चहुँधा देखत ही बज्र सम थाप बल बुंभ दीन्हो २५६०।
मुहा- किसी का थाप देना- कसम रखाना।
प्रतिष्ठित या स्थापित करने की क्रिया।
उ.—(क) नाना वाक्य धर्म थापन को तिमिर हरन भुव भारन— सारा. ३१८। (ख) कर्मकद थापन को प्रकटे पृश्नि गर्भ अवतार-सारा. ३२१।
बैठाकर, जमाकर या स्थापित करके रखना।
किसी गीली चीज को हाथ से पीट-पाट कर कोई आकार देना।
उ.— (क) श्री बृंदाबन कमलनयन। मनु आयौ है मदन गुन गुदर दयन—२४८४। (ख) त्रिबिध पवन मन हरष दयन —२३८७।
दुखी के प्रति करुणा या सहानुभूति का भाव।
दक्षप्रजापति की एक कन्या जो धर्म को ब्याही थी।
[सं. नद्ध = बँधा हुआ + ना (प्रत्य.)]
मुहा.- काम में नधना— काम में जुतना।
[सं. नद्ध = बँधा हुआ + ना (प्रत्य.)]
[सं. नद्ध = बँधा हुआ + ना (प्रत्य.)]
बहुत छोटी अवस्था का जब संसार का ज्ञान न हो।
उ.— इक नदिया इक नार कहावत मैलौ नीर भरौ। जब मिलि गए तब एक बरन ह्यै, गंगा नाम परयौ —१-२२०।
मुहा.- नदी-नाव-संयोग— ऐसा संयोग जो संयोग से ही हो जाय और बार-बार न हो।
किसी बहनेवाली चीज का प्रवाह।
मुहा.- नब्ज चलना— शरीर में प्राण होना।
नब्ज छूटना (न रहना)— शरीर में प्राण न रहना।
संख्या जो सौ से दस कम हो।
उ.— चलति नभ चितै नहिं तकति धरनी—६९८।
मजदूर का एक दिन का काम या वेतन।
उ.— (क) होतौ नफा साधु की संगति मूल गाँठि नहिं टरतौ—१-२९७। (ख) सुनहु सूर हमसौं हठ माँड़ति कौन नफा करि लैहौ—१११८। (ग) गुप्त प्रीति काहे न करी हरि सौं प्रगट किए कछु नफा बढ़ैहै—११९२। (घ) लै आए हौ नफा जानि कै सबै बस्तु अकरी—३१०४। (ङ) प्रेम बनिज कीन्हौं हुतौ नेह नफा जिय जानी—३१४९।
उ.—तहीं दीजै मुर परैना नफो तुम कछु खाहु—३००३।
[हिं. नन्हा + ई (प्रत्य.)]
[हिं. नन्हा + ई (प्रत्य.)]
उ.— (क) ब्रज परगन-सिकदार महर तू ताकी करत नन्हाई—३२९। (ख) नंद महर की करै नन्हाई—३९१।
[हिं. नन्हा + ऐया (प्रत्य.)]
उ.— (क) चुटकी देहिं नचावहीं सुत जानि नन्हैया—१०-११६। (ख) पाँच बरस कौ मेरौ नन्हैया अचरज तेरी बात—१०-२५७। (ग) तृनावर्त पूतना पछारी, तब अति रहे नन्हैया—४२८।
[हिं. नाप + आई (प्रत्य.)]
नापने का काम, भाव या वेतन।
वह जो न स्त्री हो न पुरूष, क्लीव।
[हिं. नाप + उआ (प्रत्य.)]
कोई वस्तु नापने का पात्र।
आकाश में विचरनेवाला, आकाशगामी।
मुहा.- नमक अदा करना— स्वामी के उपकार का बदला चुकाना।
(किसी का) नमक खाना— (किसी का) दिया खाना।
नमक-मिर्च मिलाना (लगाना)— (बात को) बढ़ा-घटाकर कहना।
नमक फूट-कर निकलना— उपकार न मानने का दैवी दंड मिलना।
नमक से अदा होना— स्वामी के उपकार से उऋण होना।
कटे पर नमक छिड़कना- दुखी को और जलाना।
नमक का सहारा— (१) बहुत थोड़ी सहायता। (२) बहुत छोड़ा लाभ।
जो किसी का अन्न खाकर उसी को हानि पहुँचावे, कृतघ्न।
[हिं. नमक हराम + ई (प्रत्य.)]
नमकहराम होने का भाव, कृतघ्नता।
जो किसी का नमक खाकर बदले में उसका भला भी करे।
नमकहलाल होने का भाव, स्वामिभक्ति।
((सं. दया +करण=करनेवाले )
उ.—दीनबंधु, दयाकरन, असरन-सरन, मंत्र यह तिनहिं निज मुख सुनायौ—८-८,
किसी के प्रति कृपा, करुणा या सहानुभूति का भाव।
[हिं. दया + ना (प्रत्य.)]
नम्र, जो झुकता हो, विनयी।
उ.—पर्वत बहुत नमनि करि पूजा यह बिनती करवाये—सारा. ६१७।
प्रणाम या नमस्कार करना, नम्रता दिखाना।
नमस्कार या प्रणाम करने के उपयुक्त।
जो झुक सके या झुकाया जा सके।
उ.—नमस्कार मेरो जदुपति सौं कहियौ गहिकै पाय—३४९४।
जो नमस्कार के योग्य हो, पूज्य।
उ.—नमो नमस्ते बारंबार—१० उ.-१३०।
झुकाकर, नम्रता प्रदर्शित करके।
उ.—हरष अक्रूर हृदय नमाइ—२५५६।
उ.—जनु सिर पर ससि जानि अधोमुख, धुकत नलिनि नमि नाल—१०-११४।
उ.— (क) भू भृत सीस नमित जो गर्बगत, सींच्यौ नीर—९-२६। (ख) नमित मुख इमि अधर सूचत, सकुच मैं कछु रोष—३५०।
नमस्कार है, प्रणाम करता हूँ, नमता हूँ।
उ.—(क) नमो नमो हे कृपानिधान —। (ख) नमो-नमो भक्तनि-भयहारी —२-३२। (ग) हरि-हर संकर नमो-नमो—१०-१७१।
उ.—(क) रंभापति-सुत-सत्रु-पिता ज्य नयौ अहि अंत न तोलै—सा. ४३। (ख) सुछ बसन नय उर के रस सें मिले लाल मुख पोछो—सा. ८३।
नर्तकों का नायक या मुखिया।
उ.— (क) नयन ठहरात नहिं बहत अति तेज सी—१४८७। (ख) काहे को लेति नयन जल भरि भरि नयन भरे ते कैसे सूल टरैगो—२८७०।
मुहा.- निरखि नयन भरि— भली भाति दे ले, नेत्रों में छबि भर ले। उ.— निरखि सरूप बिबेक-नयन भरि सुख तै नहिं और कछू अब—।
मुहा.- नया लिखना— पुराना हिसाब साफ करके नया चालू करना।
नया-नवेला—नवयुवक, नौजवान।
जो थोड़े ही समय से ज्ञात हुआ हो।
जो पहले व्यवहार में न आया हो, कोरा।
जिसका आरंभ फिर से या हाल ही में हुआ हो।
[हिं. नया + पन (प्रत्य.)]
मुहा.- लिखत नयौ— पुराना हिसाब साफ या बंद करके नया चालू करना। उ.— बरस दिवस करि होत पुरातन फिरि फिरि लिखत नयौ— १-२६८।
झुक गया, मिट गया, जाता रहा।
उ.—अंबर हरत द्रौपदी राखी, ब्रह्म-इन्द्र कौ मान नयौ—१-२६।
उ.—सूरदास-प्रभु-रूप चकित भए पंथचलत नर बाम—९-४४।
जो पुरूष वर्ग का प्राणी हो।
उ.—नहीं अस जनम बारंबार। पुर-बलौ धौं पुन्य प्रगट्यौ, लह्यौ नर-अवतार—१-८८।
गेहूँ आदि की बाल का डंठल।
वह स्थान जहाँ पापी पाप का फल भोगने जाता है।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी जब घर का सारा कूड़ा-करकट साफ किया जाता है।
उ.— गढ़वै भयौ नरकपति मोसौं दीन्हे रहत किवार—१-१४१।।
एक दैत्य जो बाराह भगवान के पृथ्वी के साथ गमन करने पर जन्मा था। जब यह प्राग्ज्योतिषपुर का राजा बना तब इसने बहुत अत्याचार किया। अंत में श्रीकृष्ण ने इसको मारकर सोलह हजार बंदिनी युवतियों का उद्धार किया था।
उ.—नरकासुर को मारि स्यामघन सोरह सहस त्रिय लाये—सारा. ६५८।
एक पौधा जिसके फूल के साथ कवि आँख की उपमा देते हैं।
नरगिस के सफेद फूल के रंग का।
नर के गुण-युक्त होने का भाव।
जो पुरूष स्त्रियों सा कार्य करे।
उ.—दयानिधि तेरी गति लखि न परै—१-१०४।
उ.—कहा रही अति क्रोध हिये धरि नेक न दया दयायनी—२२७५।
वह जिस पर दया करना उचित हो, जो वस्तु दया के योग्य हो।
उ.—का न कियौ जनहित जदुराई। प्रथम कह्यौ जो बचन दयारत, तिहिं बस गोकुल गाय चराई—१-६।
दयालु दया-कार्य में लगे रहनेवाला।
दयापूर्ण, दया से पसीजा हुआ।
नर-नारायण नामक दो ऋषि जो विष्णु के अवतार माने जाते हैं।
अर्जुन की स्त्री द्रौपदी।
उ.— ब्रह्मा कह्यो, सुनौ नर-नाह। तुमसौं नृप जग मैं अब नाह—९-४।
उ.—(क) नरपति एक पुरूरवा भयौ—९-२। (ख) नरपति ब्रह्म-अंस सुख रूप—४१२।
वह जो मनुष्य होकर भी पशु का आचरण करे।
मनुष्य- शरीर, मनुष्य-जन्म, मनुष्य-योनि।
उ.—नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं, जम की मार सो खैहै—१-८६।
[हिं. नरम + आना (प्रत्य.)]
[हिं. नरम + आना (प्रत्य.)]
उ.— माथ नाइ करि जोरि दोउ कर रहे बोलि लीन्हों निकट बचन नरमे—२४६६।
एक यज्ञ जिसमें मनुष्य के मांस की आहु ति दी जाती थी।
उ.— बालि छाँड़ि कै सूर हमारे अब नरवाई को लुनै—३१५८।
सवारी जिसे मनुष्य खींचता या ढोता हो।
एक जल-जंतु जिसका निचला शरीर मनुष्य-सा और ऊपरी बाघ-सा होता हैं।
(हिं. नर=बड़ा + सिघा=सींग का बाजा)
तुरही की तरह का एक बाजा जो फूँककर बजाया जाता है।
पिछले परसों के पहले और अगले परसों के बाद का दिन।
उ.—फटि तब खंभ भयौ द्वै फारि। निकसे हरि नरहरि-बपु धारि—७-२।
विष्णु का चौथा अवतार जिसका आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का था।
रावण का एक पुत्र जो अंगद के हाथ से मारा गया था।
पिछले परसों के पहले और अगले परसों के बाद का दिन।
रामचंद्र जी की सेना का एक बंदर जो विश्वकर्मा का पुत्र माना जाता है और जो ऋतुध्वज ऋषि के शाप-वश घृताची के गर्भ से जन्मा था।प्रसिद्धि है कि नील की सहायता से समुद्र पर पुल इसी ने बाँधा था।
निषघ देश के राजा वीरसेन का पुत्र जिसका विवाह दमयंती से हुआ था।
कुबेर का पुत्र, जिसे नारद ने उस समय अर्जुन वृक्ष हो जाने का शाप दिया था जब वह मदमाता होकर गंगा में स्त्रियों के साथ विहार कर रहा था। रामायण के अनुसार, एक बार रंभा अप्सरा को नलकुबेर के यहाँ जाते देखकर, रावण उठा ले गया था। इस पर रावण को उसने शाप दिया कि किसी भी स्त्री के साथ बलात्कार करने पर तू तुरंत मर जायगा। सूरदास ने भी इसी कथा की ओर संकेत किया है।
उ.— त्रिजटी सीता पै चलि आई। मन मैं सोच न करि तू माता, यह कहि कै समुझाइ। नलकूबर कौ साप रावनहिं, तो पर बल न बसाई—।
रामेश्वर के निकटवर्ती समुद्र पर बना पुल जो श्री राम ने नल-नील से बनवाया था।
नर्मदा नदी से निकले हुए अंडाकार शिवलिंग।
नर्मसचिव, नर्मसुहृद, नर्मसहचर
‘नाल’ या ‘नालक’ नामक एक प्राचीन अस्त्र।
वह स्थान जहाँ कमल अधिक हों।
दया करने का भाव, दयालु होने की प्रवृत्ति।
(हिं. दया +आवना, आवने, आवनो)
जो दीन हो और वस्तुतः दया का पात्र हो।
वीर-रस के अंतर्गत गिनाये गये चार प्रकार के वीरों में एक जो दया करने में अपने प्राण भी लगा दे।
उ.—आँखि, नाक, मुख, मूल दुवार। मूत्र, स्त्रौन नव पुर को द्वार—४-१२।
नौ-रात्र में पूजनीय नौ देवियाँ - कुमारिका, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, काली, चंद्रिका, शांभवी, दुर्गा और सुभद्रा।
भूमि के नौ विभाग; यथा-भरत, इलावृत, किंपुरूष, भद्र, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य और कुश।
उ.— तिनमैं नव नवखँड अधिकारी। नव जोगेस्वर ब्रह्म विचारी —५-२।
फलित ज्योतिष में सूर्य, चन्द्र, मंगल,बुध, गुरू, शुक्र, शनि, राहु और केतु ग्रह।
उ.— लेति बलाइ करति नवछावरि बलि भुजदंड कनक अति त्रासी।
उ.—बहुरि गोकुल काहे को आवत भावत नवजोबनिया—२८७९।
राजा के तीन क्षत्रों में एक।
कमल का पत्ता जो उसके केसर के पास होता है।
नौ दुर्गाएँ जिनकी नवरात्र में नौ दिनों तक क्रमशः पूजा होती है; यथा - शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदा।
शरीर के नौ द्वार, यथा- दो नेत्र, दो कान, दो नथुने, मुख, गुदा, लिंग या भग।
शरीर के नौ अंग; यथा-दो नेत्र, दो कान, दो हाथ, दो पैर,और एक नाक।
नौ प्रकार की भक्ति; यथा— श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, बंदन, सख्य, दास्य और आत्मनिवेदन।
कुबेरे के नौ प्रकार के रत्न, पद्य, महापद्य, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद नील और वर्च्च।
उ.— अतिहिं ए बाल हैं भोजन नवनीति के जानि तिन्हे लीन्हें जात दनुज पासा—२५५१।
उ.— नवम मास पुनि बिनती करै—३१३।
उ.— सूरदास जुग भरि बीतत छिनु। हरि नवरंग कुरंग पीव बिनु।
नये ढंग की, नवेली, नयी शोभावाली।
[हिं. नवरंग + ई (प्रत्य.)]
उ.— नाइनि बोलहु नवरंगी (हो), ल्याउ महावर बेग। लाख टका अरू झूमका (देहु), सारी दाइ कौं नेग—१०-४०।
[हिं. नवरंग + ई (प्रत्य.)]
नित्य नये आनंद करनेवाला, रँगीला।
उ.— (क) ऐसे हैं त्रिभंगी नव-रंगी सुखदाई री—१४६४। (ख) गोपिन नाम धरयौ नवरंगी—३६७५।
मोती, पन्ना, मानिक, गोमेद, हीरा, मूँगा, लहसुनिया, पद्मराग या पुखराज और नीलम।
गले का हार जिसमें नौ तरह के रत्न हों।
काव्य के नौ रस— श्रृंगार, करूण, हास्य, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत।
नौ दिन तक होनेवाला एक यज्ञ।
नवदुर्गा का व्रत, घटस्थापन और पूजन जो चैत्र शुक्ला और आश्विन शुक्ला प्रतिपदा से नवमी तक, वर्ष में दो बार होता है।
उ— प्रात भयौ जागौ गोपाल। नवल सुंदरी आई, बोलत तुमहिं सबै ब्रजबाल—१०-२०६।
उ.— (क) ना जानौं करिहौ ऽब कहा तुम नागर नवल हरी—१-१३०। (ख) नागर नवल कुँवर बर सुंदर, मारग जात लेत मन जोइ—१०-२१०।
उ.—(क) पवन सधावन भवन छोढ़ावन नवल रिसाल पठायौ—२९९९। (ख) एकादस लैं मिलौ बेगहूँ जानहु नवल रसाल—सा. २९।
उ.— नित नवला नवसत साजि कै अरू वह भावक राखी—२८७६।
उ.— स्यामा कामा चतुरा नवला प्रमदा सुमदा नारि —१५८०।
नौ प्रकार के विष— वत्सनाभ, हारिद्रक, सक्तुक, प्रदीपन, सौराष्ट्रिक, श्रृंगक, काल-कूट, हलाहल और ब्रम्हपुत्र।
नौ शक्तियाँ— प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नंदिनी, सुप्रभा, विजया और सर्वसिद्धिदा।
जिसने नयी तरह की शिक्षा पायी हो।
जो हाल ही में शिक्षा पा चुका हो।
(सं. नव + हिं. सत =सप्त, सात)
नौ और सात, सोलह श्रृंगार।
उ.— (क) नवसत साजि भई सब ठाढ़ी को छबि सकै बखानी— पृ. ३४३ (२३)। (ख) नित नवला नवसत साजि कै अरू वह भावक राखी—२८७६।
नौ और सात, सोलह श्रृंगार।
उ.— कंठसिरी दुलरी तिलरी को और हार इक नवसर।
उ.— सूर स्याम स्यामा नवसर मिलि रीझे नंदकुमार।
जो गिनती में नौ के स्थान पर हो, नौवाँ, नवम्।
उ.— काया हरि कैं काम न आई। ¨ ¨ ¨। चरन-कमल सुंदर जहँ हरि के, क्यौंहुँ न जाति नवाई —१-२९५।
उ.— यह मति आप कहाँ धौं पाई। आजु सुनी यह बात नवाई।
झुकाये, विनय दिखायी, अधीनता स्वीकार की।
उ.— पुनि प्रहलाद राज बैठाए। सब असुरनि मिलि सीस नवाए—७-२।
नया आया हुआ, जो अभी ही आया हो, नवागंतुक।
बादशाह का प्रतिनिधि शासक।
प्रतिनिधि शासकों की उपाधि।
बहुत ठाट-बाट से रहनेवाला।
ठसक-लापरवाही दिखाने में ही शान समझनेवाला।
[हिं. नवाब + ई (प्रत्य.)]
[हिं. नवाब + ई (प्रत्य.)]
[हिं. नवाब + ई (प्रत्य.)]
[हिं. नवाब + ई (प्रत्य.)]
अमीरों का तत्व-हीन ठाठ-बाट।
उ.— (क) राजा उठि कै सीस नवायौ—१-३४३। (ख) उठि कै सबहिनि माथ नवायौ—४-५।
उ.—मुरली तऊ गुपालहिं भावति।¨ ¨ ¨। अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नार नवावति—६५४।
अधीन करता है, नीचा दिखाता है, (गर्व) चूर करता है।
उ.—बालक-बच्छ ब्रह्म हरि लै गयौ, ताकौ गर्व नवावै—४८२।
उ.—माया नटी लकुटि कर लीन्हे, कोटिक नाच नचावै। दर-दर लोभ लागि लिये डोलति, नाना स्वाँग बनावै (करावै)—१-४२।
मुहा.- दर दर मारे मारे फिरना— वीपत्ति या दुर्दिन में आश्रय या सहायता की आशा से द्वार-द्वार या स्थान-स्थान पर फिरना।
हाल में ही अस्तित्व में आया हुआ, जिसने हाल ही में उन्नति की हो।
उ.— नव सुत नवौ खंड नृप भए—५-२।
मादक द्रव्य-पान की स्थिति।
मुहा.- नशा उतरना— नशे का प्रभाव न रह जाना।
नशा किरकिरा हो जाना— किसी अप्रिय बात या घटना के कारण नशे का आनंद न उठा सकना।
नशा चढ़ना— मादक द्रव्य-सेवन से नशा होना।
(आँखों)में नशा छाना— नशे की मस्ती होना।
नशा जमना— खूब नशा होना।
नशा टूटना— नशा उतरना।
नशा हिरन होना— किसी असंभावित घटना या प्रसंग से नशा जमने के पहले ही उतर जाना।
मादक द्रव्य जिसके सेवन से नशा हो।
मादक द्रव्य-सेवन का आयोजन या प्रबंध, नशे का सामान।
धन, विद्या, रूप आदि का गर्व या घमंड।
मुहा.- नशा उतारना— घमंड दूर करना, गर्व चूर करना।
उ.— (क) जाति महति पति जाइ न मेरी अरू परलोक नशाई री—१२०३। (ख) प्रात के समै ज्यौं भानु के उदय तें भलै उदय होइ जात उडगन नशाई—१०३०।
उ.— नवल आपुन बनी नवेली नगर रही खेलाइ—२६७६।
उ.—तिनको ध्यान धरैं निसिबासर औरहिं नवै न सीस—३१३०।
नवविवाहिता स्त्री, नववधू।
वह नायिका जो लज्जा-भय से नायक के पास न जाना चाहती हो।
नये सिरे से होनेवाली उन्नति, पुनः उत्थान।
उ.—दृष्टि न दई रोम रोमनि प्रति इतनहिं कला नशानी—१३२१।
उ.— आगम सुख उपचारबिरह ज्वर बासर ताप नशावते—२७३५।
[फ़ा. नशा + ईला प्रत्य.)]
[फ़ा. नशा + ईला प्रत्य.)]
जिसे नशीला द्रव्य सेवन करने की आदत हो।
छोटा तेज चाकू जो चीर फाड़ के काम आता है।
फोड़ा आदि चीरने-फाड़ने की क्रिया या भाव।
शरीर तंतु, शरीर की रक्तवाहिनी नलियों का लच्छा।
मुहा.- नस चढ़ना (भड़कना)— नस का अपने स्थान से इधर-उधर हटकर पीड़ा करना।
नस-नस ढीली होना— (१) थकावट आना। (२) पस्त होना।
नस नस में— सारे शरीर में।
नस-नस फड़क उठना— बहुत प्रसन्नता या उमंग होना।
पत्ते-पत्तियों का रेशा या तंतु।
गद्य, ‘प्रोज़’ (अँग्रेजी)।
उ.— सूर रहि कौ भजन करि लै, जनम-मरन नसाइ—१-३१५।
अंग याकौ मैं देउँ नसाई—१०-५७।
उ.— सूर धन्य व्रज जन्म लियौ हरि, धरनी की आपदा नसाई—३८३।
उ.— जानत नाहिं जगतगुरू माधौ, इहिं आए आपदा नसानी—१०-२५८।
उ.— सूरदास द्विज दीन सुदामा, तिहिं दारिद्र नसायौ—१-२०।
मिटाते हो, नष्ट करते या कराते हो, दूर करते-कराते हो।
उ.—(क) कत अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा। सूर पतित तबहीं उठिहै, प्रभु जब हँसि दैहौ बीरा—१-१३४। (ख) सूर स्याम नागर नारिनि कौं बासर-बिरह नसावत—४७९।
नाश करो, नष्ट करो, दूर करो।
उ.— मोकौं मुख दिखराइ कै, त्रय ताप नसावहु—१०-२३२।
दूर करे या करता है, नसता है।
उ.— अस्मय-तन गौतम-तिया कौ साप नसावै—१-४। (ख) सूर स्याम-पद-नख-प्रकास बिनु, क्यौं करि तिमिर नसावै—१-४८।
नष्ट होते हैं, नसाते हैं।
उ.— अतिहिं मगन महा मधुर रस, रसन मध्य समाहिं। पदुम-बास सुगंध-सीतल, लेत पाप नसाहिं—१-३३८।
उ.— (क) क्रम क्रम करि सबकी गति होइ। मेरौ भक्त नसै नहिं कोइ—३-१३। (ख) दृस्यमान बिनास सब होइ। साच्छी ब्यापक, नसै न सोइ—५-२।
उ.— सीपज माल स्याम-उर सोहै, बिच बघ-नह छबि पावै री—१३९।
विवाह की एक रीति जिसमें वर के नाखून-बाल कटाकर मेंहदी आदि लगायी जाती है।
पुरवट खींचने की मोटी रस्सी।
उ.—उग्रसेन कौं राज दयौ—१-२६।
सिंचाई आदि के लिए बनाया गया जलमार्ग।
उ.— राम अरू जादवन सुभट ताके हते रूधिर के नहर सरिता बहाई।
स्नान कराना, स्नान करने को प्रवृत्त करना।
नख की रेखा या निशान। नखाग्र भाग।
उ.—नहसुत कील कपाट सुलछन दै दृग द्वार अगोट—२२१८।
उ.—उर बघनहाँ, कंठ कठुला, झँडूले बार, बेनी लटकन मसि-बुंदा मुनि-मनहर—१०-१५१।
उ.—दुहुँ तब तीरथ माहिं नहाए—३-१३।
पर्व जब स्नान का महत्व हो।
(सं. स्नान, प्रा. हारण, बुं. हनाना)
(सं. स्नान, प्रा. हारण, बुं. हनाना)
नहाती हैं, स्नान करती हैं।
उ.—प्रातहिं तैं इक जाम नहाहीं। नेम धर्म हीं मैं दिन जाहीं—८९९।
पैर की छोटी उँगली का एक गहना।
अस्वीकृति या निषेध-सूचक एक अव्यय।
अयोध्या का इक्ष्वाकुवंशी एक राजा जो अंबरीष का पुत्र और ययाति का पिता था। एक बार इंद्रासन मिलने पर यह इंद्राणी पर मोहित हो गया। बुलाने पर इंद्राणी ने कहलाया-सप्तर्षियों से पालकी उठवाकर हमारे यहाँ आओ तो तुम्हारी इच्छा पूरी हो सकती है। पालकी लेकर सप्तर्षि धीरे-धीरे चल रहे थे। नहुष ने अधीर होकर ‘सर्प सर्प’ (जल्दी चलने को) कहा। अगस्त्य मुनि ने इस पर नहुष को सर्प हो जाने का शाप दे दिया। युधिष्ठिर ने इस योनि से उसका उद्धार किया।
उ.— (क) गहि तन हिरनकसिप कौ चीरौं, फारि उदर तिहिं रूधिर नहैहौं—७-५। (ख) सूरदास है साखि जमुन-जल सौंह देहु जु नहैहौं—४१२।
खिन्नता, मनहूसी, उदासीनता।
उ.—अब झूठौ अभिमान करति है, झुकति जौ उनकैं नाउँ—९-७७।
उ.— (क) तुम यह बात अचंभौ भाषत, नाँगी आवहु नारी—७८८। (ख) जल भीतर जुवती सब नाँगी—७९९।
आवरणरहित, खुला हुआ, जो ढका न हो।
उ.— (क) सोई हरि काँधे कामरि, काछ किए नाँगे पाइनि, गाइनि टहल करैं—४५३। (ख) सूरदास प्रभु नाँगे पायँन दिनप्रति गैया चारीं —३४१२।
उ.—अर्द्ध-निसा नृप नाँगौ धायौ—९-२।
हर्ष के मारे स्थिर न रहो, हृदयोल्लास के कारण अंगों को गति दो।
उ.—सूरदास प्रभु हित कै सुमिरौ जौ, तौ आनँद करिकै नाँचौ—१८३।
आशीर्वादात्मक पद्य जो नाटका भिनय के आरंभ में सूत्रधार कहता है।
एक श्राद्ध (वृद्धिश्राद्ध) जो पुत्रजन्म, विवाह आदि मंगल अवसरों पर किया जाता है।
उ.— तब न्हाइ नंद भए ठाढ़े अरू कुस हाथ धरे। नांदीमुख पितर पुजाइ, अंतर सोच हरे—१०-२४।
उ.— कुमति तासु रानी कौ नाँव—४-१२।
उ.— मेरो मन पिय-जीव बसत है, पिय को जीव मो मैं नाँह—१६७४।
उ.— (क) बयरोचन-सुत को सुभाव संग देखि परत ना मित्त—सा. ८६। (ख) ना जानौं करिहौ अब कहा तुम—१-१३०। (ग) जसुमति बिकल भई छिन कल ना—१०५४।
उ.— सुकदेव हरि चरननि सिर नाइ। राजा सौं बोलौ या भाइ—२-१।
उ.— गहि असुर धाइ, पुनि नाइ निज जंघ पर, नखनि सौं उदर डारयौ बिदारी—७-६।
उ.—कनक थार भरि खीर धरी लै, तापर घृत-मधु नाइ—१०-८९।
उ.— तुम बिनु ब्रजबासी ऐसे जीवैं ज्यौं करिया बिन नाइ—२८४४।
उ.— करि करि समाधान नीकी बिधि मोहि को माथौ नाइहो—२९४२।
उ.— (क) रावन अरि कौ अनुज बिभीषन, ताकौं मिले भरत की नाईं—१-३। (ख) स्त्रम करत स्वान की नाई—१-१०३। (ग) भ्रमि आयौ कपि गुंजा की नाईं—१-१४७। (घ) बादत बड़े सूर की नाईं —२५९०।
उ.— आत अति बोल झोल तनु डारयौ अनल भँवर की नाई—३१७७।
उ.— सूर दीन प्रभु प्रगट-बिरद सुनि अजहुँ दयाल पतत सिर नाई—१-६।
उ.— मुख चुम्यौ, गहि कंठ लगायौ, बिष लपटयौ अस्तन मुख नाई—१०-५१।
छोड़कर, ऊपर से डालकर, मिलाकर।
उ.—अति प्यौसर सरस बनाई। तिहि सोंठ-मिरिचि रूचि नाई—१०-१८३।
उ.— तुम कृपालु, करूनानिधि, केसव, अधम उधारन नाउँ—१-१२८।
उ.— इंद्रहिं पेलि करी गिरि पूजा सलिल बरषि ब्रज नाउँ मिटावहि—९४७।
उ.— पतित-उधारन है हरि-नाउ—६-३।
उ.— दीरघ नाउ कागर की को देखौ चढ़ि जात—३२८२।
उ.— हरि, हरि-भक्तनि कौं सिर नाऊँ—१-२९०।
उ.— जानि लई मेरे जिय की उन गर्व-प्रहारन उनको नाऊँ—१६५४।
मुहा.- मुख नाए— मुख में डाले, खाये। उ.— गोबिंद गाढ़े दिन के मीत।¨¨¨¨। लाखा गृह पांडवनि उबारे, साक-पत्र मुख नाए— १-१३१।
मुहा.- नाक कटना— अप्रतिषिठा कराना।
नाक का बाल— बहुत धनिष्ठ मित्र या सहायक।
नाक घिसना— बहुत बिनती करना।
नाक चढ़ना— क्रोध आना।
नाक चढ़ाना- क्रोध करना। अरूचि दिखाना।
नाकों चने चबवाना- खूब तंग या हैरान करना।
नाक तक खाना- ठूँस-ठँसकर खाना।
नाक पकड़ते दम निकलना— बहुत ही दुबला होना।
माक पर मक्खी न बैठने देना- बहुत साफ तबियत का आदमी होना, बहुत साफ हिसाब किताब रखनेवाला। बहुत साफ-सुथरा रहना। दूसरे का जरा भी अहसान न लेना।
(किसी की) नाक पर सुपारी तोड़ना— बहुत तंग या हैरान करना।
नाक-भौं चढ़ना (सिकोड़ना)- अरूचि या अप्रसन्नत दिखाना। चिढ़ना और घिनाना।
नाक में दम रखना- बहुत बिनती करना।
नाक रगड़े का बच्चा— वह पुत्र जो देवताओं की बहुत पूजा-सेवा और मनौती करने पर हुआ हो।
नाकों आना— बहुत तंग या महीन आवाज में बोलना।
नाक में बोलना— नकियाना, बहुत महीन आवाज में बोलना।
नाक लगाकर बैठना- बड़ी इज्जतवाला बनना।
नाक सिकोड़ना— अरूचि दिखाना, घिनाना।
प्रतिष्ठा या शोभा की वस्तु।
मुहा.- नाक रख लेना— मान की रक्षा करना।
उ.—नाक निरै सुख-दुःख सूर नहिं, जिहिं की भजन प्रतीति—२-१२।
(सं. लंघन, हिं. लाँघना, नाँघना)
उछलकर पार करना, लाँघना, डाँकना।
(सं. लंघन, हिं. लाँघना, नाँघना)
तुच्छ बुद्धि, ओछी समझ का।
उ.—अपनो पेट दियो तैं उनको नाकबुद्धि तिय सबै कहै री।
स्वर्ग का स्वामी, इन्द्र।
चोट या आघात जिससे कोई चीज फट जाय या उसमें दरार पड़ जाय।
उ.—जे नखचंद्र भजन खल नाखत रमा हृदय जेहि परसत—१३४२।
उ.—प्रथम ऊधौ आनि दै हम सगुन डारै नाखि—३०४८
दियो नाखी—गिरा दिया, फेंक दिया, डाल दिया।
उ.—जब सुरपति ब्रज बोरन लीनो दियो क्यों न गिरि नाखी—२७३९
उ.—पाछे तैं सीय हरी बिधि मरजाद राखी। जो पै दसकंध बली रेख क्यौं न नाखी।
उ.—जो हरि-चरित ध्यान उर राखै। आनँद सदा दुखित-दुख नाखै—३९१।
हटा दिया, तोड़ दिया, दूर कर दिया, टाल दिया, मिटा दिया।
उ.—भारत में मेरौ प्रन राख्यौ। अपनौ कहयौ दूरि करि नाख्यौ—१-२७७।
नष्ट कर दिया, नाश कर दिया।
उ.—(क) आये स्याम महल ताही के नृपति महल सब नाख्यो—२६३४। (ख) मात-पिता हित प्रीति निगम पथ तजि दुख-सुख भ्रम नाख्यौ—३०१४।
कद्रू से उत्पन्न कश्यप की संतान जो पाताल में रहती है।
उ.—रोवैं बृषभ, तुरग अरु नाग—१-२८६।
कंस का कुबलयापीड़ हाथी जिसे बलराम और श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.—सूरदास प्रभु सुर सुखदायक मारयौ नाग पछारी—२५९४।
नाग-जाति की युवती जो बहुत सुन्दर मानी जाती है।
सावन सुदी पंचमी जब नाग-पूजन होता है।
सर्प नगरी भोगवती जो पाताल लोक में है।
जनमेजय का यज्ञ जिसमें नागों की आहुतियाँ देकर नाग जाति का विनाश किया गया था।
चतुर, सभ्य और सज्जन व्यक्ति।
गुजराती ब्राह्मणों की एक जाति।
नगर का सभ्य और शिष्ट व्यवहार।
उ.—नागरता की रासि किसोरी—२३१०।
उ.—नवनागर तबहीं पहिचाने नागरि नागरिताई—२२७५।
उ.—काम क्रोधऽरु लोभ मोह्यौ, ठग्यौ नागरि नारि—१-३०९।
उ.—नवल किसोर नवल नागरिया। अपनी भुजा स्याभ-भुज ऊपर, स्याम भुजा अपनैं उर धरिया—६८८।
उ.—नैननि झुकी सु मन मैं हँसी नागरी, उरहनौ देत, रुचि अधिक बाढ़ी—१०-३०७।
उ.—श्री मदन मोहन लाल सँग नागरी ब्रजबाल—६२३।
पाताल जहाँ कद्रू से उत्पन्न कश्यप के ‘नाग’ नामक पुत्र-रहते हैं।
नागेंद्र, नागेश, नागेश्वर
नागेंद्र, नागेश, नागेश्वर
नागेंद्र, नागेश, नागेश्वर
उ.—जान्यौ नहीं निसाचर कौ छल, नाघ्यौ धनुष-प्रकार—९-८२।
(सं. नृत्य, प्रा. णाच्य, अथवा सं. नाट्य)
उमंग या उल्लास के कारण सामान्य उछल-कूद-अथवा संगीत के ताल-स्वर के अनुसार अंगों की गति।
मुहा.- नाचकाछना— नाचने को तैयार होना। उ.— मैं अपनौ घूँघट छोरयौ तब लोक-लाज सब फटकि पछोरयौ।
नाच दिखाना— (१) किसी के सामने नाचना।(२) उछलना-कूदना। (३) विचित्र व्यवहार करना।
नाच नचाना— (१) मनचाहा काम करा लेना। (२) तंग, हैरान या परेशान करना।
नाच नचायौ— तंग या हैरान किया। उ.— इक कौ आनि ठेल पाँच। करूनामय कित जाउँ कृपानिधि, बहुत नचायौ नाच।
नाच नचावै— मनचाहा प्रचरण या व्यवहार करने पर विवश करें। उ.— इक मन अरू ज्ञानेंद्री पाँच। नर कौं सदा नचावैं नाच— १-१९६।
नाच नचावै— मनचाहा काम करने को विवश करती है। उ.— (क) माया नटी लकुटि कर लीन्हे कोटिक नाच नवावै— १-४२। (ख) जो कछु कुबिजा के मन भावै सौई नाच नचावै— ३४४१।
(सं. नृत्य, प्रा. णाच्य, अथवा सं. नाट्य)
(सं. नृत्य, प्रा. णाच्य, अथवा सं. नाट्य)
एक संप्रदाय के साधु जो नंगे रहते हैं।
सिद्ध साधु का समाधि स्थान, मकबरा, मजार।
मुहा.- दरगुजर करना— माफ करना, छोड़ देना।
जाने देना, क्षमा कर देना।
प्रयत्न करने को हाथ-पैर मारना।
इधर से उधर फिरते हैं, स्थिर नहीं रहते |
उ. ब्रह्मा-महादेव-सुर-सुरपति नाचत फिरत महा रस भोयौ—१-५४।
उमंग या उल्लास से अँगों को गति देना।
चक्कर काटना, घूमना-फिरना।
मुहा.- सिर पर नाचना— (१) घेरना, ग्रसना, प्रभाव डालना। (२) पास या निकट आना।
आँख के सामने नाचना— ध्यान में ज्यों का त्यों बना रहना।
दौड़ना-धूपना, घूमना-फिरना।
क्रोध में उछलना-कूदना और हाथ पैर पटकना।
विवश होकर, हारकर, लाचारी से।
उमंग या उल्लास में अंगों को गति दी।
नृत्य करने या थिरकने लगी।
चक्कर मारने या घूमने लगी।
मुहा.- सीस पर नाची— (१) ग्रस लिया, आकांत कर लिया, प्रभावित किया। उ.— रावन सौ नृप जात न जान्यौ, माया बिषम सीस पर नाची— १-१८।
इधर-उधर दौड़ते-घूमते फिरे; जैसा कहा, वैसा किया।
उ.—प्रीति के बचन बाचे बिरह अनल आँचे अपनी गरज को तुम एक पाइँ नाचे—२००३।
उ.—ना जानौं अब भलो मानिहै ऊधौ नाचे-गाए—३४०३।
इधर-उधर भटकना, स्थिर न रहना।
जन्म लेकर सांसारिक झगड़ों में पड़कर दौड़-धूप करे।
उ.—जाइ समाइ सूर वा निधि मैं, बहुरि जगत नहिं नाचै—१-८१।
उ.—अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल—१-१५३।
मुहा.- नाज उठाना— नखरे या चोंचले सहना।
नाज से पालना— बड़े लाड़-प्यार से पालना।
भोजन, खाना, खाद्य पदार्थ।
उ.—राखौ रोकि पाइ बंधन कै, अरु रोकौ जल नाजु—७८।
जरा सी ठेस से ही टूट जानेवाली।
जिसमें हानि होने का डर हो।
उ.—यह व्यवहार आजु लौं है ब्रज कपट नाट छल ठानत—२७०३।
उ.—बदन उघारि दिखायौ अपनौ नाटक की परिपाटी—१०-२५४।
वह ग्रंथ जिसका अभिनय किया जा सके।
एक नाटक के बीच दूसरे नाटक का अभिनय।
वचन देकर फिर मुकर जाना, वादे से इनकार करना।
नाटक का एक भेद जिसमें चार अंक होते हैं।
उ.—सूरदास नँद लेहु दोहिनी, दुहहु लाल की नाटी—१०-२५९।
उ.—(क) अपनी प्रभु भक्ति देहु जासौं तुम नाता—१-१२३। (ख) सूरदास श्री रामचंद्र बिनु कहा अजोध्या नाता—९-४९।
उ.—सुत के सुत नाती पतिनी की महिमा कहिय न जाई—८३९।
उ.—मिलि किन जाहु बटाऊ नाते—२५२८।
उ.—दूध-दही के नाते बनवत बातें बहुत गुपाल।
उ.— झूठे नाते जगत के सुत-कलत्र-परिवार—२-२९।
उ.—(क) पुनि पुनि तुमहिं कहत कत आवै कछुक सकुच है नातै—३०२४। (ख) उग्रसेन बैठारि सिंहासन लोग कहत कुल नातै—३३२४।
कौटुंबिक घनिष्ठता, जाति-संबंध, रिश्ता।
उ.—(क) जग मैं जीवन ही कौ नातौ—१-३०२। (ख) रघुपति चित्त बिचार करयौ। नातौ मानि सगर सागर सौं, कुस-साथरी परयौ —९-१२२। (ग) हमहिं तुमहिं सुत-तात को नातौ और परयौ है आइ—२६५१।
उ.—तब तें गृह सौं नातौ टूट्यौ जैसैं काँचो सूत री—१०-१३६।
मुहा.- नाड़ी चलना— कलाई की नाड़ी में गति होना जो जीवन का लक्षण है।
नाड़ी छूटना— (१) नाड़ी न चलना। (२) मूर्च्छा आना। (३) मृत्यु होना।
ज्ञान, शक्ति और श्वास वाहिनी नालियाँ।
वर-वधू की गणना बैठाने में कल्पित चक्रों में स्थित नक्षत्र-समूह।
उ.—(क) राखो मोहिं नात जननी को मदनगुपाल लाल मुख फेरो—२५३२। (ख) होहु बिदा घर जाहु गुसाईँ माने रहियौ नात—२६५७। (ग) सूर प्रभु यह सुनहु मोसों एकहीं सों नात—२९१७।
उ.—(क) गाइ लेहु मेरे गोपालहिं। नातरु काल-ब्याल लेतै हैं, छाँड़ि देहु तुम सब जंजालहिं—१-७४। (ख) जा सहाइ पांडव-दल जीतौं, अर्जुन कौ रथ लीजै। नातरु कुटुँब सकल संहरि कै, कौन काज अब जीजै—१-१६९। (ग) कोउ खवावै तो कछु खाहिं। नातरु बैठे ही रहि जाहिं—५-२।
उ.—तहँ सुख मानि बिसारि नाथ पद अपनै रंग बिहरतौ —१-२०३।
उ.—कौन बरन तुम देवर सखि री, कौन तिहारौ नाथ—९-४४।
गोरखपथिया की उपाधि या पदवी जो उनके नामों से मिली रहती है।
नाक छेदकर वश में करते है, नाथते है।
उ.—नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ—५५७।
सात बैल नाथन के कारन आप अजोघ्या आये—सारा. ६५५।
उ.—पुलकित अंग अँगिया दरकानी उर आनँद अंचल फहरात।
(दाब या जोर पड़ने से) फट गयी, मसक गयी, चिर गयी, विदीर्ण हुई।
उ.—(क) लिए लगाई कठिन कुच कैं बिच, गाढ़ै चाँपि रही अपनैं कर। उमँगि अंग अंगिया उर दरकी, सुधि बिसरी तन की तिहें औसर—१०-३०१। (ख) प्रेम बिबस सब ग्वालि भईं। पुलक अंग अँगिया उर दरकी, हार तोरि कर आपु लंई—७०१।
यात्रा में बराबर बढ़ता हुआ।
पशुओं को वश में रखने के लिए नाक छेदकर उसमें रस्सी डालना।
मुहा.- नाक पकड़कर नाथना— वल से वश में करने।
वस्तु को छेदकर तागा डालना, नत्थी करना।
उदयपुर में वल्लभ-संप्रदायी वैष्णवों का मंदिर जहाँ श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित है।
उ.—बानर बन बिघन कियौ, निसिचर कुल नाथा—९-९६।
नाथकर, नाक छेदकर, वश में करके।
उ.—(क) नाग नाथि लै आइहैं, तब कहियौ बलराम—५८९। (ख) काली ल्याए नाथि, कमल ताही पर ल्याए—५८९।
नाथ लिया, नाक छेदकर वश में कर लिया।
उ.—(तब) धाइ धायौ अहि जगायौ, मनौ छूटै हाथियाँ। सहस फन फुफुकार छाँड़े, जाइ काली नाथियाँ—५७७।
नाथे हुए, वश में किये हुए।
उ.—आवत उरंग नाथे स्याम—१०-५६३।
उ.—कहि कुसलातैं साँची बातैं आवन कह्यौ हरिनाथै—३४४१।
उ.—तृष्ना नाद करत घट भीतर, नाना बिधि दै ताल—१-१५३।
वर्णों का अव्यक्त मूल रूप।
प्रफुल्लित होना, लहलहाना।
उ.—मेरी कही न मानत राधे। ये अपनी मति समु झत नाहीं, कुमति कहा पन नाधे।
ठाना (है), आरंभ किया (है)।
उ.—नैननि नाधौ है झर—२७६४।
आरंभ किया, (किसी काम को) ठाना या अनुष्ठित किया।
उ.—काहे कौं कलह नाध्यौ, दारुन दाँवरि बाँध्यौ, कठिन लकुट लै तैं त्रास्यौ मेरें भैया—३७२।
पंजाब के एक प्रसिद्ध महात्मा जो सिख संप्रदाय के आदि गुरु थे।
सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत देव नर कोउ न लखहि करत व्याला—२५८४।
उ.—सूरदास-प्रभु अपने जन के नाना त्रास निवारे—१-१०।
उ.—पांडु-सुत बिपति-मोचन महादास लखि, द्रौपदी-चीर नाना बढ़ायौ—१-११९।
रस्सी आदि से पशु को गाड़ी में जोतना या बाँधना।
उ.—कहा कथन मोसी, के आगे जानत नानी नानन—३३२६।
मुहा.- नानी मर जाना (याद आना)— प्राण सूख जाना, मुसीबत आ जाना, संकट पड़ जाना।
उ.—चले बन धेनु चारन कान्ह। गोप-बालक कछु सयाने नंद के सुत नान्ह—६१०।
मुहा.- नान्ह कातना— महीन काम करना। कठिन या दुष्कर कार्य करना।
उ.—नान्हरिया गोपाल लाल तू बेगि बड़ौ किन होहि—१०-७४।
उ.—(क) माता दुखित जानि हरि बिहँसे, नान्हीं दँतुलि दिखाइ—१०-८०। (ख) ठाढ़े हरि हँसत नान्हि दँतियन छबि छाजै—१०-१४६। (ग) नान्हीं एड़ियनि-अरुनता फलबिंब न पूजै—१०-१३४।
उ.—हौं वारी नान्हे पाइनि की दौरि दिखावहु चाल—१०-२२३।
मुहा.- नान्हे-नून्हे— छोटे-मोटे, बहुत साधारण। उ.— अबलौं नान्हे-नून्हे तारे, ते सब बृथा अकाज। साँचै बिरद सूर के तारत, लोकनि-लोक अवाज— -१-९६।
उ.—खेलत खात रहे ब्रज भीतर। नान्हें लोग तनक धन ईतर—१०४२।
उ.—सत्रु नान्हो जानि रहे अब लौ बैठि जन आपने को मारि डारौं—२६०२।
उ.—जेतिक अधम उधारे प्रभु तुम, तिनकी गति मैं नापी—१-१४०।
राजा ययाति के पुत्र जो राजा दशरथ के पितामह थे।
उ.—नाभि-हृद, रोमावली-अलि, चले सहज सुभाव—१-३०७।
आग्नीध्र राजा का पुत्र जिसकी पत्नी मेरुदेवी के गर्भ से ऋषभदेव का जन्म हुआ था जो विष्णु के चौबीस अवतारों में मान जाते हैं।
उ.—प्रियब्रत कैं अग्नीध्र सु भयौ। नाभि जन्म ताही तैं लयौ—५-२।
प्रलयोपरांत वट-शायी बालरुप नारायण की नाभि से उत्पन्न कमल जिससे ब्रह्मा की उत्पत्ति मानी जाती है।
उ.—नाभि-कमल तैं ब्रह्मा भयौ—९-२।
वह शब्द जिससे किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान आदि का बोध हो; संज्ञा।
उ.—नाम सुनीति बड़ी तिहिं दार—४-९।
मुहा.- नाम उछलना— निंदा या बदनामी होना।
नाम उछालना— निंदा या बदनामी कराना।
नाम उठ जाना (उठना)— चर्चा या स्मरण तक न होना, चिन्ह भी न रहना।
नाम करना— पुकारने का नाम निश्चित कराना।
(किसी का) नाम करना- दूसरे के नाम पर दोष लगाना।
(किसी बात का) नाम करना- दिखाने या उलाहना छड़ाने के लिए अथवा कहने भर को कुछ कर देना।
नाम का- (१) नाम-धारी। (२) कहने-सनने भर को।
नाम के लिए (को)- (१) कहने- सुनने भर को (२) उपयोग या व्यवहार के लिए नहीं। (३) बहुत थोड़ा।
नाम चढ़ना- किसी सूचि आदि में नाम लिखा जाना।
नाम चढ़ाना- नाम लिखाना।
नाम चमकाना— अच्छा नाम या यश होना।
नाम चलना— (१) याद बनी रहना। (२) वंश के लोग जीवित रहना।
नाम चार को— (१) कहने-सुनने भर को। (२) बहुत थोड़ा।
नाम जगाना— (१) ऐसा काम करना कि लोग चर्चा करने लगें। (२) ऐसा काम करना कि लोगों में याद बनी रहे।
नाम जगायौ— ऐसा काम किया कि चारों ओर चर्चा होने लगी। उ.— त्रिभुवन में अति नाम जगायौ फिरत स्याम संग ही— पृ. ३२२।
नाम जपना— बार-बार नाम लेना।
नाम देना— नाम रखना।
नाम धरता— नामकरण करनेवाला।
नाम धरति हैं— दोष लगाती हैं, बदनाम करती हैं। उ.— ब्रज-बनिता सब चोर कहति तोहिं लाजनि सकुचि जात मुख मेरौ। आजु मोहिं बलराम कहत हे, झूठहिं नाम धरति हैं तेरौ— ३९९।
(किसी का) नाम धरना— (१) नामकरण करना। (२) बदनामी करना, दोष लगाना। (३) वस्तु का दाम स्थिर करना।
नाम धराना— (१) नामकरण कराना। (२) निंदा या बदनामी कराना।
नाम धरयौ— निंदा या बदनामी करायी। उ.— गोपराइ के पुत्र है नाम धरायौ— ११३५।
नाम धरावत— नामकरण कराते हैं, नाम रखाते हैं। उ.— जो परि कृष्णा कूबरिहिं रीझे तो सोई किन नाम धरावत— ३०९३। उ.— रिषि कह्यौ ताहि, दान-रति देहि। मैं बर देहुँ तोहि सो लेहि। तू कुमारिका बहुरौ होइ। तोकौं नाम धरै नहिं कोई— १-२२९।
नाम धरैहौ— बदनामी या निंदा करायेगी। उ.— तुम हौ बड़े महर की बेटी कुल जनि नाम धरैहौ— १४९८।
नाम धरयौ— (१) नामकरण किया। उ.— पतित पावन-हरि बिरद तुम्हारौ, कौनैं नाम धरयौ— १-१३३।
नाम लगाया- दोषारोपण किया। दोषी ठहराया। उ.— बल मोहन कौ नाम धरयौ, कह्यौ पकरि मँगावन— ५८९।
नाम न लेना- (१) अरूचि, घृणा यो क्रोध से चर्चा तक न करना। (२) लज्जा-संकोच से नामोच्चार न करना।
तो मेरा नाम नहीं— तो मुझे तुच्छ समझना।
नाम निकल जाना (निकलना)— (१) किसी बुरी-भली बात के कर्त्ता या सहयागी के रूप में बदनाम हो जाना। (२) नाम का प्रकाशित होना।
नाम निकलवाना— (१) बदनामी कराना। (२) तंत्र-मंत्र से अपराधी का पता लगवाना (३) किसी नामावली से नाम कटवा देना। (४) नाम प्रकाशित करा देना।
नाम पड़ना- नाम रख जाना, नाम निश्चित हो जाना।
(किसी के) नाम— (१) किसी के लिए निश्चय या कानून द्वारा सुरक्षित। (२) किसी के संबंध में। (३) किसी को संबोधन करके।
किसी के नाम पर— (१) किसी के स्मारक-रूप में। (२) पुण्य-दान के लिए किसी देवी-देवता आदि तोष के लिए।
किसी के नाम पड़ना— (१) किसी के लिए निश्चित या निर्धारित किया जाना, किसी के नाम लिखा जाना। (२) किसी को सौंपा जाना।
किसी के नाम डालना— (१) किसी के लिए निश्चित या निर्धारित करना। (१) किसी को सौंपना।
(किसी के) नाम पर मरना (मिटना)— (किसी के प्रति इतना) प्रेम होना कि अपने हानि-लाभ की जरा भी चिंता न करना।
(किसी के) नाम पर बैठना— (१) किसी की सहायता या दया के भरोसे पर संतोष करना। (२) किसी के आसरे प जरूरी काम भी न करना।
(बड़ा) बड़ौ नाम— बहुत प्रसिद्ध या विख्यात होना। उ.— नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बड़ौ नाम है नंद महर कौ— १०-३३३।
नाम बद (बदनाम) करना— बदनामी कराना, कलंक लगाना।
नाम बाकी रहना— (१) कहीं चले जाने या मरने के बाद भी लोगों को नाम का स्मरण रहना। (२) सब कुछ मिट जाना, केवल नाम भर रह जाना।
नाम बिकना— (१) नाम प्रसिद्ध हो जाने के कारण ही उससे संबंधित वस्तु का आदर होना। (२) किसी प्रसिद्ध व्यत्कि के नाम पर वस्तु विशेष का नाम रखकर उसे बेचना।
नाम बिगाड़ना— (१) बुरा काम करके बदनाम होना (२) दोष या कलक लगाना।
नाम मिटना— (१) नाम का स्मरण भी न रह जाना। (२) चिह्न तक मिट जाना।
नाम मात्र को— बहुत ही थोड़ा।
नाम भयौ— नाम हुआ, श्रेय मिला। उ.— गनिका तरी आपनी करनी नाम भयौ प्रभु तेरौ— १-१३२।
नाम रखना— (१) नामकरण करना। (२) अच्छा काम करके यश बनाये रखना। (३) बदनामी करना।
नाम लगना- दोष, बुराई या अपराध के सिलसिले में नाम लिया जाना।
नाम लगाना— दोष, बुराई या अपराध का जिम्मेदार ठहराना, दोष मढ़ना।
नाम लेकर— (१) नाम के प्रभाव से। (२) नाम का स्मरण करके। नाम लेना— (१) नाम का उच्चारण करना। (२) जपना या स्मरण करना। (३) गुण गाना, प्रशंसा करना। (४) जिक्र या चर्चा करना। (५) दोष या अपराध लगाना। नाम लीन्हौ— भय या आतंक दिखाने के लिए नाम का उच्चारण किया। उ.— यह कह्यौ नंद, नुप बंदि, अहि-इंद्र पै गयौ मेरौ नंद, तुव नाम लीन्हौ— ५८४।
नाम-निशान— चिन्ह, पता, खोज।
नाम-निशान मिट जाना (मिटना)— ऐसा चिन्ह तक न रह जाना जिससे कुछ पता चल सके।
नाम-निशान न होना— ऐसा कोई चिन्ह न होना जिससे पता चलाया जा सके।
नाम से— (१) चर्चा या जिक्र से। (२) संबंध बताकर। (३) स्वामी या मालिक मानकर। (४) नाम के प्रभाव से (५) नाम सुनते ही।
नाम से काँपना— नाम सुनते ही डर जाना।
नाम होना— (१) दोष या कलंक लगना। (२) नाम प्रसिद्ध होना। (३) कार्य-संपादन का श्रेय मिलना।
सुनाम, कीर्ति, यश, ख्याति।
मुहा.- नाम कमाना (करना)— प्रसिद्ध होना। नाम को मरना— (१) यश या बड़ाई पाने के लिए जी-जान से कोशिश करना। (२) यश या कीर्ति बनाये रखने के लिए जी-जान से कोशिश करना। नाम चलना-यश या कीर्ति बनी रहना। नाम जगना— यश या कीर्ति फैलना। नाम जगाना— यश या कीर्ति फैलना। नाम डुबाना— यश या कीर्ति मिटाना। नाम डूबना— यश या कीर्ति न रह जाना। नाम पाना— यश या कीर्ति मिलना। नाम रह जाना— यश या कीर्ति की चर्चा होना। नाम से पुजना— यश या कीर्ति के कारण ही आदर होना। नाम से बिकना— यश या कीर्ति के कारण ही बिकना। नाम ही नाम रह जाना— पिछले यश की चर्चा भर रह जाना, वास्तविक काम या मूल्य न रह जाना।
उ.— पतित पावन जनि सरन आयौ। उदधि-संसार सुभ नाम-नौका तरन अटल अस्थान निजु निगम गायौ—१-११९।
मुहा.- नाम आना— ईश्वर का नाम मुख से उच्चरित होना।
नाम आयौ— ईश्वर का नाम मुख से उच्चरित हुआ। उ.— ग्रस्यौ गज ग्राह लै चल्यौ पाताल कौं, काल कैं त्रास मुख नाम आयौ— १-५।
नाम जपना— (१) भक्ति या प्रेम से ईश्वर का बार-बार नाम लेना। (२) जाप करना, माला फेरना।
नाम देना— इष्टदेव का या सांप्रदायिक मंत्र देना।
नाम न लेना— ईश्वर का स्मरण न करना।
नाम (पर)— ईश्वर के निमित्त।
नाम पर बैठना— ईश्वर के सहारे रहकर संतोष करना।
नाम पुकारना— ईश्वर का नाम जोर से लेना।
नाम लेकर— देवी-देवता, इष्टदेव या ईश्वर का स्मरण करके।
नाम लेना— (१) देवी-देवता या ईश्वर का स्मरण करना। (२) जाप करना, माला फेरना। (३) कीर्तन या ईश्वर-चर्चा करना।
नाम से— (१) ईश्वर की कथा-वार्ता, कीर्तन-चर्चा से। (२) ईश्वर का नाम लेकर। (३) देवी-देवता के उपयोग या सेवा के लिए। (४) ईश्वर के नाम के प्रभाव से। (५) ईश्वर के नाम का उच्चारण करते ही।
नाम लीजै— ईश्वर का स्मरण या जाप कीजिए। उ.— (सनकादि) कह्यौ, यह ज्ञान, या ध्यान, सुमुरन यहै, निरखि हरि रूप मुख नाम लीजै— ४-११।
हिंदुओं के सोलह संस्कारों में पाँचवाँ जब बच्चे का नाम रखा जाता है।
जिसका नाम किसी पद के लिए प्रस्तावित हुआ हो।
कृष्णोपासक वामदेव जी के नाती जिनकी कथा भक्तमाल में है। बचपन से ही कृष्ण में इनकी सच्ची भक्ति थी। एक बार बाहर जाते समय वामदेव जी अपने इस छोटे दौहित्र से भगवान श्रीकृष्ण को प्रतिदिन दूध चढ़ाने को कहते गए। नामदेव ने दूसरे दिन दूध सामने रखकर प्रतिमा से पीने की प्रार्थना की और उसके न पीने पर वे आत्महत्या करने को तैयार हुए। भक्त की रक्षा के लिए भगवान ने प्रकट होकर दूध पी लिया। लौटने पर नाना वामदेव यह अद्भुत व्यापार देख बड़े चकित हुए। धीरे-धीरे इनकी प्रसिद्धि चारों ओर हो गयी।
महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध कवि।
उ.—सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिना तनु भयो ब्योंत, बिरह भयौ दरजी—३१६२।
कपड़ा सीने का व्यवसाय करने वाली जाति का पुरुष।
सहानुभूति, करुणा, दया, तर्स, रहम।
उ.—(माई) नैंकुहूँ न दरद करति, हिलकिनि हरि रोवै। बज़्रहुँ तैं कठिन हियौ, तेरौ है जसोवै—३४८।
काश्मीर प्रदेश और हिंदूकुश पर्वत के मध्यवर्ति भू-भाग का प्राचीन नाम।
विनयपूर्वक नाम जपने या स्मरण करनेवाला।
नाम-राशि, नामरासि, नामरासी
एक ही नाम और विचारवाले व्यक्ति
नाम लेने या स्मरण करनेवाला।
जिसका केवल नाम ही रह गया हो, नष्ट।
नाई जाति का एक भक्त जिसका छप्पर भगवान ने छाया था।
उ.—कलि मैं नामा प्रगट ताकी छानि छवावै—१-४।
उ.—(क) पापी परम, अधम, अपराधी, सब पतितनि मैं नामी—१-१४८। (ख) सुत कुबेर के ये दोउ नामी—३९१। (ग) एक कुवलिया त्रिभुवनगामी। ऐसे और कितिक हैं नामी—२४५९।
उ.—(क) हरि, हौं सब पतितनि को नायक—१-१४६। (ख) मन मेरैं नट के नायक ज्यौं नितहीं नाच नाचायौ—१-२०५।
उ.—तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक—१-१७७।
किसी ग्रंथ का सर्वप्रमुख पुरुष पात्र।
श्रृंगार का आलंबन या साधक।
ग्रंथ की सर्वप्रमुख स्त्री पात्री।
उ.—अबल प्रहलाद, बलि दैत्य सुखहीं भजत, दास ध्रव चरन चित-सीस नायौ—१-११९।
उ.—(क) सुत-तनया-बनिता-बिनोद-रस, इहिं जुर-जरनि जरायौ। मैं अग्यान अकुलाइ, अधिक लै, जरत माँझ घृत नायौ—१-१५४। (ख) तामें मिश्रित मिश्री करि दै कपूर पुट जावन नायो—११७९। (ख)
उ.—दै करि साप पिता पहँ आयौ। देख्यौ सर्प पिता-गर नायौ—१-२९०।
दयालु, दया कार्य में रहनेवाले।
उ.—(क) जसुदा नार न छेदन दैहौं—१०-१५। (ख) बेगहिं नार छेदि बालक कौ, जाति बयारि भराई—१०-१६।
मुहा.- नार नवाना (नीची करना)- (१) सिर या गरदन झुकाना। (२) लज्जा, संकोच या मान से दृष्टि नीची करना। नार नावति— लज्जा या संकोच से दृष्टि नीचे करती है। उ.— समुझि निज अपराध करनी नार नावति नीचि। नार नीची करि— लाज, संकोच य मान से दृष्टि नीची करके। उ.— मान मनायो राधा प्यारी।¨¨¨। कत ह्णै रही नार नीची करि देखत लोचन झूले।
उ.—इक नदिया इक नार कहावत, मैलो नीर भरौ। जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै , गंगा नाम परौ—१-२१०।
नारा, नाला, इजारबन्द, नीबी।
उ.—(क) धर्मपुत्र कौं जुआ खिलाए। तिन हारयौ सब भूमि-भँडार। हारी बहुरि द्रौपदी नार—१-२४६। (ख) नाम सुनीति बड़ी तिहिं दार। सुरुचि दूसरी ताकी नार—४-९।
वह प्राणी जो नरक में रहता हो।
नरक भोगनेवाला प्राणी, पापी।
वह जो आशा देकर निराश करे।
उ.—राधा मन मैं यहै बिचारति।¨¨¨¨¨¨ मोहू ते ये चतुर कहावति ये मन ही मन मोकों नारति।
एक देवर्षि जो ब्रह्मा के पुत्र कहे जाते है। नाना लोकों में विचरना और एक का संवाद दूसरे तक पहुँचाना, इनका कार्य बताया गया है। ये बड़े हरिभक्त माने जाते है। कहीं कहीं कलह कराने में भी इनका हाथ रहना कहा गया है। इसी से इधर की उधर लगाने वाले को 'नारद' कहते है।
(सं. ज्ञान, प्रा. णाण + हिं. ना)
थाह का पता लगाना, भाँपना, ताड़ जाना, अंदाजना।
(हिं. नार + सं. विवार=फैलाव)
आँवल नाल, नाल और खेड़ी आदि।
नारा सूथन जधन बाँधि नारा बँद तिरनी पर छबि भारी—पृ. ३४५ (४०)।
नाला जिसमें पानी बहता है।
लोहे का तीर जिसमें पांच पंख होते है और जिसका चलाना कठिन होता है।
वह दुर्दिन जब अंधड़ आदि चले।
थानेदार का पद या उसका कार्य और दायित्व।
[ हिं. थाना + ऐत (प्रत्य.) ]
[ हिं. थाना + ऐत (प्रत्य.) ]
टिकने या रहने का स्थान, वासस्थान।
उ.- रघुकुल राघव कृस्न सदा हो गोकुल कीन्हौ थानौ १-११।
तबले आदि पर दी गयी थपकी या ठोंक
नष्ट करनेवाले, दूर करनेवाले।
उ.—अरु जन-सँताप-दरन, हरन-सकल-सँताप—१-१८२।
हठयोग में ज्ञान, शक्ति और श्वास-प्रश्वास-वाहिनी नालियाँ।
उ.—इंगला पिंगला सुषमना नारी—३३०८।
बरसाती या गंदा पानी बहने का प्राकृतिक मार्ग, नाला।
उ.—गरजत क्रोध-लोभ कौ नारौ, सूझत कहूँ न उतारौ—१-२०९।
बिहार का एक प्राचीन क्षेत्र जहाँ प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था।
कमल, कुमुद आदि फूलों की पोली, लंबी डंडी, डांड़ी।
उ.—(क) बह्मा यौं नारद सौं कह्यौ। जब मैं नाभि-कमल मैं रह्यौ। खोजत नाल कितौ जुग गयौ। तौहू में कछु मरम न लयौ—२-३७। (ख) जाकैं नाल भए ब्रह्मादिक, सकल जोग ब्रत साध्यौ हो—१०-१२८।
गेहूँ, जौ आदि की पतली डंडी।
मुहा.- नाल काटनेवाली— बड़ी-बूढ़ी।
कहीं नाल गड़ना— (१) उस स्थान पर जन्मभूमि-जैसा इतना प्रेम बोना कि वहाँ से जल्दी न हटना। (२) उस स्थान पर दादा या अधिकार होना।
लोहे का अर्द्धचंद्राकार टुकड़ा जो पशुओं के खुरों या टापों में जड़ा जाता है।
श्रीकृष्ण की सेना का नाम।
उ.—सुतहित नाम लियौ नारायन, सो बैकुंठ पठायौ—१-१०४।
उ.—अजामील द्विज सौं अपराधी अंतकाल बिडरै। सुत-सुमिरत नारायन-बानी, पार्षद धाइ परैं—१-८२।
उ. - पंजा पंच प्रपंच नारि-पर भजत, सारि फिरि सारी—१-६०।
पत्थर का भारी टुकड़ा जिसमें दस्ता लगा हो।
रूपया जो जुआरियों से अड्डेवाला लेता है।
खुली हुई पालकी जिसमें दूल्हा बैठकर ब्याहने जाता है।
प्राकृतिक या गंदे पानी के बहने का छोटा जलमार्ग।
प्राकृतिक या गंदा जल बहने का पतला मार्ग, मोरी।
बात कहकर या वादा करके मुकर जानेवाला।
मुहा.- बालू में नाव चलाना— बालू में नाव चलाने जैसा व्यर्थ और मूर्खता का प्रयत्न करना। सिकता (=सिकता=बालू) हठि नाव चलावहु— मूर्खता का और निष्फल प्रयत्न कर रहे हो। उ.— सूर सिकत हठि नाव चलावहु ये सरिता है सूखी। सूखे में नाव वहीं चलती— दिना खर्च क्रिय या उदारता दिखाये नाम नहीं होता।
नाव में धूल उड़ाना— (१) सरासर झूठ दोलना। (२) झूठा अपराध लगाना।
उ.—(क) लै भैया केवट, उतराई। महाराज रघुपति इत ठाढ़े, तैं कत नाव दुराई—९-४०। (ख) दुई तरंग दुइ नाव-पाँव धरि ते कहि कवननि मूठे—३२८०।
उ.—गोपिनि नाव धरयो नवरंगी—२६७५। (ख) यह सुख सखी निकसि तजि जइए जहाँ सुनीय नाव न—२८६९।
एक तरह का छोटा बाण या तीर।
मल्लाह जिसने श्रीराम को नाव पर चढ़ाकर गंगा पार किया था।
उ.—पुनि गौतम घरनी जानत है, नावक सबरी जान—सारा. ६८६।
(किसी छिद्र आदि में) डालता है, छोड़ता है।
उ.—(क) माखन तनक आपनैं कर लै, तनक बदन मैं नावत—१०-१७७। (ख) जूठौ लेत सबनि के मुख कौ, अपनैं मुख मैं नावत—४६८।
उ.—सूर सीस नीचे क्यों नावत अब काहे नहिं बोलत—३१२१।
देती है, डालती है, घुसाती है।
उ.—भरथौ चुरू मुख धोइ तुरत हीं पीरे पानबिरी मुख नावति—५१४।
नाव-क्रीड़ा जिसमें नाव को जल में चक्कर खिलाते हैं।
डालते हैं घुसाते हैं, प्रविष्ट कराते हैं।
उ.—जल-पुट आनि धरनि पर राख्यौ, गहि आन्यौ वह चंद दिखावे। सूरदास प्रभु हँसि मुसु-क्याने, बार-बार दोऊ कर नावैं—१०-१९१।
नवाता है, झुकाता है, नम्रतापूर्वक बंदना करता है।
उ.—उग्रसेन की आपदा सुनि-सुनि बिलखावै। कंस मारि, राजा करै आपहु सिर नावै—१-४।
उ.—महामूढ़ सो मूल तजि, साखा जल नावै—२-९।
नाश करने की क्रिया या भाव।
उ.—ता दिन नींदौ पुनि नाशी चौंकि परति अधिकारे—३०४५।
उ.—जिनके दरस-परस करुना ते दुख-दरिद्र के नास—सीरी. ८०८।
उ.—भगत-बिरह कौ अतिहीं कादर, असुर-गर्ब-बल नासत—१-३१।
उ.—जल-चर-जा-सुत-सुत सम नासा धरे अनासा हार—सा. ३५।
उ.—हम पर रिस करि करि आवलोकत नासापुट फरकावत।
नथुने का छेद जिसमें नथ आदि पहनी जाती है।
कौरो-दल नासि-नासि कीन्हौं जन-भायौ—१-२३।
उ.—इहाँ आइ सब नासी—१-१९२।
सेनानायक के आगे चलनेवाला सैन्यदल।
नाश करता है, दूर करता है।
उ.—(क) उर बनमान बिचित्र बिमोहन, भृगु-भँवरी भ्रम कौं नासै—१-६९। (ख) कोटि ब्रह्मांड छनहिं मैं नासै, छनहीं मैं उपजावै—४८२।
ईश्वर को न मानने का भाव, नास्तिक होने की बुद्धि।।
नासिका का, नासिका-संबंधी।
उ.—जिहिं कुल राज द्वारिका कीन्हौ, सो कुल साप तैं नास्यौ—१-१५।
निंदा करता है, बुरा कहते है।
उ.—(क) निंदत मृढ़ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै—२-१३। (ख) हरि सबके मन यह उपजाई। सुरपति निंदत, गिरिहिं बड़ाई।
निंदा करती है, बुरा कहती है।
उ.—ललना लै लै उछंग, अधिक लोभ लागै। निरखतिं निंदति निमेष करत ओट आगै—।
निंदा करना, बुरा कहना, बदनाम करना।
उ.—(क) मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै—१०-४३। (ख) सूर स्याम कछु कहत-कहत ही बस कर लीन्हे आइ निंदरिया—१०-२४६।
उ.—निंदा जग उपहास करत, मग बंदीगन जस गावत—१-१४१।
जिसे नींद रही हो, जो उनींदा हो।
द्वार-द्वार, जगह-जगह, ठौर-कुठौर।
उ.—(क) माया नटिनि लकुटि कर लीन्हें कोटिक नाच नचावै। दर-दर लोभ लागि लै डोलै नाना स्वाँग करावै। (ख) जीवत जाँचत कन-कन निर्धन दर-दर रहत बिहाल —१-१५६।
जो मोटा पिसा हुआ हो, जो महीन न पिसा हो।
किटकिटाकर दाँत से काट लेना।
दया या सहानुभूति दिखानेवाला।
उ.—मेरै भैया कितनौ गोरस नास्यौ—३७५।
उ.—ब्रह्मा कह्यौ, सुनो नर-नाह। तुम सौं नृप नग मैं अब नाह—९-४।
उ.—जाहु नाह, तुम पुरी द्वारिका कृष्ण-चन्द्र के पास—सारा. ८०८।
दृथा, व्यर्थ, निष्प्रयोजन।
उ.—(क) सूरदास भगवंत-भजन बिनु, नाहक जनम गँवायौ—१-७९। (ख) ऐसौ को अपने ठाकुर कौ इहिं बिधि महत घटावै। नाहक मैं लाजनि मरियत है, इहाँ आइ सब नासी—१-१९२।
उ.—तुमहिं दूर जानत नर नाहर—१० उ.-१२९।
निषेध या अस्वीकृति सूचक अव्यय, न, नहीं।
उ.—ऐसौ सूर नाहिं कोउ दूजौ, दूरि करै जम-दायौ—१-६७।
उ.—(क) नाहिनैं जगाइ सकति सुनि सुबात सजनी—८१९। (ख) नाहिंन नैन लगे निसि इहिं डर—३०७३। (ग) नाहिंन तेरौ अति हठ नीकौ—३३५६। (घ) नीहिंनैं अब ब्रज नंदकुमार—४००४।
निषेध या अस्वीकृति -सूचक अव्यय।
उ.—हाँ नाहीं नहीं कहत हौ मेरी सौं काहे—२९३८।
उ.—हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीं, सो हमता क्यौ मानौ—१-११।
उ.—(क) तुरत जाइ पौढ़े दोउ भैया, सोवत आई निंद—१०-२३०। (ख) पौढ़े जाय दोउ सैया पर सोवत आई निंद—सारा. ५०७।
उ.—साधु-निंदक, स्वाद-लँपट, कपटी, गुरु-द्रोही। जेते अपराध जगत, लागत सब मोहीं—१-१२४।
जो लगाव या मेल न रखता हो।
उ.—ताको दर्शन देखि भयौ अज सब बातन निःशोक-—सारा. १३।
उ.—(क) मोकौं निंदि परबतहिं बंदत—१०४२। (ख) जाकौ निंदि बंदियै सो पुनि वह ताको निदरै—११५९।
उ.—कहा भए जो आप स्वारथी नैननि अपनी निंद्य कराई—पृ. ३३१ (१)।
बारी जिसमें सब या अधिकांश पेड़ नीम के ही हों।
निंबार्क संप्रदाय के आदि आचार्य जिनकी गद्दी वृन्दावन के पास 'ध्रुव' पहाड़ी पर है।
जिसे या जिसमें संदेह न हो।
जो लाभ, सुख या सुविधा का ध्यान न रखता हो।
जो(कार्य-व्यापार) लाभ, सुख या सुविधा के लिए न किया गया हो।
एक उपसर्ग जो अनेक अर्थें का द्योतंक है; यथा--
उ.— ताकी मृत्यु आइ निअरानी—१० उ.-४४।
वै तो भूषन परखन लागीं तब लगि निअरे आए—३४४१।
उ.—(क) सूरदास प्रभु कंस निकंदन देवनि करन सनाथ—२५३४। (ख) सूरदास प्रभु दुष्ट-निकंदन धरनी भार उतारनकारी—२५८९।
नाश करनेवाले, वध करनेवाले।
उ.—सूरदास बलि गई जसोदा, उपज्यौ कंस-निकंदा—१०-१९२।
उ.—बंसीबट के निकट आजु हो नेक स्याम मुख हेरो—सा. ४२।
(सं. निष्कर्म, प्रा. निकम्म,)
जो कुछ न करे-धरे, जो कुछ करने-धरने योग्य न हो।
उ.— बड़ौ कृतघ्नी, और निकम्मा, बेधन, राँकौ-फीकौ—१-१८६।
उ.— भृकुटी सूर गही कर सारँग निकर कटाछनि चोर— सा. उ. १६।
उ.— किरनि सकंति भुज भरि हनै उर तें न निकरई—२८६१।
उ.—(क) ज्यौं दरपन प्रतिबिंब, त्यौं सब सृष्टि करी—२-३६। (ख) इंद्र दिंसि के आदि राखै आदि दरपन बरन—सा.५७।
ताव दिखाना, क्रुद्ध होना।
किसी को इस तरह घबरा देना कि वह मन की बात न कह सके।
उ.— मानौ निकरि तरनि रंध्रनि तैं उपजी अति आगि—९-१५८।
उ.—सूरदास प्रभु बेगि मिलहु किनि नातरु प्रान जात निकरी—३१८८।
उ.— अरजुन के हरि हुते सारथी, सोऊ बन निकरै—१-२६४।
उ.—आनन रही ललित पय छींटें, छाजति छबि तृन तोरे। मनौ निकसे निकलंक कलानिधि दुग्धसिंधु मधि बोरे—७३२।
विष्णु का दसवाँ अवतार जो कलि के अंत में होगा, कल्कि अवतार।
मुहा.— निकल जाना- (१) बहुत आगे बढ़ जाना। (२) नष्ट हो जाना, ले लिया जाना। (३) कम हो जाना। (४) न पकड़ा जाना। (स्त्री का) निकल जाना— स्त्री का घर छोड़कर किसी पुरूष के साथ चले जाना।
व्याप्त या लगी हुई चीज का अलग होना।
कक्षा आदि में उत्तीर्ण होना।
किसी ओर को बढ़ा हुआ होना।
ठहराया जाना, निश्चित होना।
प्रश्न या समस्या का हल होना।
निकालने का काम दूसरे से कराना।
सुमालि की पुत्री और विश्रवा की पत्नी जिसके गर्भ से रावण, कुंभकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण जन्मे थे।
उ.— (क) जब लगि डोलत, बोलत, चितवत, धन-दारा हैं तेरे। निकसत हंस, प्रेत कहि तजिहैं, कोउ न आवै नेरे—१-३१९। (ख) सूरदास जम कंठ गहे तैं, निकसत प्रान दुखारे —१-३३४।
उधार निकलते हैं, उधार बाकी हैं |
उ.— लेखौ करत लाख ही निकसत को गनि सकत अपार—१-१९६।
निकलने, छुटकारा पाने, बचने।
उ.— अब भ्रम-भँवर परयौ ब्रजनायक, निकसन की सब बिधि की—१-२१३।
उ.— तलफि तलफि जिय निकसन लागे पापी पीर न जानी —३०५९।
उ.— निकसबी हम कौन मग हो कहै बारी बैस - सा. १७।
उ.— बहुत सासना दई प्रहलादहिं, ताहि निसंक कियौ। निकसि खंभ तैं नाथ निरंतर, निज जन राखि लियौ—१-३८।
उ.— रथ तैं उतरि चक कर लीन्हौ, सुभट सामुहैं आए। ज्यौं कंदर तैं निकसि सिंह, झुकि, गज-जूथनि पर धाए—१-२७४।
आइ निकसिहैं—आ निकलेंगे, आ जायेंगे, उपस्थित हो जायेंगे।
अबहिं निवछरौ समय, सुचित ह्रै, हम तौ निधरक कीजै। औरौ आइ निकसिहैं तातैं, आगैं है सो लीजै—१-१९१।
उ.— निकसे खंभ-बीच तैं नरहरि, ताहि अभय पद दीन्हौ—१-१०४।
उ.— आइ गई कर लिए कमोरी, घर तैं निकसे ग्वाल।¨¨¨। भुज गहि लियौ कान्ह इक बालक, निकसे ब्रज की खोरि—१०-२७०।
उ.— बारक इन बीथिन ह्वै निकसे मैं दूरि झरो-खनि झाँक्यो—२५४६।
जन्म लेने पर, उत्पन्न होने पर।
उ.— जैसैं जननि-जठर-अंतरगत सुत अपराध करै। तौऊ जतन करै अरू पोषै, निकसै अंक भरै—१-११७।
उ.— रथ तैं उतरि चलनि आतुर ह्यै, कच रज की लपटानि। मानौ सिंह सैल तैं निकस्यौ, महा मत्त गज जानि—१-२७९।
[हिं. नीक + आई (प्रत्य.)]
उ.— (क) सुन्दर स्याम निकाई कौ सुख, नैना ही पै जानै—७३०। (ख) अरून अधर नासिका निकाई बदत परस्पर होड़—१३५७।
[हिं. नीक + आई (प्रत्य.)]
निकम्मा, बेकाम, अकर्मण्य।
उ.— ताहूँ सकुच सरन आए की होत जु निपट निकाज —१-१८१।
(सं. निष्कासन, हिं. निकालना, निकासना, निकारना
उ.— याकौं ह्याँ तैं देहु निकारि। बहुरि न आवै मेरे द्वारि—१-२८४।
निकालने की क्रिया, निकालना, निष्कासन।
उ.— निकालो, भीतर से बाहर लाओ। असुर सौं हेत करि, करौ सागर मथन तहाँ तैं अमृत कौं पुनि निकारौ—९-४४।
निकालो, भीतर से बाहर लाओ।
उ.—असुर सौं हेत करि, करौ सागर मथन तहाँ तैं अमृत कौं पुनि निकारौ—८-८-।
उ.—काल अवधि पूरन भई जा दिन, तनहूँ त्यागि सिधारयौ। प्रेत-प्रेत तेरौ नाम परयौ, जब जेंवरि बाँधि निकारयौ —१-३३६।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
व्याप्त या ओतप्रोत वस्तु को अलग करना।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
एक ओर से दूसरी ओर ले जाना।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
जुड़ा या लगा न रहने देना।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
पक्षियों को बंद करने का काठ का खानेदार संदूक।
दीवार या पेड़ का कोटर या कोल जिसमें कोई पक्षी आदि रहता हो।
उ.—(क) जाति-पाँति कोउ पूछत नाहीं. श्रोपति कैं दरबोर—१-२३१। (ख) देखि दरबार, सब ग्वार नहिं पार कहुँ, कमल के भार सकटनि सजाए—५८४।
वह स्थान जहाँ नायक या राजा अपने सहकारियों के साथ बैठता हो।
वह स्थान जहाँ कोई पदाधिकारी अपने चाटुकारों के साथ हैठता हो व्यग्य।
मुहा.- दरबार करना— राज-सभा या बैठक में बैठना। दरबार खुलना— वहाँ जाने की आज्ञा होना। दरबार बंद होना— वहाँ जाने की मनाही होना। दरबार बाँधना— घूस या रिश्वत तय करना। दरबार लगना— सभासदों, सहकारियों या चाटुकारों का इकट्ठा होना।
अमृतसर में सिखों का मन्दिर जिसमें उनकी धार्मिक पुस्तक, ग्रंथ साहब रखी है।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
प्रश्न या समस्या का हल करना।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
दूसरे से अपनी वस्तु ले लेना।
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
(सं. निष्कासन, हिं. निकासना)
निकाले जाने का दंड, निष्कासन, निर्वासन।
देहु निकास—निकाल दो, बाहर कर दो, हटा दो।
उ.—भृगु कह्यो, करत जज्ञ ये नास। इनकौं ह्याँ तैं देहु निकास—४-५।
निकालने की क्रिया या भाव।
वह स्थान या छिद्र जहाँ से कुछ निकले
उ.—(क) खेलत बनै घोष निकास—१०-२४४। (ख) खेलन चले कुँवर कन्हाई। कहत घोष-निकास जैये, तहाँ खेलैं धाइ—५३२।
निर्वाह का ढंग या सिलसिला।
उ.—सघन निकुंज सुरत संगम मिलि मोहन कंठ लगायौ—७१८।
शीतल निकुंजों में विहार करनेवाले, श्रीकृष्ण।
उ.—तुम अबिगत, अनाथ के स्वामी, दीन दयाल, निकुंज-बिहारी—१-१६०।
कुंभकरण का एक पुत्र जिसे हनुमान ने मारा था।
एक राजा जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
उ.—(क) गुरु-ब्राह्मन अरु संत-सुजन के, जात न कबहुँ निकेत—२-१५। (ख) बहुरौ ब्रह्मा सुरनि समेत। नरहरि जू के जाइ निकेत—७-२।
फेंकने-डालने की क्रिया या भाव।
निर्मल, स्वच्छ या झकाझक होना।
फेंकने, छोड़ने या त्यागनेवाला।
फेंकने, छोड़ने या त्यागने योग्य।
उ.—दधि मथि कै माखन बहु दैहौं, सकल ग्वाल ठाढ़े दरबार—४०३।
किसी नायक या पदाधि-कारी या बड़े आदमी के यहाँ नियमित रूप से बैठने और खुशामद करने का काम।
उ.—दास ध्रुव कौं अटलं पद दियौ, राम दरबारी—१-१७६।
दरबार का, दरबार से संबंधित।
पापी जिसे अच्छी गति न मिल सके।
उ.—सूर पूरन ब्रह्म निगम नाहीं गम्य तिनहिं अक्रूर मन यह बिचारै—२५५१।
जिसमें झगड़ा-टंटा न हो, साफ।
नोचता-खसोटता है, खींचता है।
उ.—बरजत बरजत बिरुझाने। करि क्रोध मनहिं अकुलाने। कर धरत धरनि पर लोटै। माता कौ चीर निखोटै—१०-१८३।
उ.— (क) छोरे निगड़ सोआए पहरू, द्वारे कौ कपाट उघरयौ —१०-८। (ख) निगड़ तोरि मिलि मात-पिता को हरष अनल करि दुखहि दहो—२६४४।
वेद का बताया हुआ धर्म-पथ, वेद-वर्णित धर्म-मार्ग, निर्वाण।
उ.—दीन जन क्यौं करि आवै सरन ? ¨¨¨¨¨¨। परम अनाथ, बिवेक-नैन बिनु, निगम-ऐन क्यौं पावै—१-४८।
उ.—माधौ, नैंकु हटकौ गाइ।¨¨¨¨¨¨। छुधित अति न अघाति कबहूँ, निगम-द्रुम दलि खाइ—१-५६।
सिद्ध की जानेवाली बात को सिद्ध करके परिणामस्वरूप उसको दोहराना।
[सं. निगम + नि (प्रत्य.)]
वेदों में, धर्म-शास्त्रों में।
उ.—तातैं बिपति-उधारन गायौ। स्रवननि साखि सुनी भक्तनि मुख, निगमनि भेद बतायौ—१-१८८।
जो सत्व, रज और तम, तीनों गुणों से परे हो।
जिसने गुरु-मंत्र न लिया हो।
दूसरे का धन मारकर पचा जाना।
देखने की रीति या क्रिया, चितवन।
दुष्ट, नीच। गाली (स्त्री.)
उ.— मूकू, निंद, निगोड़ा, भोंड़ा, कायर, काम बनावै—१-१८६।
रोकने, दबाने या वश में रखनेवाला।
दंड देने या दमन करनेवाला।
उ.—कंस केस निग्रहों पुहुमि को भार उतारों—११३८।
उ.—तब न कंस निग्रह्यो पुहुमि को भार उतारथो—११३९।
विषय-विशेष के शब्दों का संग्रह मात्र।
उ.—भरे रहत अति, नीर न निघटत, जानत नहिं दिन-रैन—२७६८।
उ.—सँदेसनि क्यों निघटति दिन-राति—३१८५।
पीड़ा देने की क्रिया या भाव। बंधन।
दंड देने या सताने का काम।
घटी, समाप्त हुई, व्यतीत हुई।
उ.—(क) निसि निघटी रवि-रथ रुचि साजी। चंद मलिन चकई रति-राजी—१०-२३३। (ख) जागहु जागहु नंदकुमार। रवि बहु चढ्यौ रैनि सब निघटी, उचटे सकल किवार—४०८।
जो घर-घाट का न हो, जिसका ठौर-ठिकाना न हो।
मुहा.- निघरघट देना— पकड़े और लज्जित किये जाने पर झूठी बातें बनाना।
जिसके घर-बार या ठौर-ठिकाना न हो।
बीच में पड़नेवाला, मध्यस्थ।
ठेलते या रगड़ते हुए धकियाना।
उ.—पौरि-पाट टूटि परे, भागे दर-वाना—९-१६९।
[हिं. नीचा + ला (प्रत्य.)]
[हिं. नीच + आई (प्रत्य.)]
नीचा होने का भाव, नीचापन।
[हिं. नीच + आई (प्रत्य.)]
[हिं. नीच + आई (प्रत्य.)]
नीच होने का भाव, नीचता, ओछापन।
नीचे की ओर दूरी या विस्तार।
भीनी या रसीली चीज का इस प्रकार दबना कि पानी या रस छटकर या टपककर निकल जाय।
(शरीर का ) तेज या शक्ति से रहित होना।
जिसमें रस आदि निचोड़ा गया हो।
उ.—चौराई लाल्हा अरु पोई। मध्य मेलि निबुआनि निचोई—३९६।
(जल, रस आदि) वस्तु जो निचोड़ने से निकले।
कथन का तात्पर्य या सारांश।
निचोड़ना, निचोना, निचोरना
भीगी या रसीली चीज को दबाकर पानी या रस टपकाना।
निचोड़ना, निचोना, निचोरना
किसी वस्तु का सार ले लेना।
[हिं. नीचा + औहाँ (प्रत्य.)]
उ.—साखिनि मध्य करि दीठि निचौहीं राधा सकुच भरी।
बिना राज्य या राज्यचिह्न का।
क्षत्रियों से हीन, क्षत्रियरहित।
उ.—मारयौ मुनि बिनहीं अपराधहिं, कामधेनु लै आऊ। इकइस बार निछत्र करी छिति, तहाँ न देखे हाऊ—१०-२२१।
[हिं. निछान (नि=नहीं+ छान=जो छानने से निकले)]
एकदम, पूर्ण रूप से, बिलकुल।
उ.—जसुमति दौरि लिए हरि कनियाँ। आजु गयौ मेरौ गाइ चरावन, हौं बलि जाउँ निछनियाँ—४१८।
निचोड़ना, निचोना, निचोरना
उ.—सूरदास क्यों नीर चुवत है नीरस बसन निचोयो—३४८२।
निचोड़ लूँ, रस-पदार्थ निकाल लूँ।
उ.—कहौ तौ चंद्रहिं लै अकास तैं, लछिमन मुखहिं निचोरौं—९-१४८।
उ.—(क) सिर चौतनी, डिठौना दीन्हौ, आँखि आँजि पहिराइ निचोल—१०-९४। (ख) ओढ़े पीरी पावरी हो पहिरे लाल निचोल—८९३।
सार-वस्तु से रहित हो जाना।
निचुड़ गये, (बरस-बरस कर) खाली हो गये।
उ.—भुव पर एक बूँद नहिं पहुँची निझरि गए सब मेह—९७१।
अपने को निर्दोष प्रमाणित करके।
उ.—सदा चतुराई फबती नाहीं अति ही निझरि रही हो—१५२७।
जो (खेत) उपजाऊ न रहा हो, जिसकी उर्वरा शक्ति चुक गयी हो।
उ.—किंकिरिनि की लाज धरि ब्रज सुबस करो निटोल—३४७५।
उ.—परम चतुर निज दास स्याम के संतत निकट रहत हौ।
निश्चय, ठीक-ठीक, सही-सही।
विशेष करके, मुख्यतः, खास करके।
उ.—(क) पतित पावन जानि सरन आयौ। उदधि-संसार सुभ नाम-नौका तरन, अटल अस्थान निजु निगम गायौ—१-११९। (ख) उ.—बान बरषा सुरसरी-सुवन रनभूमि आए।¨¨¨¨¨¨। कह्यौ करि कोप प्रभु अब प्रतिज्ञा तजौ, नहीं तौ जुद्ध निजु हम हराए—१-२७१।
मुहा.- निछावर करना— छोड़ देना, त्यागना।
निछावर होना— (१) त्याग दिया जाना। (२) प्राण त्यागना, मर जाना।
(सं. न्यास + अवर्त्त=न्यासावर्त्त, हिं. निछावर)
उ.—अब कहा करौं निछावरि, सूरज सोचति अपनैं लालन जू पर—१०-९२।
(सं. न्यास + अवर्त्त=न्यासावर्त्त, हिं. निछावर)
वह धन या वस्तु जो उतारा या वाराफेरा करके दी जाय।
(सं. न्यास + अवर्त्त=न्यासावर्त्त, हिं. निछावर)
जिसे प्रेम न हो, प्रेम-रहित।
उ.— बासुदेव की बड़ी बड़ाई। जगत-पिता, जगदीस, जगतगुरु, निज भक्तनि की सहत ढिठाई—१-३।
उ.—(क) बड़ौ निठुर बिधना यह देख्यौ—६४३। (ख) तनक हँस मन दै जुवतिनि को निठुर ठगोरी लाइ—२५३३।
निठुरता, क्रूरता, निर्दयता।
उ.—(क) हठ करि रहे, चरन नहिं छाँड़े, नाथ तजौ निठुराई—९-५३। (ख) अब अपने घर के लरिका सौं इती करति निठुराई—३६३। (ग) ऐसे में न सूध्यौ करै अति निठुराई धरै उनैं उनै घटा देखो पावस की आई है—२८२७।
निठुरता, क्रूरता, निर्दयता।
उ.—सोऊ तौ बूझे ते बोलत इनमें इह निठराउ— पृ. ३३२ (१९)।
मुहा.- निठौर पड़ा— बुरी दशा या स्थिति में पड़ना। परी निठोर— बुरी दशा या स्थिति में पड़ गयी। उ.— बहुरि बन बोलन लागे मोर।¨¨¨¨¨¨। जिनको पिय परदेस सिधारो सो तिय परी निठोर— २१३७।
जिसे डर न हो, निशंक, निर्भय।
उ.—तुम प्रताप-बल बदत का काहूँ, निडर भए घर-चेरे—१-१७०।
[हिं. निडर + पन (प्रत्य.)]
निडर होने का भाव, निर्भयता।
जो ढीला न हो, कसा या तना हुआ।
कमर का पिछला उभरा हुआ भाग।
वह हुंडी जिस का भुगतान दस दिन के भीतर ही हो जाय।
वह वस्तु जिसे दिखाते ही काम की जीच मिल जाय।
देखा-देखी, संग साथ, भेंट-समागम।
उ.—दीन बचन, संतनि-सँग दरस-परस कीजै—१-७२।
दिखायी पड़ना, देखने में आना।
दिखायी दिया, दृष्टिगोचर हुआ।
उ.—ढूँढ़त ढूँढ़त बहु स्रम पायौ। पै मृगछौना नहिं दरसायौ—५-३।
प्रकट होना, स्पष्ट होना, समझ पड़ना।
उ.—तब आतम घट घट दरसावै। मगन होइ, तन-सुधि बिसरावै—३-१३।
दिखायी पड़ता है, दृष्टिगोचर होता है।
उ.—पै उनकौं कोउ देखै नाहिं। उनकौ सकल लोक दरसाहिं—९-२।
उ.—निरखति बैठि नितंबिनि पिय सँग सार-सुता की ओर—१६१८।
उ.—मुख कटु बचन, नित्त पर-निंदा, संगति-सुजस न लेत—२-१५।
घुली चीज जो तल पर बैठ जाय।
घुली चीज के तल पर बैठ जाने से साफ हो जानेवाला जल।
मात करके, पराजित करके, तुच्छ ठहराकर।
उ.—चरन की छबि देखि डरप्यौ अरुन गगन छपाइ। जानु करमा की सबै छबि निदरि लई छँड़ाइ—१०-२३४।
उ.—(क) निदरि चले गोपाल आगे बकासुर कै पास—४२७। (ख) निदरि हमैं अधरनि रस पीवति पढ़ी दूतिका भाइ—६५६।
उ.—लोग कुटुंब जग के जे कहियत पेला सबै निदरिहौं—१५१८।
तिरस्कार किया, उपेक्षा की, चिंता नहीं की।
उ.—सूर स्याम मिलि लोक-बेद की मर्यादा निदरी—पृ. ३३६ (५०)।
उ.—ऐसे ढीठ भए तुम डोलत निदरे ब्रज की नारि—१५०७।
उ.—सूर स्याम मोहू निदरौगे देत प्रेम की गारि—१५०७।
दिखाने या प्रर्दिशत करने का कार्य।
प्रति दिन किया जानेवाला धर्म-कर्म।
उ.— परम उदार, चतुर चिंतामनि, कोटि कुबेर निधन कौं—१-९।
निर्धन स्त्री, गरीब, कंगाल।
उ.— आरि जनि करौ, बलि-बलि जाउँ हौं निधनियाँ—१०-१४५।
धनहीन, गरीब, दरिद्र, कंगाल।
उ.— (क) जननी देखि छबि, बलि जाति। जैसैं निधनी धनहिं पाऐं, हरष दिन अरू राति—१०-७१। (ख) मो निधनी कौ धन रहै, किलकत मनमोहन—१०-७२।
उ.-बहुरौ नृप करिकै मध्यान | दीनौ ताकौ छाँडि निदान-९-१३|
बहुत ही गया-बीता, निकृष्ट।
(सं. निः + निकट, प्रा. निनिअड़, हिं. निनर)
(सं. निः + निकट, प्रा. निनिअड़, हिं. निनर)
(सं. निः + निकट, प्रा. निनिअड़, हिं. निनर)
उ.— साझे भाग नहीं काहू को हरि की कृपा निनारी—२९३५।
उ.— जैसी मोपै स्याम करत हैं तैसी तुम करहु कृपा निनारी—१० उ. ४२।
उ.— बै जलहर हम मीन बापुरी कैसें जिवहिं निनारे—१० उ. ८३।
(हिं. नि =बुरा + नाँव=नाम)
वह वस्तु जिसका नाम लेना अशुभ समझा जाय।
निधिनाथ, निधिप, निधिपति, निधिपाल, निधीश्वर
(सं. नि + निकट, प्रा. निनिअड़)
उ.— मानहु बिबर गए चलि कारे तजि केंचुल भए निनरे री।
बिना संकोच के, बिना आगा-पीछा सोंचे।
उ.— (क) निधरक रहौ सूर के स्वामी, जनि मन जानौ फेरि। मन-ममता रूचि सौं रखवारी, पहिलैं लेहु निबेरि—१-५१। (ख) निधरक भए पांडु-सुत डोलत, हुतौ नहीं डर काकौ—१-११३। (ग) अबहिं निवछरौ समय, सुचित ह्वै, हम तौ निधरक कीजै —१-१९१।
उ.— बै जानत हम सरि को त्रिभुवन ऐसे रहत निधरके री— पृ. ३२२ (११)।
उ.— सखा हंसत मन ही मन कहि कहि ऐसे गुननि निधानी—१५५८।
कुबेर की नौ निधियाँ— पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और वर्च्च।
उ.— जाइ समाइ सूर वा निधि मैं, बहुरि जगत नहिं नाचै—१-८१।
उ.—करुनासिंधु, दयाल, दरस दै सब संताप हरूयै—१-१७।
उ.—एकनि कौं दरसन ठगै, एकनि के सँग सोवै (हो)—१-४४।
उ.— और नैंकु छबै देखें स्यामहिं, ताकौं करौं निपात—३७५।
उ.— कंस निपात करौगे तुमहीं हम जानी यह बात सही परि—४२९।
वह शब्द जो सामान्य व्याकरणिक नियमों के अनुसार न हो।
गिराने, नाश करने या मार डालने का काम।
(हिं. नि =बुरा + नाँव=नाम)
(सं. नवनवति, प्रा. नवनवइ)
उ.— बहुरि नृप जज्ञ निन्यांनबे करि, सतम जज्ञ कौं जबहिं आरंभ कीन्हौ—४-११।
मुहा.- निन्यानबे के फेर में पड़ना— धन बढ़ाने की चिंता या उपाय में लगे रहना।
(सं. निष्पद्यते, प्रा. निपज्जइ)
(सं. निष्पद्यते, प्रा. निपज्जइ)
(सं. निष्पद्यते, प्रा. निपज्जइ)
बढ़ी, पुष्ट हुई, परिपक्व हुई।
उ.— भली बुद्धि तेरैं जिय उपजी। ज्यौं ज्यौं दिनी भई त्यौं निपजी—१०-३९१।
जिसमें पत्ते न हों, ठूँठ।
निरा, विशुद्ध, केवल, एकमात्र।
सरासर, नितांत, बहुत अधिक, पूर्ण, बिलकुल।
उ.— (क) सूरदास जो चरन-सरन रह्यो, सो जन निपट नींद भरि सोयौ—१-५४। (ख) करि हरिसौं सनेह मन साँचौ। निपट कपट की छाँड़ि अटपटी, इंद्रिय बस राखहि किन पाँचौ—१-८३। (ग) नैनन निपट कठिन ब्रत ठानी—३०३७।
उ.— सूर-दास प्रभु कंस निपातहु—२५५८।
उ.—जैसौ दुख हमको एहि दीन्हो तैसे याको होत निपाता—१४२७।
मारा, वध किया, मार गिराया।
उ.—(क) पय पीवत पूतना निपाती, तृनावर्त इहिं भाँत—५०८। (ख) कपटरूप की त्रिया निपाती, तबहिं रह्यौ अति छौना—६०१। (ग) केसी अघ पूतना निपाती लीला गुननि अगाध—२५८०। (घ) सूपनखा ताड़का निपाती सूरदास यह बानि—३२३८।
उ.—वत्सासुर को इहाँ निपात्यो—३४०९।
निपुनइ, निपुनई, निपुनता, निपुनाई
स्त्री जिसके पुत्र न हो, पुत्रहीना स्त्री।
मुहा.- खीस(दाँत) निपोरना— (१) व्यर्थ हैसना। (२) निर्लज्जता से हैसना।
[सं. निष्पुट, प्रा. निष्पुड + ना (प्रत्य.)]
(सं. निष्पन्न, पा. निष्फन्न)
छिदकर, चुभकर या धँसकर आरपार होना।
(सं. निष्फल, प्रा. निप्फल)
उ.—राख्यौ सुफल सँवारि, सान दै, कैसैं निफल करौं वा बानहिं—९-९५।
नीम का फल या बीज, निबौली, निबौरी।
(सं. निवर्त्तन, प्रा. निवट्टना)
छुट्टी पाना, निवृत्त होना।
(सं. निवर्त्तन, प्रा. निवट्टना)
(सं. निवर्त्तन, प्रा. निवट्टना)
(सं. निवर्त्तन, प्रा. निवट्टना)
(सं. निवर्त्तन, प्रा. निवट्टना)
वह वस्तु जिसे देने को वचनबद्ध हो।
गीत जिसमें गति समय, ताल, गमक आदि का पूरा ध्यान रखा जाय।
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
बँधी-टँकी चीज का छूटकर अलग होना।
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(काम) पूरा या समाप्त होना।
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
दिखायी दे, दीख पड़े, मालूम हो, जान पड़े।
उ.—भय-उदधि जमलोक दरसै, निपट ही अँधियार—३-८८।
उ.—सूर कही राधा के आगे कैसे मुख दरसैहौं—१२६०।
उ.—नैन चकोर चंद्र दरस्यौ री—२४०७।
लकड़ी के तख्ते के फट जाने से या दो तख्तों के जोड़ के पास रह जानेवाली खाली जगह, शिगाफ, दराज।
छुट्टी दिलाना, निवृत्त कराना।
(सं. निवृत्त, प्रा. निबिड्ड)
(काम) पूरा हो जायगा, निवृत्ति मिल जायगी।
उ.—सूरदास बिसती कह बिनवै, दोषनि देह भरी। अपनौ बिरद सम्हारहुगे तौ यामैं सब निबरी—१-१३०।
उ.—अब नीकै कै समुझि परी। जिन लगि हती बहुत उर आसा सोऊ बात निबरी।
मिली-जुली वस्तुओं को अलग करने से।
उ.—नैना भए पराए चेरे।¨¨¨¨। त्यौं मिलि गए दूध पानी ज्यौं निबरत नहीं निबेरैं—२३९५।
मुक्त होंगे, बचे रहेंगे, पार पायेगे।
उ.—कबलौं कहौ पूजि निबरैंगे बचिहैं बैर हमारे।
उ.—कैसे है निबहत अबलनि पै कठिन जोग को साजु—३२३५।
निबहन पैहौं—छुटकारा मिल सकेगा, बचा जा सकेगा।
उ.—स्याम गए देखै जनि कोई। सखियनि सौं निबहन किमि पैहौं इन आगे राखौं रस गोई।
निबहन पैहौं—छुटकारा पा सकोगे, बच सकोगे।
उ.—मेरे हठ क्यों निबहन पैहौ। अब तौ रोकि सबनि कौ राख्यौ कैसे कै तुम जैहौ।
मुक्ति या पार पाना, बच निकलना।
निर्वाह, पालन या रक्षा होना।
(काम) पूरा होना या निभना।
(बात या वचन का ) पालन होना।
[हिं. दरार +ना (प्रत्य.)]
उ.—भक्त-बछल बपु धरि नरकेहरि, दनुज दह्यौ, उर दरि सुरसाँई—१-६।
निर्धन मनुष्य, कंगाल आदमी।
दीन-दुखियों के रूप में मान्य ईश्वर।